500₹ तथा 1000₹ के नोटों के विमुद्रीकरण के निहितार्थ
- परिवेश से आगत सूचना के अनुसार प्रतिक्रिया करना, सभी जीवों
का सहज प्राकृतिक गुण है। पर तर्कबुद्धि के आधार पर योजनाबद्ध तरीके से परिवेश के
साथ अंतर्व्यवहार करना मानवीय चेतना का विशिष्ट प्राकृतिक गुण है।
- प्रकृति संसाधनों से भौतिक जीवन के लिए आवश्यक चीजों का
उत्पादन करने तथा उनका उपभोग करने के लिए परस्पर सहयोग करना, मानव समाज के विकास
में जंगलयुग के स्तर का सहज प्राकृतिक गुण है। पर उत्पादन में सहयोग तथा उपभोग में
प्रतिस्पर्धा व संघर्ष, और प्रतिस्पर्धा व संघर्ष से उपजे संकट से समाज को बचाने
के लिए तर्कबुद्धि के आधार पर उचित हस्तक्षेप करना, मानव समाज के विकास में, वर्ग
विभाजित सभ्यता के स्तर पर, सामाजिक चेतना का विशिष्ट गुण है।
- प्रतिस्पर्धा तथा संघर्षों के घातक परिणामों से समाज को
बचाने के लिए, राजनैतिक-अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करने के लिए, सिद्धांत आधारित
रणनीति तैयार करना और दूरगामी परिणामों को हासिल करने के लिए कार्यनीति बनाना तथा
उसमें आवश्यक बदलाव सिद्धांत के आधार पर ही करना, तर्कबुद्धि आधारित हस्तक्षेप का
द्योतक है। (सिद्धांत का अर्थ है वह अवधारणा जो व्यापकतम परिस्थितियों की सही
व्याख्या कर सके।) फौरी राजनैतिक फायदों के लिए सिद्धांत रहित व्यवहार को ही सिद्धांत तथा रणनीति के तौर पर देखना,
तर्कबुद्धि विहीन हस्तक्षेप का द्योतक है।
- 8 नवंबर 2016 की शाम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसारण
से उपजे आर्थिक संकट तथा उससे निपटने के उपायों के निरपेक्ष विश्लेषण के आधार पर ही
तय किया जा सकता है कि मौजूदा सरकार का, 500 ₹ तथा 1000 ₹ के नोट बंद करने का यह कदम, फौरी राजनैतिक फायदे के लिए
किया गया सिद्धांत रहित विवेकहीन हस्तक्षेप है, या फिर दूरगामी आर्थिक सहिष्णुता
हासिल करने के लिए आर्थिक नीति में किया गया सिद्धांत आधारित विवेकपूर्ण हस्तक्षेप
है।
- निरपेक्ष विश्लेषण के लिए, मूल्य, मुद्रा तथा करेंसी की
मूलभूत समझ हासिल करना तथा अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका को समझना जरूरी है।
- अर्थ व्यवस्था में सभी उपयोगी चीजों के विनिमय में, उनकी
मात्रा की तुलना, उनके
अंदर निहित, जिस मूल्य के आधार पर की जाती है वह मानवीय श्रम-शक्ति के
द्वारा ही पैदा होता है। किसी चीज के उत्पादन में लगने वाली मानवीय श्रम-शक्ति के
दो पहलू होते हैं। एक तो श्रम-शक्ति की विशिष्ट श्रम पैदा करने की वह क्षमता जो किसी
वस्तु को उपभोग योग्य बनाता है। दूसरा वह औसत सामाजिक श्रम पैदा करने की क्षमता
जिसके कारण विनिमय में अलग-अलग उत्पादों की मात्रात्मक तुलना उनमें लगे हुए औसत
श्रमकाल (जिसे मूल्य कहा जाता है) के आधार पर की सकती है। जिस सर्वमान्य मापदंड के
आधार पर चीजों के मूल्य की तुलना की जाती है या जिसके आधार पर चीजों की कीमत
दर्शायी जाती है, उस मुद्रा का न अपना कोई मूल्य होता है और न उपयोग सिवाय इसके कि
उसका सभी प्रकार की वस्तुओं के विनिमय की इकाई के रूप में इस्तेमाल होता है
क्योंकि वह राज्य द्वारा सत्यापित होती है तथा राज्य की सीमाओं के अंदर उसकी
स्वीकार्यता कानूनी रूप से हर किसी के लिए बाध्यकारी होती है।
- हर वस्तु की उपयोगिता उसके भौतिक स्वरूप तथा गुणों पर निर्भर
करती है, पर वस्तु का मूल्य पूरी तरह एक वैचारिक चीज है जो समाज में विनिमय की
परिस्थितियों में उजागर होता है और विनिमय के क्षेत्र के बाहर न उसका कोई अस्तित्व
होता है और न ही कोई उपयोगिता। विनिमय के दौरान खरीदने वाले के लिए खरीदी जाने
वाली वस्तु के मूल्य की पहचान उस वस्तु के भौतिक स्वरूप में उपभोग मूल्य के रूप
में हो जाती है, पर बेचने वाले की रुचि किसी उपभोग योग्य वस्तु में न होकर केवल,
राज्य द्वारा प्रत्याभूत मुद्रा की उतनी संख्या में होती है जो कीमत के रूप में
बेची जानेवाली वस्तु के मूल्य को दर्शाती है।
- इस प्रकार मुद्रा का, विनिमय से बाहर एक उपयोगी भौतिक वस्तु के रूप में उपभोग-मूल्य,
और विनिमय के दौरान, राजसत्ता द्वारा प्रत्याभूत मुद्रा (एक आश्वासन का मूर्त रूप)
से तुलना के आधार पर कीमत के रूप में दर्शाया गया विनिमय-मूल्य, दो बिल्कुल अलग
चीजें हैं। सिक्कों का वास्तविक मूल्य उनमें मौजूद धातु के बाजार मूल्य के बराबर
होता है, पर मुद्रा के रूप में उनका प्रत्यक्ष मूल्य उनके वास्तविक मूल्य से कई गुना अधिक होता है।
पर विशिष्ट परिस्थितियों में जहां धातु की बाजार में कीमत इतनी बढ़ जाती है कि
सिक्के में लगी धातु की कीमत उसके प्रत्यक्ष मान से अधिक हो जाय तो सिक्का मुद्रा
के रूप में विनिमय से स्वयं बाहर हो जाता है। इसी प्रकार करेंसी नोट का, विनिमय से
बाहर वास्तविक मूल्य एक रद्दी कागज के मूल्य के बराबर ही होता है, पर विनिमय के
दौरान मुद्रा के रूप में उसका मूल्य कई गुना अधिक होता है। 1000 ₹ के करेंसी नोट की उत्पादन लागत लगभग 3 ₹ होती है, पर विनिमय में वह 1000 ₹ के मूल्य का पर्याय है। यह समझ कि नगद में रखा हुआ रुपया
संपत्ति होता है गलत समझ है। जेब में रखे हुए 1000 ₹ के नोट का अपना कोई मूल्य नहीं
होता है, मूल्य होता है उस पर अंकित राज्य के उस आश्वासन का जो उसे प्रतिभूति का
स्वरूप प्रदान करता है। जिस क्षण राज्य का आश्वासन समाप्त हो जाता है उसी क्षण
उसका विनिमय मूल्य शून्य रह जाता है। 8 नवंबर 2016 के बाद 500 ₹ रुपये तथा 1000 ₹ के नोटों का आम जनता के बीच विनिमय मूल्य शून्य हो
गया है क्योंकि इस प्रकार के विनिमय में सरकार ने आश्वासन वापस ले लिया है। पर
पेट्रोल पंप, बिजली विभाग आदि स्थानों पर विनिमय में उनका मूल्य अभी भी उन पर
अंकित मूल्य के बराबर ही है क्योंकि उन विभागों को किये जाने वाले भुगतान को अभी भी
सरकार का आश्वासन हासिल है।
- इस पृथ्वी पर मौजूद सारी भौतिक संपत्ति की पहचान, मानवीय
श्रम द्वारा निर्मित उपयोगी वस्तुओं के रूप में ही की जाती है। संपत्तियां जब तक अपने निष्क्रिय
रूप में होती हैं उनका मोल केवल काल्पनिक तथा भावनात्मक होता है। उनका वास्तविक मूल्य
या तो उपभोग के दौरान उजागर होता है या विनिमय के दौरान। करेंसी नोट के रूप में संचित
मुद्रा का मूल्य केवल विनिमय के दौरान ही होता है, विनिमय के बाहर उसका कोई उपयोग नहीं
और इसलिए कोई उपयोगी मूल्य भी नहीं है। 9 नवंबर के बाद 500₹ तथा 1000₹ की करेंसी का कोई मूल्य नहीं रह गया
है क्योंकि विनिमय के लिए उसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। उन्हें केवल एक आश्वासन
के रूप में दूसरे नये आश्वासन के साथ ही बदला जा सकता है। मुद्रा सरकार के नियंत्रण
में ही छापी जाती है तथा छपने के बाद सबसे पहले सरकार की ही संपत्ति होती है। या यूं
कह सकते हैं कि सरकार, बहुत ही कम वास्तविक लागत के साथ, केवल अपनी साख के आधार पर
अतिरिक्त मूल्य अर्थात अपने लिए मुनाफा पैदा करती है, पर साथ ही आश्वासन के रूप में
देनदारी भी पैदा करती है। मुनाफा तो सरकार
के हाथ में सिक्कों या करेंसी नोटों के जारी होने के साथ ही आ जाता है, पर देनदारी
तभी उत्पन्न होती है जब सरकार को किन्हीं परिस्थितियों में किसी करेंसी को वापस लेना
पड़े जैसे नोटों के गलने या फटने पर होता है या किसी कारण कुछ नोटों को वापस लेना पड़े
जैसा कि पिछले दिनों 1000₹ के नोटों की छपाई में कुछ सीरीज के नोटों में खामी होने
के कारण उन्हें वापस लेना पड़ा था।
- मूल्य पूरी तरह एक वैचारिक सामाजिक
चीज है, जो सामूहिक-चेतना तथा व्यक्तिगत-चेतना में उस वास्तविक औसत सामाजिक समरूप श्रम
का प्रतिबिंबि होता है जो, उत्पादन के दौरान उन चीजों में अंतर्निहित हो जाता है, जिनके
भौतिक स्वरूप के कारण, विनिमय के दौरान वह प्रतिबिंबित होता है। इसी प्रकार मुद्रा
भी पूरी तरह एक वैचारिक सामाजिक चीज है जो मूल्य के पर्याय के रूप में, सामाजिक-चेतना
तथा व्यक्तिगत चेतना में राज्य समर्थित उस आश्वासन से उपजती है जो सिक्कों तथा करेंसी
के भौतिक स्वरूप में मौजूद होता है।
- प्रकृति प्रदत्त
संसाधनों को, व्यक्तिगत तथा सामूहिक श्रम द्वारा उपभोग योग्य बनाना ही मानव के व्यक्तिगत
तथा सामूहिक जीवन का आधार है। विनिमय आधारित अर्थव्यवस्था, विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों
में ही जन्म लेती है, और संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया का एक अंश मात्र है न कि संपूर्ण
सामाजिक प्रक्रिया। विनिमय में भी, करेंसी आधारित विनिमय का तो और भी बहुत छोटा अंश
होता है। इस कारण केवल मुद्रा से तुलना के आधार पर दर्शाई गई कीमत को ही उत्पादों और
सेवाओं का मूल्य मान कर न तो राजनैतिक-अर्थव्यवस्था का सही-सही विश्लेषण किया जा सकता
है और न ही सामाजिक विकास प्रक्रिया को ठीक-ठीक समझा जा सकता है। राजनैतिक-अर्थव्यवस्था
के सही-सही विश्लेषण के लिए उत्पादों तथा सेवाओं के विनिमय में, उनके विनिमय मूल्य
को मुद्रा के सापेक्ष कीमत के रूप में न देखकर, उनके उत्पादन में लगे, दोहरी प्रकृति
के श्रमकाल के रूप में देखना होगा। इसके बिना यह समझ पाना असंभव है कि विनिमय आधारित
अर्थव्यवस्था में, उत्पादों को उनकी कीमत पर बेचे जाने के बावजूद अतिरिक्त मूल्य अर्थात
मुनाफा कैसे पैदा होता है और किस प्रकार पूंजी अतिरिक्त मूल्य को हासिल कर स्वविस्तार
करती है। श्रम आधारित मूल्य की गलत समझ के कारण ही वामपंथी समझ ही नहीं पाते हैं कि
पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य के हस्तांतरण की प्रक्रिया सामंतवादी
उत्पादन व्यवस्था में हस्तांतरण की प्रक्रिया से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है।(संदर्भ
के लिए देखें, तू ही राहबर, तू ही राहजन http://marx-darshan.blogspot.in/2015/12/blog-post.html)
- उत्पादन तथा उपभोग प्रक्रिया
का चक्र दो भागों में पूरा होता है। पहली प्रक्रिया है प्राकृतिक संसाधनों, मानव द्वारा
निर्मित उत्पादन के साधनों तथा मानवीय श्रम-शक्ति के द्वारा उपभोग योग्य वस्तुओं का
उत्पादन करना, दूसरी प्रक्रिया है उत्पादित वस्तुओं के उपभोग के द्वारा उत्पादन के
तीनों अवयवों को पुनर्जीवित तथा विकसित करना।
- उत्पादन के पहले दो अवयव निर्जीव
निष्क्रिय होते हैं और नये उत्पाद के मूल्य में उनका उतना ही योगदान होता है जितना
मूल्य उनके रख रखाव के लिए जरूरी चीजों के उपभोग पर खर्च होता है। निर्जीव निष्क्रिय
अवयव अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं कर सकते हैं। पर अतिरिक्त मूल्य पैदा करना सजीव सक्रिय
मानवीय श्रमशक्ति का प्रकृति प्रदत्त गुण है। खर्च की गई श्रमशक्ति को पुनर्जीवित तथा
परिष्कृत करने में श्रमिक जितने मूल्य के उत्पाद का उपभोग करता है उससे कहीं अधिक मूल्य
वह अपनी श्रमशक्ति को खर्च कर पैदा कर सकता है। इसके साथ ही सामूहिक श्रमशक्ति की उत्पादकता,
व्यक्तिगत श्रमशक्ति की उत्पादकता से गुणात्मक रूप से भिन्न और कई गुना अधिक होती है।
चीजों के विनिमय के दायरे के बाहर बहुत से कार्य कलाप होते हैं जो पूरी तरह व्यक्तिगत
तथा सामूहिक सामाजिक होते हैं, पर जिनका व्यक्तिगत तथा सामूहिक क्षमताओं के तथा उत्पादकता
के विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है ।
- अतिरिक्त मूल्य या मुनाफा केवल
उत्पादन में मानवीय श्रमशक्ति के फलोत्पादक उपयोग के द्वारा ही पैदा किया जा सकता है।
जितना अधिक दक्ष उत्पादन की योजना तथा उसका कार्यान्वयन होगा उतना ही अधिक अतिरिक्त
मूल्य होगा। श्रमशक्ति के उपभोग या खर्च के बिना अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं हो सकता
है, उसका केवल एक उत्पाद से दूसरे में रूपांतरण हो सकता है। किसी चीज के उत्पादन से
उपभोग तक की विनिमय प्रक्रिया, खरीद-बिक्री के एक ही चरण में पूरी हो सकती है या कई
चरणों में भी। हर चरण में, उत्पाद को खरीदने में लगाई गई पूंजी, उत्पाद की बिक्री पर
अतिरिक्त मूल्य के साथ वापस हो जाती ही। अनेकों छोटे-छोटे खरीद-बिक्री के चक्रों से
मिलकर उत्पादन-उपभोग का चक्र पूरा होता है। हर चरण में बिक्री-मूल्य तथा खरीद-मूल्य
के अंतर (आंशिक अतिरिक्त मूल्य) का कुल जोड़, उपभोग के समतुल्य-मूल्य तथा लागत मूल्य
के अंतर अर्थात कुल पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य के बराबर होता है। ऊपर दिया कथन कि
‘सिक्के और करेंसी जारी कर सरकार अपनी साख के आधार पर अतिरिक्त मूल्य अर्थात अपने लिए
मुनाफा पैदा करती है’ पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि उसके साथ ही उतनी देनदारी भी पैदा
होती है। जारी किये गये सिक्कों तथा करेंसी का मूल्य सरकार पूंजी के रूप में इस्तेमाल
करती है। जारी किये गये सिक्कों तथा करेंसी का मूल्य, सरकार का पूंजी निवेश होता है
जिसके आधार पर अर्थव्यवस्था में पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य में से एक हिस्सा सरकार
रेपो रेट पर ब्याज, उत्पाद कर तथा अन्य करों के रूप में वसूलती है।
- वर्ग विभाजित समाज में, सारा संघर्ष उस अतिरिक्त
मूल्य में अधिक से अधिक हिस्सा बंटाने के लिए होता है जो उत्पादन के स्तर पर उत्पाद
के रूप में पैदा होता है पर हासिल उत्पाद के उपभोग के बाद ही होता है। उत्पादन में लगने वाले
तीनों अवयवों के स्वामित्व के आधार पर, तीनों वर्ग अपनी-अपनी ताकत के आधार पर
अतिरिक्त मू्ल्य का हिस्सा हड़पने में कामयाब होते हैं।
- सामंतवादी व्यवस्था में प्राकृतिक संसाधन
सामंतवर्ग के आधिपत्य में होते हैं, श्रमशक्ति तथा श्रम के साधन श्रमिकवर्ग के
आधिपत्य में और अन्य संपत्तियां तथा वितरण के साधन बुर्जुआवर्ग के आधिपत्य में
होती हैं। सामंतवादी व्यवस्था में राज्य का गठन राजशाही के रूप में होने के कारण,
सामंतवादी वर्ग सबसे अधिक ताकतवर होता है। उत्पादन व्यक्तिगत स्तर पर होने के कारण
मजदूरवर्ग सबसे कमजोर वर्ग होता है।
- उत्पादन का स्तर बढ़ने तथा व्यापार का विस्तार
राज्य की सीमाओं के बाहर होने के साथ बुर्जुआवर्ग के पास साधन एकत्रित होते जाते
हैं। इसके साथ ही बुर्जुआवर्ग निम्न बुर्जुआजी की मदद से, श्रमिकवर्ग को अपने पीछे
लामबंद कर राज्य की शक्ति कब्जाने में सफल हो जाता है और राज्य का गठन राजशाही की
जगह राष्ट्र-राज्य के रूप में जनवाद के आधार पर हो जाता है। राज्य के समर्थन तथा
संचित पूंजी के आधिपत्य के कारण उत्पादन तथा अतिरिक्त मूल्य का सृजन अभूतपूर्व
स्तर पर पहुंच जाता है।
- पूंजीवादी व्यवस्था में, प्राकृतिक
संसाधन राज्य के नियंत्रण में आ जाते हैं, उत्पादन के साधन और परिसंपत्तियां
बुर्जुआवर्ग के स्वामित्व में तथा कामगार की श्रमशक्ति पूंजीपति के नियंत्रण में
हो जाती है। अतिरिक्त मूल्य की भागीदारी में राज्य ब्याज तथा विभिन्न करों के रूप
में अपना हिस्सा लेता है, बुर्जुआवर्ग किराये तथा ब्याज के रूप में अतिरिक्त मूल्य
में हिस्सा बंटाता है, और पूंजीपतिवर्ग मुनाफे के रूप में अतिरिक्त मूल्य में
हिस्सा बंटाता है। यहां पर वर्ग तथा व्यक्ति का अंतर समझना महत्वपूर्ण है। एक
व्यक्ति एक ही समय पर या अलग-अलग समय चेतन या अवचेतन स्तर पर अलग-अलग समूहों तथा
वर्गों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि अतिरिक्त मूल्य के
बंटवारे में मुख्य संघर्ष दो गुटों के बीच होता है। एक ओर होता है पूंजीपतिवर्ग और
दूसरी ओर होता है संपत्तिवानवर्ग। राज्य, प्राकृतिक संसाधनों तथा संगठित हिंसक
शक्ति के नियंत्रण के कारण दोहरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक तो प्राकृतिक
संसाधनों पर नियंत्रण के कारण संपत्तिवानवर्ग की भूमिका तथा दूसरी संघर्षरत वर्गों
के बीच पंच की भूमिका। पर असंगठित तथा राजनैतिक रूप से अपरिपक्व होने के कारण मजदूरवर्ग
की भूमिका महत्वहीन रहती है। संघर्षरत संपत्तिवानवर्ग तथा पूंजीपतिवर्ग राजसत्ता
का समर्थन हासिल करने के लिए जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत
देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास करते हैं।
- पूंजी, एकत्रीकरण के अपने चरित्र के
कारण, दिनोंदिन अधिक शक्तिशाली होती जाती है और सभी वर्गों को अपने प्रभाव में
लेती जाती है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण हर राष्ट्र की मुद्रा स्वयं एक जिंस
या पण्य उत्पाद बन जाती है जिसका विनिमय उसी प्रकार होने लगता है जिस प्रकार अन्य
उत्पादों का। अंतर्राष्ट्रीय बैंकों के करार-पत्रों का आश्वासन, मुद्रा के रूप में
राज्य के आश्वासन से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसे-जैसे पूंजी का बर्चस्व
बढ़ता जाता, ब्याज की दरें तथा कॉरपोरेट टैक्स की दरें घटती जाती हैं तथा मुनाफे
की दरें बढ़ती जाती हैं।
- अतिरिक्त मुनाफे की हवस के कारण
पूंजीपति बही खातों में हेराफेरी कर टैक्स चोरी करते हैं और यही धन काला धन कहलाता
है। इसी काले धन का एक हिस्सा, पूंजी के प्रबंधकों, बैंक प्रबंधकों और सरकारी
कर्मचारियों तथा जनप्रतिनिधियों के बीच रिश्वत के रूप में बंटता है। पूंजीवादी
अर्थव्यवस्था के मूल चरित्र के कारण, काले धन के उत्पादन तथा बंटवारे को रोकने के
लिए किए गये सभी उपाय अंततः बेकार साबित होते हैं।
- पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पूंजी के
एकत्रीकरण के साथ केंद्रीकृत सामूहिक उत्पादन का स्तर बढ़ता जाता है और छोटे स्तर
का उत्पादन घटता जाता है। संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारण सामाजिक चेतना का
हिस्सा होती है जिसके कारण सामूहिक रूप से पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का
बंटवारा व्यक्तिगत आधार पर होता है। यही अवधारणा सारे भ्रष्टाचार तथा काले धन का
आधार और स्रोत है। जब तक सामाजिक चेतना में यह अवधारणा मौजूद है तब तक न
भ्रष्टाचार को मिटाया जा सकता है न काले धन को।
- सरकार के मौजूदा निर्णय का आंकलन करने
के लिए कुछ आंकड़े भी ध्यान में रखना होगा। अनुमान लगाया जाता है कि प्रतिवर्ष
लगभग 30-40 लाख करोड़ रुपये का काला धन पैदा होता है। 500₹ तथा 1000₹ के करेंसी नोटों का मूल्य क्रमशः
2 लाख करोड़ तथा 12 लाख करोड़ है। पहले 9 दिनों में 4 लाख रुपये की करेंसी बदली जा
चुकी है जब कि नई करेंसी की आपूर्ति सीमित थी। अगर मान लिया जाय कि दिसंबर के अंत
तक और 8 लाख करोड़ वापस हो जायेंगे तो माना जा सकता है कि केवल 2 करोड़ की करेंसी ही
काले धन को रूप में बचेगी जो सरकार के खाते में आ जायगी क्योंकि सरकार उतनी
देनदारी से मुक्त हो जायेगी। इसका अर्थ है कि काले धन का 5-6% ही करेंसी के रूप
में बचता है बाकी या
तो परिसंपत्तियों में जमा हो जाता है या फजूलखर्ची में उड़ा दिया जाता है। परिसंपत्तियों
से वसूल पाना असंभव है क्योंकि संविधान के अनुसार संपत्ति मौलिक अधिकार है और कानूनी
प्रक्रिया के द्वारा यह सिद्ध कर पाना असंभव है कि संपत्ति गैर कानूनी तरीके से अर्जित
की गई है। चूंकि काले धन में सरकारी कर्मचारियों तथा जनप्रतिनिधियों की भी भागीदारी
होती है इसलिए किसी नेता द्वारा कालेधन को वसूल करने का दावा करना एक जुमले के अलावा
कुछ नहीं है।
- संपन्न वर्ग तथा काले धन के
खिलाफ जन आक्रोश को देखते हुए काले धन के खिलाफ लड़ाई का जुमला अक्सर चुनाव के लिए
एक प्रभावी नारा होता है। जाहिर है कि आनेवाले उ.प्र. तथा पंजाब के चुनाव में इस जुमले
का इस्तेमाल किया जा सकता है। जनता की स्मृति अल्पकालिक होती है, पर इतनी अल्पकालिक
भी नहीं कि 2014 के चुनाव में इस्तेमाल किये गये जुमले को इतनी जल्दी भूल जाय।
यह तो समय ही बतायेगा कि 20
करोड़ मेहनतकश जनता की जिंदगी को 15 दिन के लिए दूभर बना देना अच्छी चुनावी रणनीति
साबित होता है कि नहीं।
सुरेश श्रीवास्तव
21 नवंबर,
2016