Friday, 28 June 2013

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश



क्या मार्क्सवादियों  को खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विरोध करना चाहिेये?
(सुरेश श्रीवास्तव)

मार्क्स ने कहा था 'सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर स्वयं भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है। सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने में सक्षम तब होता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनक़ाब करता है, और वह पूर्वाग्रहों को तब बेनक़ाब करता है जब वह मूलाग्रही होता है। मूलाग्रही होने का मतलब है चीजों को उनके मूल के ज़रिये  समझना।' और एंटी ड्युहरिंग की प्रस्तावना में ऐंगेल्स ने लिखा था 'लेकिन सैद्धांतिक चिंतन प्रकृति प्रदत्त गुण है अगर केवल प्राकृतिक क्षमता की बात करें तो। इस क्षमता को विकसित किया जाना चाहिये, उसे परिष्कृत किया जाना चाहिये, और उसके परिमार्जिन का अभी तक और कोई तरीक़ा नहीं है सिवाय इसके कि पिछले दर्शन का अध्ययन किया जाये।' 
वामपंथी जिसका विरोध कर रहे हैं वह है मल्टी ब्रैंडेड खुदरा व्यापार में पूर्ण स्वामित्व आधारित विदेशी निवेश। सैद्धांतिक रूप से वे ब्रैंडेड माल के खुदरा व्यापार में पूूर्ण-स्वामित्व आधारित विदेशी निवेश के विरोध में नहीं हैं। अर्थात अगर कोई विदेशी संगठन एक ही ब्रैंड के माल की खुदरा बिक्री के लिए प्रतिष्ठान स्थापित करना चाहता है तो उसके ऐसा पूर्ण स्वामित्व के अंतर्गत करने पर वामपंथियों को कोई ऐतराज़ नहीं है पर अगर वह अनेकों ब्रैंड के माल की खुदरा बिक्री पूर्ण स्वामित्व के अंतर्गत करना चाहता है तो वामपंथियों को ऐतराज़ है। वामपंथियों के विरोध का आधार यह दलील है कि छोटे-छोटे दुकानदार व व्यापारी जो अपनी आजीविका अनेकों ब्रैंड के माल की खुदरा बिक्री आधारित स्वरोज़गार के ज़रिए कमाते हैं उनके लिए विदेशी निवेशकों के सामने प्रतिस्पर्धा में टिक पाना असंभव होगा और करोड़ों दुकानों के बंद होने से एक ओर करोड़ों दुकानदार तथा व्यापारी बेरोज़गार हो जायेंगे और दूसरी ओर बड़े संस्थानों के एकाधिकार के कारण जहां लघु उद्योगों तथा किसानों को उनके उत्पादों का मूल्य कम मिलेगा वहीं उपभोक्ता को अधिक मूल्य चुकाना पड़ेगा।
ऊपर उठाये गये प्रश्न का सही उत्तर वामपंथियों की दलील के सही-सही सैद्धांतिक विश्लेषण के द्वारा ही हासिल किया जा सकता है।
सारे विवाद के केंद्र में है उत्पाद तथा उत्पाद का मूल्य, और विवाद है उत्पादक या श्रमिक तथा वितरक या बिचौलिये के बीच क्रेता द्वारा चुकायी गयी क़ीमत के उचित बँटवारे को लेकर। जहाँ मार्क्सवादियों को मार्क्स द्वारा स्थापित मूल्य की अवधारणा से आज भी पूरा इत्तफ़ाक़ है वहीं वामपंथियों ने विज्ञान, तकनीकी तथा संचार के क्षेत्र में पिछले 150 सालों में हुए अभूतपूर्व विकास की दलीलें देते हुए न केवल मार्क्स की मूल्य की अवधारणा को बल्कि मार्क्सवाद की अनेकों सैद्धांतिक अवधारणाओं को भी संशोधित कर अपने साथ-साथ जनता को भी भ्रमित किया है। मार्क्सवाद की मूल्य की व्याख्या को छोड़ देने के बाद वामपंथी न शोषण की प्रक्रिया को समझ पा रहे हैं और ना ही पूँजी तथा पूँजीवाद की संरचना (अंतर्वस्तु तथा अधिरचना) और उनके आंतरिक द्वंद्वों को। आइये हम यहाँ उठाये गये विवाद के विभिन्न पहलुओं के अवयवों का अलग-अलग और एकीकृत विश्लेषण करें।
मार्क्सवाद के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों को सामूहिक मानवीय श्रम द्वारा मानवीय उपभोग के लिए परिवर्तित करने की प्रक्रिया ही मानव समाज के गठन का आधार है। भिन्न-भिन्न प्रकार की उपयोगी वस्तुओं में एक ही चीज़ है जो बिना किसी अपवाद सामान्य रूप से विद्यमान है और वह है उत्पाद में अन्तर्निहित संचित श्रम। अर्थात सामाजिक रूप से आवश्यक वह श्रम जो प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पदार्थ को विभिन्न चरणों में परिवर्तित कर अंततः उत्पाद के रूप में किसी मानवीय मांग की आपूर्ति करता है। मांग का उद्गम शारीरिक है या वैचारिक इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। समय के साथ-साथ मानव के संचित सामूहिक ज्ञान में इज़ाफा होता जाता है और इसके साथ ही बढ़ती जाती हैं उत्पादक शक्तियाँ। मानव समाज का सामूहिक ज्ञान और उत्पादक शक्तियां एक दूसरे की पूरक हैं और दोनों का निरंतर विकास प्रकृति का शाश्वत नियम है। उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही श्रम शक्ति की उत्पादकता भी बढ़ती जाती है।

उत्पादक शक्तियों के बढ़ने के साथ ही अस्तित्व में आया श्रम-विभाजन। जहां पहले जीवनोपयोगी सारे उत्पाद एक ही परिवार या समूह द्वारा पैदा किये जाते थे और समूह की न्यूनतम माँगों की आपूर्ति ही कर पाते थे वहीं अब एक परिवार एक ही उत्पाद बनाने लगा था पर उसकी मात्रा अनेकों परिवारों तथा समूहों की बढ़ी हुई मांग की आपूर्ति करने में सक्षम थी। श्रम विभाजन के साथ ही अस्तित्व में आ गई विभिन्न उत्पादक-उपभो़क्ताओं के बीच उत्पादों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया। उस स्तर पर सामाजिक संरचना में हर व्यक्ति एक समय पर उपभोक्ता के रूप में था तो किसी और समय पर उत्पादक के रूप में। इस कारण आदान-प्रदान की प्रक्रिया में उत्पादों की तुलनात्मक मात्रा सहज और अनजाने ही उनमें निहित संचित श्रम के आधार पर तय हो जाती थी। सामाजिक रूप से मान्य आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया में उत्पादों की तुलना का मापदंड, उनमें अन्तर्निहित सामाजिक रूप से आवश्यक मानवीय श्रम, सामाजिक चेतना का अंग था और उसके लिए किसी अनुपयोगी भौतिक पदार्थ की ज़रूरत नहीं थी।
अगले चरण में उन्नत औज़ारों तथा यातायात के साधनों के कारण उत्पादन और आदान-प्रदान उस स्तर पर पहुँच गये जहाँ हर उत्पादक को हर उत्पाद की जरूरत नहीं थी और उत्पादक-उपभोक्ता के बीच सीधा संबंध संभव नहीं रह गया था। इसलिए आवश्यकता हुई एक बिचौलिए की जो उत्पादकों से उत्पाद लेकर उपभोक्ताओं तक पहुंचा सके और अपनी सेवाओं के बदले अपनी ज़रूरत के उत्पाद हासिल कर सके। उत्पादन-उपभोग की श्रंखला में न केवल कामगार का उत्पादक कार्य बल्कि उत्पाद को उपभोक्ता तक पहुँचाने में लगने वाला बिचौलिये का कार्य भी, प्राकृतिक पदार्थों को मानवीय उपभोग के लिए परिवर्तित करने की प्रक्रिया का ही एक चरण हो गया और कामगार के उत्पादक श्रम के साथ उसका श्रम भी उत्पाद में अन्तर्निहित संचित मानवीय श्रम का हिस्सा हो गया। अब मानव समाज के गठन का आधार उत्पादन-उपभोग की श्रंखला से बढ़ कर उत्पादन-वितरण-उपभोग की श्रंखला में बदल गया। जीवनोपयोगी वस्तुओं के आदान-प्रदान का स्थान ले लिया उत्पादों के विनिमय ने।        
निरंतर उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही बिचौलिये को निरंतर बढ़ती मात्रा में विविध प्रकार के ऐसे उत्पादों का विनिमय करना होता था जिनका उसके अपने लिये कोई उपयोग नहीं था इसलिए आवश्यकता थी सर्वमान्य एक ऐसे उत्पाद की जिसके बदले में सभी उत्पादों का आदान-प्रदान किया जा सके। अपने भौतिक गुणों के कारण सोने-चाँदी ने वह आवश्यकता पूरी की और उत्पादों के आपसी आदान-प्रदान का स्थान ले लिया क़ीमती धातुओं के माध्यम से होने वाले विनिमय ने।
  धीरे-धीरे सभी उत्पादों का विनिमय सोने-चाँदी के बदले में होने लगा। और उत्पादक, उपभोक्ता और  बिचौलिया सभी उत्पादों का उपयोगी मूल्य उनमें अंतर्निहित संचित मानवीय श्रम के रूप में न देख कर सोने-चांदी की मात्रा के रूप में देखने लगे। शनै-शनै सामाजिक चेतना में विनिमय मूल्य ही मूल्य का पर्याय बन गया।
उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ श्रमिक उससे कहीं अधिक मूल्य पैदा करने लगता है जितना उसके स्वयं के रख रखाव तथा निरंतरता के लिए आवश्यक उत्पादों का कुल मिलाकर होता है। दूसरे शब्दों में वह 'अतिरिक्त मूल्य' पैदा करने लगता है। सोने-चाँदी की निश्चित मात्रा के बदले में कामगार, उत्पादक के तौर पर बिचौलिये को जितना संचित-श्रम सौंपता है, अपभोक्ता के तौर पर उससे कम पाता है। अर्थात कामगार के लिए किसी भी उत्पाद का क्रय मूल्य उसके विक्रय मूल्य से अधिक होता है। इसके बिल्कुल उलट बिचौलिया कम क़ीमत पर ख़रीद कर उसी उत्पाद को अधिक क़ीमत पर बेचता है। बिचौलिये को होने वाली कमाई का संबंध उसके श्रम से न हो कर उसके द्वारा ख़रीदे और बेचे गये उत्पादों के मूल्य के अंतर से हो गया है। जितना ज़्यादा विनिमय उतनी ही अधिक कमाई।
उत्पादन-उपभोग की प्रक्रिया में श्रम विभाजन के आधार पर उत्पादक तथा बिचौलियों की मौजूदगी के वाबजूद, उत्पाद का वितरण आदान-प्रदान के आधार पर होने के कारण, अभी तक समाज आर्थिक हितों के आधार पर वर्गों में विभाजित नहीं था क्योंकि हर कोई किसी न किसी रूप में उत्पादक था। पर उत्पादों का वितरण विनिमय मूल्य के आधार पर होने के कारण बिचौलिये का हित उसके श्रम से असंबद्ध हो कर अतिरिक्त मूल्य से संबद्ध हो गया और अतिरिक्त मूल्य में उत्पादक तथा बिचौलिये के हित परस्पर विरोधी होने के कारण समाज दो वर्गों में विभाजित हो गया, उत्पादक और बिचौलिया।
उत्पादक शक्तियों का निरंतर विकास सामाजिक-संरचना की प्रकृति है और जहाँ पहले कच्चे माल को उत्पाद में परिवर्तित करने की प्रक्रिया एक ही कामगार द्वारा पूरी की जाती थी वहीं अब पूरी प्रक्रिया अनेकों चरणों में बंट कर अनेकों कामगारों द्वारा पूरी की जाने लगी। कई चरणों में बंटी प्रक्रिया ने जहां प्रत्यक्ष रूप से कामगारों को विभाजित किया वहीं परोक्ष तौर पर पूरी उत्पादन क्रिया ने अवचेतन स्तर पर कामगारों को एक किया। उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ, श्रमिक, श्रम-विभाजन और यांत्रिक तथा स्वचलित मशीनों के प्रयोग के कारण, एक निश्चित श्रम-काल में, पहले के मुकाबले कहीं अधिक उत्पाद पैदा करने लगता है और हर उत्पाद में पहले के मुकाबले कम श्रम अंतर्निहित होने लगता है अर्थात उत्पादों का मूल्य कम होता जाता है।
 धीमे-धीमे उत्पादन इतनी अधिक मात्रा में होने लगा कि उत्पादों का विनिमय समाज की भौगोलिक सीमाओं के पार अपरिहार्य हो गया। विस्तृत विनिमय ने क़बीलाई सीमाओं को तोड़ कर राज्यों के गठन का रास्ता खोल दिया। राज्यों के गठन के साथ क़बीलाई सत्ता का स्थान राजसत्ता ने ले लिया।
भौतिक उत्पाद होने के नाते सोना-चाँदी उपभोग की वस्तुएँ भी थीं और अलग-अलग क्षेत्रों में तकनीकी विकास का स्तर अलग-अलग होने के कारण उनका मूल्य भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग होता था। विनिमय के क्षेत्र के भौगोलिक विस्तार के कारण सोने-चाँदी की मात्रात्मक इकाई के आधार पर होने वाले विनिमय में विसंगतियाँ पैदा होने लगीं। और विसंगतियों को दूर करने के लिए राज्य द्वारा प्रमाणित मानक इकाई अर्थात सिक्के या मुद्रा ने विनिमय के मानक के रूप में सोने-चाँदी की मात्रात्मक इकाई का स्थान ले लिया। राज्य द्वारा प्रमाणित होने के कारण मुद्रा के भौतिक स्वरूप (अधिरचना) का प्रतिबिंब सामाजिक चेतना में मुद्रा के मूल्य (आंतरिक रचना) का पर्याय बनता चला गया और वास्तविक मूल्य उसके विनिमय मूल्य से असंबद्ध होता चला गया और अंततः सामाजिक रूप से स्वीकार्य मुद्रा के विनिमय मूल्य का सिक्कों में अंतर्निहित संचित श्रम अर्थात सोने-चाँदी की मात्रा से कोई संबंद्ध नहीं रह गया। अब विनिमय की मानक मुद्रा का रूपांतरण एक भौतिक उत्पाद की जगह सामाजिक-वैचारिक उत्पाद के रूप में हो गया। अब मुद्रा पर्याय हो गई सामाजिक रूप से मान्य इस आश्वासन की कि राजसत्ता के द्वारा सत्यापित मुद्रा के बदले में निश्चित मानवीय श्रम हासिल किया जा सकता है - पहले से किया जा चुका संचित श्रम, उत्पाद के रूप में, या भविष्य में श्रम-शक्ति द्वारा निर्धारित समय में किया जा सकने वाला श्रम, मज़ूरी के रूप में।
सामाजिक रूप से मान्य आश्वासन के साथ उत्पाद के मूल्य ने, उत्पाद के भौतिक स्वरूप अर्थात उसमें अंतर्निहित संचित-श्रम से पूरी तरह से असंबद्ध, सामाजिक-वैचारिक चेतना में अवस्थित एक विचार का रूप ले लिया और मुद्रा उस विचार का मूर्त रूप बन गई। मुद्रा का भौतिक स्वरूप कुछ भी हो उसका स्वयं का, क़ीमत या विनिमय के मानक की इकाई के रूप में, मूल्य पूरी तरह एक वैचारिक वस्तु है, राजसत्ता के आश्वासन का पर्याय। इसके साथ ही एक और नई परिस्थिति पैदा हुई। पहले मानवीय-श्रम मुद्रा के भौतिक अस्तित्व से संबद्ध था इस कारण बिचौलियों के पास संपत्ति के रूप में संचित मानवीय श्रम की सीमा थी और हेराफेरी की संभावना कम थी पर मानवीय-श्रम के, मुद्रा के राजसत्ता प्रदत्त आश्वासन के वैचारिक स्वरूप के साथ संबद्ध हो जाने के कारण हेराफेरी करना आसान हो गया था। पहले प्राकृतिक संपदा सामूहिक स्वामित्व में होने के कारण कामगार को सहज सुलभ थी और उत्पादन के औज़ार कामगार के स्वामित्व में थे इस कारण उत्पाद और उसमें अंतर्निहित अतिरिक्त मूल्य भी कामगार के आधिपत्य में रहता था पर अब बदली हुई परिस्थिति में बिचौलियों ने राजसत्ता की मदद से प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करना शुरु कर दिया। इसके साथ ही संचित संपत्ति पर अधिकार के चलते उत्पादन के साधनों में विकास का सारा फ़ायदा भी बिचौलियों को ही मिलने लगा और पूरी उत्पादन-वितरण प्रक्रिया बिचौलियों के नियंत्रण में सिमटने लगी। बिचौलियों ने राजसत्ता के साथ मिलकर हेराफेरी करना और नये उन्नत उत्पादन के साधनों के ज़रिए सस्ते मूल्य पर उत्पादन करना शुरु कर दिया। फलस्वरूप पारंपरिक उत्पादन के साथ हस्तकारों का प्रतिस्पर्धा में टिके रहना असंभव हो गया। श्रम के औज़ारों के बिक जाने के बाद कामगार के पास अपना जीवन चलाने के लिए अपनी श्रम-शक्ति के अलावा बेचने लायक कुछ भी नहीं बचा था।
अब बाज़ार में एक ओर बिचौलिया था जिसके पास निजी संपत्ति के रूप में उत्पादन के सारे साधन हासिल थे पर उत्पादन करने के लिए आवश्यक श्रम-शक्ति नहीं थी, और दूसरी ओर था श्रमिक जिसके पास श्रम-शक्ति तो थी पर श्रम के साधन नहीं थे जिनके ज़रिए वह उत्पादन कर अपने लिए जीवन के साधन जुटा सकता। और यहीं से शुरुआत होती है श्रम की जगह श्रम-शक्ति की ख़रीद-फ़रोख़्त की और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की। अब कामगार उत्पादक न हो कर स्वयं उत्पाद बन गया। मार्क्स के पहले के सभी अर्थशास्त्री इस प्रक्रिया को पहचानने में नाकाम रहे। ग़ैर-मार्क्सवादी अभी भी नहीं समझ पाते हैं कि श्रमिक को दी जाने वाली मज़दूरी उसकी श्रम-शक्ति की एक निश्चित अवधि की क़ीमत होती है न कि उस अवधि में श्रम-शक्ति द्वारा उत्पाद में अंतरित किये गये श्रम के रूप में पैदा किये गये मूल्य की।
मार्क्सवाद के अनुसार मानव समाज एक जैविक संरचना है, अपने अवयवों से गुणात्मक रूप से भिन्न। एक सामाजिक-आर्थिक संरचना जिसके मानव रूपी अवयव जीवन निर्माण और निरंतरता की जैविक प्रकृति के कारण सामाजिक-आर्थिक क्रिया-कलापों के ज़रिए एक दूसरे जुड़े रहते हैं। यह जुड़ाव मूलत: वैचारिक है और इस कारण यह जैविक संरचना एक वैचारिक चेतना है जिसका अपना भौतिक स्वरूप कोई नहीं है पर भौतिक आधार मानवीय इकाइयाँ हैं जिनके सामूहिक व्यवहार के ज़रिए उसका प्रकटीकरण होता है। समाज की सामूहिक चेतना मानव की व्यक्तिगत चेतना से गुणात्मक रूप से भिन्न है। एक व्यक्ति अलग-अलग समय पर या एक ही समय पर, गुणात्मक रूप से भिन्न दो अलग-अलग सामाजिक चेतनाओं का वाहक हो सकता है। इस कारण आज भी एक ही राज्य की सीमाओं के अंदर तीनों विभिन्न प्रकार की सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं की मौजूदगी देखी जा सकती है। मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम से अनभिज्ञ होने के कारण सभी वामपंथी तथा ग़ैर-मार्क्सवादी समाज की संरचना को सही-सही समझ पाने में असमर्थ हैं।
 पूँजीवादी समाज एक विशिष्ठ सामाजिक-आर्थिक संरचना (Socio-economic Formation) है, और पूँजीवाद उसकी चेतना है। इस समाज की भौतिक-सामाजिक चेतना (Material-social Consciousness) का भौतिक आधार है संपदा और उत्पादन के साधनों का निजी स्वामित्व में, ग़ैर-कामगारों के हाथों में होना, न केवल स्वामी के जीवनकाल में बल्कि मृत्यु के बाद भी वसीयत के अधिकार के रूप में। और जिसकी वैचारिक-सामाजिक चेतना (Ideological-social Consciousness) का आधार है उत्पादन संबंध, उद्यमी तथा सर्वहारा के बीच संबंध जो इस अवधारणा पर आधारित है कि उत्पादन प्रक्रिया की चालक शक्ति उद्यमी की इच्छा शक्ति है न कि श्रमिक की श्रम-शक्ति, और मज़दूर को दी जाने वाली मजूरी उसके श्रम की क़ीमत है न कि एक निश्चित कार्य-काल के लिए ख़रीदी गयी उसकी श्रम-शक्ति की। और इस कारण मज़दूर के द्वारा उत्पाद में जोड़े गये श्रम अर्थात उस के मूल्य में की गई वृद्धि पर मालिक का पूरा-पूरा हक़ है न कि श्रमिक का। इस कारण श्रमिक को उसकी श्रम-शक्ति का मूल्य चुकाने के बाद बचा हुआ अतिरिक्त मूल्य मुनाफ़े के रूप में पूँजी के लागत मूल्य में जुड़ जाता और संचित मूल्य के रूप में पूँजी के निरंतर इज़ाफ़े का आधार है़। इस सामाजिक-चेतना में निजी स्वामित्व की अवधारणा का मूर्त रूप है पूँजीपति और साधन-रहित श्रम-शक्ति का मूर्त रूप है सर्वहारा। पूँजीवाद की अंतर्वस्तु है पूँजीवादी उत्पादन-संबंध अर्थात उत्पादन प्रक्रिया में पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य के बँटवारे में इच्छा-शक्ति तथा श्रम-शक्ति के बीच संबंध, यानि साधन-संपन्न निजी स्वामित्व की अवधारणा तथा साधन-वंचित श्रम-शक्ति के बीच अतिरिक्त मूल्य के उत्पादन तथा बँटवारे में उनका अंतर्संबंध, और उसकी अधिरचना है राजसत्ता तथा वे सारे प्रतिष्ठान जो पूँजीवादी समाज को जीवन-शक्ति तथा निरंतरता प्रदान करते हैं। वामपंथियों की सारी नासमझी का कारण है अधिरचना को अंतर्वस्तु समझ लेना।
वामपंथियों की समझ की एक और बड़ी कमी है, वह है उनकी पूँजी के बारे में समझ। वे न पूँजी और संपत्ति के भेद को समझते हैं और न पूँजी की अंतर्वस्तु और अधिरचना में भेद कर पाते हैं। संपत्ति संचित श्रम की निष्क्रिय अवस्था है जो निष्क्रिय होने के कारण स्वत: वृद्धि में सक्षम नहीं है। पूँजी संचित-श्रम की सक्रिय अवस्था है जिस के अंतर्गत संचित-श्रम या मूल्य, उत्पाद के उत्पादन-उपभोग-चक्र की चालक शक्ति के रूप में, अपनी सक्रिय भूमिका के जरिए श्रम द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य को हासिल कर स्वयं की वृद्धि करता है।
उत्पादन की प्रक्रिया में उत्पाद्य (Object of labour) तथा श्रम-साधन (Means of labour) में पहले से किया जा चुका संचित-श्रम उत्पाद में हस्तांतरित होता है जब कि श्रम-शक्ति द्वारा पैदा किया गया श्रम उत्पाद में अंतरित होता है। हस्तांतरण में लागत के रूप में मूल्य का एक बिंदु से दूसरे बिंदु पर केवल स्थांतरण होता है, नया मूल्य पैदा नहीं होता है। लागत पूँजी श्रम-साधन से उत्पाद्य में हस्तान्तरित होती है, उस के मूल्य में कोई इज़ाफ़ा नहीं होता है। पर श्रम-शक्ति द्वारा पैदा किया गया मूल्य, श्रम-शक्ति ख़रीदने के लिए मजूरी के रूप में श्रमिक को भुगतान किये गये मूल्य से अधिक होता है और यही वह अतिरिक्त मूल्य है जो पूँजी के स्व-विस्तार का आधार है। यही अतिरिक्त मूल्य है जो मुनाफ़े के रूप में उत्पादन-वितरण-उपभोग की प्रक्रिया में लगी पूँजी के विभिन्न रूपों के बीच बँटता है। इसी की बंदरबाँट के लिए विभिन्न पूँजीपति निरंतर संघर्षरत रहते हैं। बड़ा पूँजी समूह अपनी बड़ी ताक़त के आधार पर अतिरिक्त मूल्य का बड़ा हिस्सा हड़प लेता है और इसी प्रक्रिया के ज़रिए पूँजी का विस्तार तथा एकत्रीकरण होता रहता है।
 जैसा ऊपर दर्शाया गया है राजसत्ता के आश्वासन के साथ उत्पादों के मूल्य ने पूरी तरह सामाजिक-वैचारिक चेतना में अवस्थित एक विचार का रूप ले लिया और मुद्रा उस विचार का मूर्त रूप बन गई। पूँजी के एकत्रीकरण के साथ-साथ पूँजी के केंद्र, महाजन तथा बैंक स्वयं इतने शक्तिशाली हो गये कि उनके स्वयं के आश्वासनों ने राजसत्ता के आश्वासनों की भूमिका निभाना शुरु कर दिया। पूंजीवाद के शुरुआती दौर में पूंजी वितरण के क्षेत्र में ही सक्रिय थी इस कारण अतिरिक्त मूल्य पूरी तरह उसके आधिपत्य में नहीं था। पर श्रम-साधनों के विकास और सर्वहारा के प्रसार के साथ पूँजी ने उत्पादन के क्षेत्र पर भी अधिकार करना शुरु कर दिया। अब मूल्य के उत्पादन और वितरण दोनों पर अधिकार होने के साथ ही पूँजी ने समाज की वैचारिक-चेतना को भी अपने प्रभाव में ले लिया। समाज की वैचारिक-चेतना में वर्चस्व हासिल करने के साथ ही पूँजीवाद ने सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं के पारंपरिक उत्पादन आधार तथा संबंधों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया। उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ पूंजी के लिए राष्ट्र-राज्य की भौगोलिक सीमायें बेमानी होने लगीं। आर्थिक गतिविधियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप हासिल कर लेने के बाद राजसत्ता के आश्वासनों का स्थान महाजनों और बैंकों के आश्वासनों ने ले लिया और मूल्य के मूर्त रूप का स्थान महाजनों की हुंडियों और बैंकों की गारंटियों ने।
औद्योगिक विकास एक साथ अलग-अलग राज्यों में होने के साथ-साथ पूँजी के भी अलग-अलग केंद्र विकसित होने लगते हैं। शुरुआती दौर में पूँजीवाद को अपने विकास और सुरक्षा के लिए राज्य की भौतिक शक्ति की आवश्यकता थी और उसे राज्य की स्वायत्तता के अंतर्गत रहना पड़ता था। पूंजी के अलग-अलग केंद्रों की पहचान अपने-अपने राज्य के भौतिक अस्तित्व से की जाती थी। असमान विकास के कारण पूँजी के अलग-अलग केंद्रों के बीच संघर्ष राज्यों के बीच संघर्ष के रूप में प्रकट होता है। पर अपनी उच्चतम अवस्था में पहुंचने पर पूंजी का चरित्र स्थानीय से हट कर वैश्विक हो जाता है, मूल्य के मानक राज्य के आश्वासन की जगह महाजनों तथा बैंकों के आश्वासन ले लेते हैं। बड़ी पूंजी का छोटी पूँजी के ऊपर प्रभुत्व, अपने भौतिक स्वरूप में बड़े साम्राज्यों के अपने उपनिवेशों के ऊपर वित्तीय तथा आर्थिक आधिपत्य के रूप में नज़र आता है।
अलग-अलग राज्यों में राजसत्ता समर्थित मुद्रा अभी भी उत्पादन-वितरण का माध्यम थी पर ब्रेटन-वुड्स समझौते के अंतर्गत मूल्य का मानक अमेरिकी डालर स्वीकार कर लिए जाने के बाद पूँजी के लिए अबाध अंतर्राष्ट्रीय गतिविधि का रास्ता भी साफ़ हो गया। अब पूँजी का वैश्विक स्वरूप पूरी तरह वैचारिक-सामाजिक चेतना का हिस्सा हो गया था, उत्पादों के किसी भी भौतिक स्वरूप से पूरी तरह असंबद्ध, राजसत्ताओं द्वारा समर्थित मुद्रा से भी असंबद्ध। उत्पादन-वितरण-उपभोग की प्रक्रिया का क्षेत्र वैश्विक हो जाने के कारण अब उत्पादन-वितरण-उपभोग प्रक्रिया की चालक-शक्ति के रूप में पूँजी का कार्यक्षेत्र पूरी तरह से दो भिन्न स्तरों में बंट गया है।
किसी भी राज्य की भौगोलिक सीमाओं के अंदर विनिमय मूल्य का मानक मुद्रा ही है, और पूँजी का कार्य है उत्पादन-वितरण-उपभोग की प्रक्रिया के संचालन के लिए उत्पादन के साधन और श्रम-शक्ति जुटाने के लिए आवश्यक संचित श्रम अर्थात मूल्य यानि मुद्रा की व्यवस्था करना।
 उत्पादक-शक्तियों के भौतिक स्वरूप के संचालन के लिए मूल्य के मूर्त रूप मुद्रा के प्रबंधन के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पूँजी के कार्य का आयाम पूरी तरह वैचारिक-सामाजिक-चेतना के दायरे में सीमित हो गया है, - विभिन्न राज्यों के बीच मूल्य के निर्बाध आवागमन के लिए मुद्रा की व्यवस्था और प्रबंधन करना, भौतिक स्तर पर न हो कर वैचारिक स्तर पर-, और इस प्रक्रिया में मुद्रा स्वयं एक विनिमय उत्पाद बन जाती है। श्रम-शक्ति द्वारा अतिरिक्त मूल्य का उत्पादन एक राष्ट्र-राज्य की सीमा के अंदर ही किया जाता है पर उसका विनिमय और वितरण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है। इस कारण एकीकृत वित्तीय पूँजी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मुद्रा की ख़रीद-फ़रोख़्त के ज़रिए अतिरिक्त-मूल्य को बटोरने लगती है। अब एकीकृत अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी की रुचि केवल मुद्रा के स्वामित्व में रह गई है। उत्पादन के भौतिक साधनों का स्वामित्व व्यापक स्तर पर शेयर तथा स्टॉक के रूप में आम जनता को सौंप कर, अब पूँजी की रुचि रह गई है व्यापक जनता की अवचेतना में निजी स्वामित्व के विचार को सुदृढ़ कर पूँजीवादी वैचारिक-सामाजिक-चेतना का आधार पुख़्ता करना ताकि अतिरिक्त मूल्य का विनियमन तथा पूँजी के साथ विलय सहज सुचारू चलता रहे।
उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ केंद्रीकृत उत्पादन व्यवस्था उस स्तर पर पहुँच चुकी है जहां एक उत्पादन केंद्र लाखों करोड़ों उपभोक्ताओं की मांग की आपूर्ति करता है और इस कारण ज़रूरी है कि वितरण व्यवस्था भी उसी स्तर तक विकसित तथा केंद्रीकृत हो। जहाँ पहले कुछ एक ग्राहकों की रोज़ाना की ज़रूरतों की आपूर्ति छोटी-छोटी दुकानों के ज़रिये पूरी की जाती थी वहीं अब उपभोक्ता चाहता है कि उसकी सभी ज़रूरतों की आपूर्ति एक ही माॅल या स्टोर के ज़रिए हो जाय।। मल्टी ब्रांड का खुदरा वितरण एक बड़े स्टोर या माॅल द्वारा करने पर बिचौलिए तथा उपभोक्ता दोनों के श्रम तथा समय दोनों की बचत होती है इससे वितरण प्रक्रिया में उत्पाद में जुड़ने वाले मूल्य में कटौती होती है। ज़ाहिर है छोटे दुकानदार के ज़रिए उपभोक्ता तक पहुं़चने वाले उत्पाद के मुक़ाबले बड़े स्टोर या माॅल के ज़रिए पहुँचने वाले उत्पाद का मूल्य कम होता है । साथ ही गुणवत्ता की आश्वस्तता के कारण तथा अपने स्वयं के समय तथा श्रम की बचत के कारण ग्राहक अधिक क़ीमत देने के लिए भी तैयार रहता है। उस स्तर की वितरण व्यवस्था की स्थापना, विशाल पूँजी निवेश तथा विकसित वितरण व्यवस्था के विशिष्ट तकनीकी ज्ञान के बिना असंभव है।
ज़ाहिर है मल्टी ब्रांड के खुदरा व्यापार में बड़े-बड़े माॅल तथा स्टोर की स्थापना विकसित होती भारतीय अर्थव्यवस्था, विशाल बाज़ार तथा उपभोक्ता की आकाँक्षा के पूरी तरह अनुकूल है। पूंजी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय स्तर हासिल कर लेने के बाद इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि खुदरा व्यापार में निवेशित पूँजी का नियंत्रण करने वाला संस्थान देश में स्थित है या देश के बाहर स्थित है। उपभोक्ता तो हर कोई है और उनकी तुलना में छोटे बिचौलियों की संख्या नगण्य है। इस कारण मल्टी ब्रांड के खुदरा व्यापार में बड़े-बड़े माॅल तथा स्टोर की स्थापना का किसी भी रूप में विरोध जन आकांक्षाओं के विरुद्ध होने के कारण असफल होने के लिए अभिशप्त है।
बड़े स्तर की वितरण व्यवस्था के मुकाबले में प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए छोटे दुकानदार के लिए जरूरी हो जाता है कि वह अपना जीवन स्तर घटाये और इसके ज़रिए वितरण में लगने वाली अपनी श्रम-शक्ति का तथा अपने श्रम का मूल्य घटाये। वह अपनी निम्न-मध्य वर्गीय मानसिकता के कारण 14 घंटे रोज़ ख़र्च की गई अपनी श्रम-शक्ति तथा माल की ढुलाई में ख़र्च किये गये अपने श्रम के सही मूल्याँकन से अनजान, बड़ी पूंजी की संघठित वितरण व्यवस्था के ख़िलाफ़ प्रतिस्पर्धा में, निरंतर अपने जीवन स्तर को घटा कर ही टिका रह पाता है।
अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूँजी ने छोटे दुकानदार को भी, अपनी निम्न-मध्य-वर्गीय मानसिकता के बावजूद, सर्वहारा के समकक्ष खड़ा कर दिया है। निम्नतम स्तर पर भी अपने संस्थान के निजी स्वामित्व की अवधारणा के कारण छोटा दुकानदार निम्न मध्य-वर्गीय मानसिकता से छुटकारा नहीं पा पाता है और अनजाने ही पूँजीवादी चेतना का वाहक बना रहता है। सर्वहारा वर्ग का दायित्व है कि वह छोटे दुकानदार को समझाये कि उसके अपने हित में है कि वह पूँजीवादी नज़रिये को छोड़ कर सर्वहारा के नजरिये को अपनाये क्योंकि यही मानव समाज के हित में है। और इस रूप में मार्क्सवादियों को मल्टी-ब्रांड उत्पाद के खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का समर्थन करना चाहिये ताकि भौतिक परिस्थितियाँ पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्विरोधों को बेनक़ाब कर सर्वहारा वर्ग की एकजुटता को मज़बूत कर सकें।

सुरेश श्रीवास्तव
जनवरी, 2013


तीसरे मोर्चे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

(मार्क्स दर्शन के जुलाई-सितम्बर 2012 में छपे लेख का सारांश)

तीसरे मोर्चे का वैज्ञानिक दृष्टिकोण
(सुरेश श्रीवास्तव)

इस अंक में हम सुरेश श्रीवास्तव का एक लंबा लेख छाप रहे हैं। इस लेख के अंश अलग-अलग पहले भी छप चुके हैं। एक अंश हंस के फरवरी 2004 के अंक में चुनाव से ठीक पहले छपा था तथा 2009 के चुनाव से ठीक पहले पूरा लेख एक पैंफलेट के रूप में छपा था। जिस गलती के प्रति इन लेखों में आगाह किया गया था और जिसे वामपंथी नेतृत्व बार-बार दोहराता रहा है वह है, संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों का गलत विश्लेषण और जिसका मूल कारण है नेतृत्व की मार्क्सवाद की संशोधनवादी समझ। 2014 के चुनाव से पहले यह पेंफलेट हूबहू फिर से छापा जा रहा है क्योंकि वामपंथी नेतृत्व फिर उन्हीं गलतियों को दोहराने पर आमादा है - बुर्जुआ संसद में कुछ सीटें हासिल करने के लिए अवसरवादी पार्टियों के साथ अवसरवादी समझौते और उन समझौतों के सत्यापन पर काडर की मुहर के मकसद से काडर को मानसिक रूप से तैयार करने के लिए वही घिसी-पिटी दलीलें।
            लेनिन ने लिखा था बेझिझक एक गलती को स्वीकार करना, उसके कारणों को सुनिश्चित करना, उन परिस्थितियों का विश्लेषण करना जिनके कारण गलती हुई, और उसके सुधार के उपायों को ढूंढना - यह एक गंभीर पार्टी का मानदंड है। इस कसौटी पर भारतीय वामपंथियों ने साबित कर दिया है कि वे वर्ग की पार्टी नहीं हैं, बल्कि एक गुट हैं, जनता की पार्टी नहीं हैं, बल्कि बौद्धिकवादियों तथा कुछ कामगारों जो बौद्धिकवाद के निकृष्टतम लक्षणों की नकल करते हैं, की एक मंडली भर हैं।
            मार्क्स ने लिखा था इतिहास अपने को दोहराता है पर पहली बार वह त्रासदी होता है और दूसरी बार फरेब। वामपंथी नेतृत्व ने अपने काडर तथा मेहनतकश जनता के साथ बार-बार फरेब किया है।
                        इस पैंफलेट के अंत में लिखा गया था सांप्रदायिकता के हमले से बचने के लिए भाजपा के विरोधी के रूप में कांग्रेस को समर्थन कर उसे मजबूत करना गलत होगा। आज के संदर्भ में जोड़ा जा सकता है और संशोधनवादी नजरिए के कारण मल्टीब्रांड खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का विरोध करने के लिए कांग्रेस के विरोधी के रूप में सुषमा स्वराज द्वारा पेश किये गये प्रस्ताव का समर्थन कर भाजपा को मजबूत करना गलत होगा। यहां प्रासंगिक होगा जो लेनिन ने संशोधनवादियों के फरेब को उजागर करते हुआ लिखा था। ध्वस्त प्राकृतिक अर्थव्यवस्था के अवशेषों पर लघु-उत्पादन अपने आप को, निरंतर गिरते पोषण स्तर के द्वारा, दीर्घकालिक भुखमरी के द्वारा, लम्बे होते कार्य दिवस के द्वारा तथा पशुधन की गुणवत्ता तथा देख-भाल में ह्यास के द्वारा, बरकरार रख पाता है, एक शब्द में, उसी प्रणाली के द्वारा जिस के द्वारा हस्तशिल्प उत्पादन ने पूंजीवादी उत्पादन से मुक़ाबले में अपने को थामे रखा था। पूंजीवादी समाज में विज्ञान तथा तकनीकी की हर प्रगति अनिवार्य रूप से बिना किसी मुरव्वत के लघु-उत्पादन के आधार को खोखला करती है, और यह समाजवादी राजनैतिक अर्थशास्त्री का दायित्व है कि इस प्रक्रिया, अक्सर क्लिष्ट तथा पेचीदी, की उसके सभी रूपों में पड़ताल करे और लघु-उत्पादक को दर्शाए कि पूंजीवाद के तहत उसका अपने बल पर बचे रहना असंभव है, पूंजीवादी व्यवस्था के तहत कृषक आधारित कृषि-उत्पादन का कोई भविष्य नहीं है और किसान के लिए सर्वहारा के दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक है। इस प्रश्न पर संशोधनवादियों ने अपराध किया है, वैज्ञानिकता के अर्थ में, एकपक्षीय तथ्यों को चुन कर और संपूर्ण पूंजीवादी व्यवस्था के संदर्भ से काट कर सतही तौर पर सर्वव्यापक दिखा कर। राजनैतिक दृष्टिकोण से उन्होंने अपराध किया है इस तथ्य के आधार पर कि चाहे या अनचाहे उन्होंने किसानों को, क्रांतिकारी सर्वहारा के नजरिये की जगह छोटे मालिकों के नजरिये को (अर्थात बुर्जुआ नजरिये को) अपनाने का आग्रह किया।
हम आशा करते हैं कि वामपंथी पार्टियों का काडर, संशोधनवादी रुझानों (दक्षिणपंथी तथा वामपंथी दोनों) को समझने के लिए मार्क्सवाद के सभी आयामों विशेषकर दार्शनिक आयाम की सही समझ हासिल करेगा और अपने नेतृत्व की आलोचना करने से परहेज नहीं करेगा।
संपादक
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तीसरा मोर्चा : समय की मांग

सोवियत संघ के पतन के बाद विश्व वित्तीय पूंजी के केंद्रीकरण में शोषक वर्ग के विभिन्न समूहों में टकराहट की जगह एकजुटता नजर आती है जिसमें बहुत से बुद्धिजीवी अवैज्ञानिक दृष्टिकोण के चलते मार्क्स की ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा को नकारते हुए इतिहास के अंत की घोषणा कर रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि किन्हीं पड़ावों पर शोषक वर्ग की जीत की संभावना मार्क्सवादी चिंतन और विश्लेषण के लिए अनहोनी नहीं है।
            अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए औरों के साथ मिलकर समूह का गठन मानव की एक सहज क्रिया है। सामाजिक विकास के साथ मानव की दिनचर्या में विभिन्न कार्य-कलापों की संख्या भी बढ़ती गई है और साथ ही समूहों की भी। इस  कारण समाज विभिन्न समूहों में बंटा नजर आता है तथा हर व्यक्ति अनेकों समूहों में मौजूद नजर आता है। एक व्यक्ति का हित दूसरे व्यक्ति के हित का एक समूह में पूरक हो सकता है तो दूसरे में विरोधी और यह इस पर निर्भर करेगा कि उसके उद्देश्य की पूर्ति सहयोग से होती है या विरोध से। जो चीज व्यक्ति पर लागू होती है वही समूह पर भी लागू होती है अर्थात समूहों में भी सहयोग तथा विरोध की स्थिति हो सकती है। चूंकि मानव के अस्तित्व तथा जीवन का आधार प्राकृतिक तथा मानव निर्मित संसाधनों के उपयोग पर निर्भर है इस कारण जिस समाज में प्राकृतिक तथा मानव निर्मित संसाधनों पर कुछ लोगों का स्वमित्व होता है और शेष को संसाधनों के उपयोग के लिए उनके रहमो-करम पर निर्भर रहना होता है उस समाज में संपन्न-वर्ग तथा वंचित-वर्ग के बीच हमेशा संघर्ष की स्थिति रहेगी।
            प्रत्यक्ष रूप से अनेकों सामूहिक गतिविधियां सामूहिक संसाधनों के उपभोग से असंबद्ध नजर आती हैं पर परोक्ष में सभी व्यक्तियों तथा समूहों की सभी गतिविधियां किसी न किसी रूप में सामूहिक संसाधनों के स्वामित्व तथा उपभोग के विचार से प्रभावित रहती हैं। शोषण व्यवस्था को व्यवस्थित करने के उद्देश्य से अन्य समूहों के मुकाबले राजसत्ता, समाज की विकास प्रक्रिया में सबसे शक्तिशाली संरचना के रूप में उभरी है। शुरुआती दौर में शोषण व्यवस्था को कायम रखने के लिए राजसत्ता के लिए हिंसा का प्रयोग आसान था पर शोषित वर्ग की जागरूकता तथा एकजुटता बढ़ने के साथ-साथ हिंसा का प्रयोग कठिन होता चला गया। संघर्ष की तीव्रता कम करने के उद्देश्य से शोषक वर्ग ने राष्ट्र राज्य की अवधारणा विकसित की और शोषित वर्ग को भ्रमित करने के लिए लोकतंत्रात्मक शासन व्यवस्था सबसे अधिक कारगर साबित हुई है।
            समाज पर नियंत्रण तथा उसके संचालन के लिए राजसत्ता सबसे शक्तिशाली संरचना है इसीलिए हर वर्ग या समूह राजसत्ता पर नियंत्रण के लिए अपने-अपने हितों के अनुरूप राजनैतिक समूहों का गठन करता है। सभी राजनैतिक समूहों का अंतिम लक्ष्य राजसत्ता पर काबिज होना है। सभी राजनैतिक दल अपने कार्य-कलापों मे अपनी-अपनी विचारधारा द्वारा संचालित होते हैं। किसी भी राजनैतिक दल की विचारधारा का विकास उसके सदस्यों के विचारों और स्वार्थों तथा उसके अन्य सामाजिक समूहों के साथ अंतवर््यवहार पर निर्भर करता है। चूंकि हर व्यक्ति तथा हर समूह की मानसिकता सामूहिक संसाधनों के स्वामित्व तथा उपभोग के प्रश्न से किसी न किसी रूप में जुड़ी होती है इस कारण हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में राजनैतिक समूहों को प्रभावित करता है और उनसे प्रभावित होता है।
            जैसा कि पहले दर्शाया गया है वर्ग विभाजित समाज में संघर्ष दो स्तर पर कार्यरत है। एक ओर तो शोषित वर्ग शोषक वर्ग के विरुद्ध संघर्षरत है दूसरी ओर शोषक वर्ग के विभिन्न समूहों में आपसी संघर्ष है। पहले संघर्ष के लिए शोषक वर्ग शोषित वर्ग को भ्रमित करने के लिए ऐसे संगठनों का समर्थन करता है जो शोषित वर्ग के हितों के लिए काम करते नजर आएं पर परोक्ष में शोषित वर्ग में विघटन पैदा कर शोषक वर्ग के हाथ मजबूत करें और शोषित वर्ग के संघर्ष को गुमराह करें।
            दूसरे संघर्ष के लिए भी विभिन्न समूहों का प्रादुर्भाव होता है। अपने वर्ग चरित्र के कारण एक ओर वे आपस में टकराते हैं तो दूसरी ओर शोषित वर्ग से। 
            यह विचार, कि जाति, भाषा, प्रदेश, धर्म आधारित समूहों के बीच हितों की टकराहट ही आम आदमी की दयनीयता और समस्याओं का मूल है, एक मायाजाल की भांति है जिसकी ओट में शोषक वर्ग शोषित वर्ग को विभिन्न समूहों में विभाजित करते हुए उसका शोषण जारी रख सकता है। समाज में शोषक वर्ग के लिए अन्य वर्गों के शोषण को वैध ठहराने के लिए आस्था आधारित धर्म सबसे उपयुक्त विचारधारा है और शोषित वर्गों के बीच वैमनस्य सबसे उपयुक्त साधन है।
            राजसत्ता की दौड़ और निजी टकराहट के चलते अनेकों राजनैतिक पार्टियां अस्तित्व में आती रहतीं हैं। वर्ग हितों के आधार पर सभी पार्टियां मूल रूप से दो खेमों में बंटीं होती हैं। एक वे जो शोषित वर्ग की एकजुटता को मजबूत करती हैं और दूसरी वे जो शोषित वर्ग की एकजुटता को कमजोर करती हैं। विचारधारा के आधार पर भी सभी राजनैतिक पार्टियां दो भागों में बंटीं होतीं हैं। एक वे जिनकी विचारधारा का मूल माकर््सवाद और दृष्टिकोण वैज्ञानिक है तथा दूसरी वे जिनकी विचारधारा का मूल धर्म व दृष्टिकोण अवैज्ञानिक है। सभी राजनैतिक दलों, जिनकी विचारधारा का मूल धर्म व दृष्टिकोण अवैज्ञानिक है, में शोषक वर्ग का अपने हितों और संसाधनों के चलते वर्चस्व होता है। राजनैतिक दल जिनकी विचारधारा मार्क्सवाद आधारित और चिंतन वैज्ञानिक होता है, शोषित वर्ग के उद्धार में समाज का हित देखते हैं। इस कारण उनमें सर्वहारा वर्ग का वर्चस्व होता है।
            राजनैतिक परिवेश में अनेकों पार्टियां अपने वर्चस्व के लिए जूझती नजर आती हैं। गैर-मार्क्सवादी विचारधारा वाली पार्टियों की धक्का-मुक्की सैद्धांतिक भी हो सकती है पर विशेष रूप से निजी स्वार्थों की टकराहट के चलते ही होती है पर मार्क्सवादी विचारधारा वाली पार्टियों की धक्का-मुक्की मूलतः सैद्धांतिक ही है। वामपंथी पार्टियों के बीच मतभेद सामाज की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक परिस्थितियों के आंकलन में भिन्न निष्कर्षों पर पहुंचने के कारण उपजते हैं।
            भारत एक राजनैतिक इकाई होने के बावजूद आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिकता के स्तर पर अनेकों राष्ट्रों का संघ है। शोषित वर्ग की लड़ाई के लिए सारे भारत को एकरूप अस्तित्व मान कर संघर्ष के लिए नीति तय करना वामपंथी पार्टियों की सबसे बड़ी भूल है। अनेकों वामपंथी पार्टियों की उपस्थिति जनता में भ्रम पैदा किए हुए है।
            राष्ट्रीय स्तर पर दो बुर्जुआ पार्टियों के विकल्प के बीच तथा क्षेत्रीय स्तर पर भी दो या दो से अधिक व्यक्तिवादी पार्टियों के विकल्प के बीच ही जनता को अपने प्रतिनिधि चुनने की मजबूरी है। वामपंथी पार्टियों का दायित्व है कि वे आपस में एका पैदा करें और भारतीय जनता के सामने एक मार्क्सवादी विचारधारा आधारित विकल्प पेश करें। अनेकों वामपंथी पार्टियों के बीच अनेकों मतभेद हो सकते हैं पर उसके बावजूद न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एकजुटता पैदा की जा सकती है। सबसे बड़ी पार्टी के नाते सीपीएम की जिम्मेवारी है कि सभी वामपंथी पार्टियों का आह्वान करे कि आम-सहमति के आधार पर न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करें जिसके आधार पर एक जुट होकर जनता के सामने तीसरा विकल्प पेश किया जा सके।
            न्यूनतम कार्यक्रम तैयार करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा उसकी बेरोकटोक आवाजाही के लिए वैश्वीकरण की नीतियां शोषित वर्ग की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। कांग्रेस तथा भाजपा ऊपरी तौर पर सांप्रदायिकता के नाम पर एक दूसरे की विरोधी नजर आ सकती हैं पर मूल रूप में दोनों पार्टियां शोषक वर्ग की नुमाइंदगी करती हैं तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के सबसे बड़े पैरोकार के नाते शोषित वर्ग के संघर्ष को कमजोर करने में एकजुट हैं। शोषित वर्ग की लड़ाई में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा वैश्वीकरण की नीतियां प्रमुख मुद्दा है या उसके साथ-साथ सांप्रदायिकता भी अपने आप में महत्वपूर्ण मुद्दा है इस प्रश्न का उत्तर तीसरे विकल्प के लिए आम-सहमति का आधार तैयार करेगा।
            अगर सांप्रदायिकता को भी अपने आप में एक मुद्दा माना जाता है तो सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में कांग्रेस से भी सहयोग करना होगा क्योंकि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का केंद्र संघ परिवार तथा उसका राजनैतिक दल भाजपा ही है और केंद्र में जनता के सामने उसका विकल्प कांग्रेस के अलावा कोई नहीं है। पर कांग्रेस से सहयोग अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा वैश्वीकरण को मजबूत करेगा और शोषित वर्ग के संघर्ष को कमजोर करेगा। इस दुविधाजनक परिस्थिति का निदान संभव है अगर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा वैश्वीकरण की नीतियों तथा सांप्रदायिकता के संबंध को समझ लिया जाए।
             अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा वैश्वीकरण की नीतियां आधारभूत रूप में प्राकृतिक और मानव-निर्मित संसाधनों पर शोषक वर्ग की पकड़ मजबूत करने का ही प्रयास है और इसके खिलाफ किए जा रहे शोषित वर्ग के संघर्ष को कमजोर करने के लिए सभी हथकंडे अपनाए जाएंगे। उसकी एकजुटता को कमजोर करने के लिए धर्म, जाति, भाषा, प्रदेश आदि के आधार पर शोषित वर्ग को भ्रमित करने का हर संभव प्रयास किया जाएगा और अलग-अलग मुद्दों के लिए अलग-अलग समूहों का गठन भी होगा। इन सभी समूहों में आपस में, निजी हितों के चलते, अपने-अपने वर्चस्व के संघर्ष भी होंगे।
            राष्ट्रीय स्तर की दोनों प्रमुख पार्टियां कांग्रेस तथा भाजपा राजनैतिक संघर्ष के दो ध्रुव दिखाई दे सकते हैं पर मूल रूप में वर्ग संघर्ष में दोनों एक ही ध्रुव के दो रूप हैं। सीपीएम के एक प्रमुख नेता के शब्दों में "अपने वर्गीय चरित्र के अनुरूप ही पूंजीवादी-सामंती पार्टियों ने धर्म को राजनीति से अलग रखते हुए हमेशा धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत की ध्वजा को उठाए नहीं रखा। संकट की घड़ी में, जिसे हाल के काल में 80 के मध्य के बाद का काल कहा जा सकता है, कांग्रेस ने हिंदू सांप्रदायिकतावादियों और मुस्लिम तत्त्ववादियों के प्रति समझौतापरस्ती का रुख अपनाया। बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि के ताले को खोलना, 1986 में शाहबानो मामले में अदालत की राय को उलट देना और अयोध्या आंदोलन से इस प्रकार निपटना कि 1992 में बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया, इस बात के नग्न उदाहरण हैं कि किस प्रकार शासक दल ने चुनावी लाभ के लिए सांप्रदायिक ताकतों से समझौता किया।"  
             न केवल कांग्रेस और भाजपा ने बल्कि अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी समय-समय पर संप्रदायिकतावादी ताकतों से समझौता किया है। विभिन्न क्षेत्रीय दल आम राजनीति में जाति, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति आदि के आधार पर विभिन्न समूहों का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं पर नाजुक परिस्थितियों में उन्होंने बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता कर वर्ग संघर्ष की लड़ाई में शोषित वर्ग को नुकसान ही पहुंचाया है। राजनीति के समर क्षेत्र में जो भी दल धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति आदि के नाम पर संगठित हैं वे सभी मूल रूप में शोषक वर्ग के हित साधक हैं। कांग्रेस इन सब में अग्रणी है। यहां कांग्रेस के चरित्र को समझने के लिए इतिहास पर एक नजर डालना जरूरी है।
            1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में आम जनता ने धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति आदि के भेद को भूलकर एकजुट हो कर अंग्रेज शासकों तथा सामंत और व्यापारी वर्ग के रूप में उनके सहयोगियों के विरुद्ध संघर्ष किया था। आम जनता की एकता को तोड़ने के लिए अंग्रेजी पूंजीपतियों ने कांग्रेस की स्थापना की थी। कांग्रेस ने धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, संस्कृति आदि के आधार पर शोषित वर्ग की एकजुटता को खण्ड-खण्ड कर जन-संघर्ष को कमजोर करने का काम बखूबी अंजाम दिया। एक ओर हिंदू मुसलमानों के बीच धर्म के आधार पर इस हद तक वैमनस्य फैलाया कि उसकी परिणति लाखों बेगुनाहों के कत्ले-आम के साथ देश के विभाजन में हुई तो दूसरी ओर पूंजीपति तथा सामंत वर्ग के हाथ सत्ता हस्तांतरण के जरिए जन-संघर्ष की आग को ठंडा कर दिया। जहां और संगठन अलग अलग  विभाजनकारी भावनाओं का इस्तेमाल करते हैं वहीं कांग्रेस हर विभाजनकारी भावना का प्रयोग करती है।
            कांग्रेस तथा भाजपा दोनों ही अपने वर्ग चरित्र के अनुरूप राजसत्ता पर काबिज होने के लिए अपनी प्रचलित छवि के विपरीत नीतियां अपना सकती हैं। पर मूल रूप में शोषक वर्ग का प्रतिनिधि होने के नाते सत्तानशीन होने पर दोनों ही वे ही नीतियां अपनाती हैं जिनके विरोध का दिखावा वे विरोधी दल के रूप में करती नजर आती हैं। और दिल्ली में बैठी सरकार अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी तथा वैश्वीकरण की नीतियां 1991 से आज तक एक ही तरह चलाती रही है चाहे केंद्र में कांग्रेस की बहुमत वाली सरकार हो या भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार हो या फिर कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार हो।
            पिछले पंद्रह वर्षों का इतिहास दर्शाता है कि किस प्रकार जहां कांग्रेस ने सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा दिया वहीं भाजपा ने सांप्रदायिक ताकतों से दूरी बनाए रखी।
            1991 में सत्ता में आने के बाद नरसिम्हाराव सरकार ने राम-जन्मभूमि में कार-सेवा के नाम पर हिंदुत्ववादी ताकतों को देश भर में साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने की खुली छूट दी, कार सेवकों को अयोध्या में एकत्रित होने दिया और उत्तर प्रदेश की कल्याणसिंह सरकार की ओर से तब तक आंखें बंद कर रखीं जब तक बाबरी मस्जिद ध्वस्त नहीं कर दी गई।
            इसके विपरीत जिस भाजपा ने 1996 में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में अपने हिन्दुत्ववादी एजेंडे को छोड़ने से साफ इनकार करते हुए सरकार से इस्तीफा दे दिया था उसी भाजपा ने उन्हीं अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में एनडीए के रूप में सांप्रदायिक ताकतों से दूरी बनाते हुए 1998 से 2004 तक गठबंधन सरकार चलाई।
            किसी भी वामपंथी पार्टी का किसी भी गैर-वामपंथी पार्टी के साथ गठबंधन जनता को गुमराह करेगा और वर्ग संघर्ष में शोषित वर्ग को कमजोर करेगा। वामदलों को समझना होगा कि भारत के आज के राजनैतिक परिदृश्य में इस बात की संभावना कहीं नहीं है कि बाकी सभी दल भाजपा के साथ इस हद तक एकजुट हो जाएं कि भाजपा अपनी सांप्रदायिक नीतियां लागू कर सके और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को भी इसकी आवश्यकता नहीं है जब तक केंद्र की सत्ता वामदलों की जद में नहीं आ जाती है।
            सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता से रोकने के लिए वामदलों के पास दो विकल्प हैं। एक अपने संघर्ष को इतना कमजोर रखें कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को वामदलों के संघर्ष से खतरा नजर न आए। दूसरा है जनता की एकजुटता को इतना मजबूत करें कि राष्ट्रवादी ताकतें वामदलों के साथ चलने में ही अपना भला देखने लगें। जाहिर है पहला विकल्प वामपंथी ताकतों के लिए घातक है।
            मार्क्सवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले वामपंथी दलों की जिम्मेदारी है कि आपसी सहमति के आधार पर एक मोर्चा बनाएं जो जनता को कांग्रेस तथा भाजपा के विकल्प के रूप में नजर आए। भारत एक विशाल विविधताओं वाला देश है और भिन्न क्षेत्रों में संघर्ष की नीति भी भिन्न होगी। अगर सभी वामपंथी दल इसके बारे में सजग होंगे तो आमसहमति में कोई अड़चन नहीं आएगी।
            इसमें संभावना से अधिक सुनिश्चिति है कि सांप्रदायिक ताकतें अपने हमले तेज करेंगी। पर संघर्ष के अंतिम पड़ाव में इसके लिए वामपंथी दलों को खुद को तथा जनता को तैयार करना होगा। आमतौर से किसी भी धर्म का अनुकरण करने वाली मेहनतकश जनता की मानसिकता सांप्रदायिक नहीं होती है। और सारे देश में बहुमत इसी वर्ग का है। इस वर्ग की जनता को कट्टरवादी नेतृत्व उसी जगह गुमराह करने में सफल हो पाता है जहां इस वर्ग में वामदलों ने सही रूप में संघर्ष का बीड़ा नहीं उठाया है। मेहनतकश जनता के बीच सही नीतियों के साथ शोषण के खिलाफ संघर्ष कर सही नेतृत्व का विकल्प जनता के सामने रखना ही सांप्रदायिकता के खिलाफ सबसे बड़ी गारंटी है।
            सांप्रदायिकता के हमले से बचने के लिए भाजपा के विरोधी के रूप में कांग्रेस को समर्थन कर उसे मजबूत करना गलत होगा।
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भगतसिंह - क्रांतिकारी बनाम चिंतक

(लेख अनभै सांचा के अप्रैल-जून 2013 के अंक में भी छपा है)

भगतसिंह - क्रांतिकारी बनाम चिंतक
(सुरेश श्रीवास्तव)

(त्रैमासिक पत्रिका मार्क्स दर्शन के प्रमुख संपादक सुरेश श्रीवास्तव द्वारा 28 सितम्बर 2012 को बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, झांसी में 'अभियान' द्वारा आयोजित गोष्ठी में दिया गया आधार वक्तव्य)

प्रिय नौजवान साथियो,
विविधता इस प्रकृति का नियम है और हम सभी अनेकों-अनेक कार्य-कलाप अपने-अपने मकसदों से प्रेरित हो कर करते रहते हैं। हर जीव की सहज प्रवृत्ति अपने अस्तित्व को बचाने की है पर अन्य जीवों से भिन्न, मानव के अस्तित्व की सुरक्षा सामाजिक परिवेश में ही सुनिश्चित होती है। यह अलग बात है कि सजग रूप से अपने अस्तित्व की सुरक्षा, कोई व्यक्ति समाज की सुरक्षा से जोड़ कर करता है, और कोई समाज की सुरक्षा की कीमत पर करता है।
आज आप सब यहां शहीद भगतसिंह को याद करने और उनके व्यक्तित्व के अनुरूप उनके बारे में कुछ रोचक बातें सुनने के मकसद से इकट्ठे हुए हैं। पिछले 80 सालों में भगतसिंह के बारे में बहुत कुछ लिखा और कहा गया है और हम सब के मन में एक महान क्रांतिकारी, जिसने 23 साल की अल्पायु में देश की आजादी के लिए अपनी जान हंसते-हंसते कुर्बान कर दी, की छवि एक आराध्य के रूप में बनी हुई है। आमतौर पर हम अपने देवता अपनी-अपनी सुविधा और साफ शब्दों में कहूं तो अपने-अपने हितों के अनुसार गढ़ते हैं, और इसी कारण न केवल महान व्यक्तियों बल्कि ईश्वर के बारे में भी अलग-अलग लोग अलग-अलग राय रखते हैं और यह राय सुविधानुसार बदलती भी रहती है। अपनी मानसिकता के अनुसार हर व्यक्ति अपने आराध्यों के चरित्र के उच्च पक्ष को तो आलोकित करने का पर तुच्छ पक्ष को ओझल करने का प्रयास करता है। अपने आराध्यों के प्रति पूज्य भाव के कारण लोग उनकी आलोचना से भी कतराते हैं। पर प्रकृति का सच हमारी मनोकामना के अनुसार नहीं चलता है बल्कि अपनी मनोकामना को प्राकृतिक नियमों के अनुसार ढालना ही सुखी-संतुष्ट जीवन की शर्त है।
आप सब उम्मीद कर रहे होंगे कि मैं शहीद भगतसिंह के बारे में ऐसा कुछ बोलूंगा जो आप को प्रिय लगे पर शायद मैं ऐसा नहीं कर पाउंगा। 'सत्यं वद प्रियं वद' के हितोपदेश का अनुसरण मेरे लिए बहुत मुश्किल होता है, खास कर जब बात सामूहिक सामाजिक हित की हो तथा श्रोतागण वे हों जिनके सामने अपने भविष्य की अनिश्चितताएं और आशंकाएं मुंह बाये खड़ी हों, और जिनकी निजी सोच न केवल उनके अपने भविष्य को प्रभावित करेगी बल्कि करोड़ों ऐसे लोगों के भविष्य को भी प्रभावित करेगी जिनको, हर समय अपने अस्तित्व को बचाने के संघर्ष में जुटे रहने के कारण, सोच-विचार करने का समय ही नहीं मिलता है। आप सब ने अपने सामने मुझे अपनी बात रखने का यह मौका और समय दिया है तो मेरा दायित्व है कि मैं अपने वक्तव्य में आपकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को भी ध्यान में रखूं।
आगे बढ़ने से पहले मैं आप से पूछना चाहूंगा कि आप भारत की मौजूदा आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था में अपनी पढ़ाई खत्म कर किस प्रकार की नौकरी या आमदनी की उम्मीद करते हैं। यह सवाल आपके अपने अस्तित्व के लिए सबसे अहम है। मेरे एक परिचित एक निजी महाविद्यालय में कार्यरत हैं जहां इंजीनियरिंग तथा मैनेजमेंट की पढ़ाई होती है। वे विद्यार्थियों का प्रशिक्षण तथा प्रस्थापन देखते हैं। उनके अनुसार उच्च स्तर के शिक्षण संस्थानों में संस्थान स्तर पर चुने गये प्रत्याशियों की आमतौर पर शुरुआती तनख्वाहें 20-25 हजार प्रतिमाह होती हैं, मध्यम दर्जे के संस्थानों में 15-20 हजार रुपये प्रतिमाह और निचले दर्जे के संस्थानों के अभ्यार्थी आमतौर पर 12-15 हजार रुपये प्रतिमाह पाते हैं। गैर प्रशिक्षित वर्ग की तनख्वाहें 8-10 हजार से अधिक नहीं हैं।
देश का सकल घरेलू उत्पाद इस साल 90 लाख करोड़ रुपये होने का आंकलन है। देश की 120 करोड़ की आबादी में औसत प्रति व्यक्ति 75 हजार रुपये बनता है। देश की 85 करोड़ आबादी 15 हजार रुपये सालाना से कम पर जीती है, और उसके हिस्से में आता है कुल 12 लाख करोड़ रुपये। बाकी 35 करोड़ की आबादी की मानसिकता में, जीवन स्तर के सुधार के अपने प्रयासों में हाशिये पर जी रही, 85 करोड़ की आबादी का कहीं कोई वजूद नहीं है, सिवाय सतही संवेदना के। 85 करोड़ को छोड़ दें तो 35 करोड़ के हिस्से में आने वाले 78 करोड़ में प्रति व्यक्ति औसत बनता है लगभग 20 हजार रुपये महीना। इस 35 करोड़ में से 30 करोड़ की निम्न मध्य वर्ग कि आबादी को यथार्थ में मिलता है 75 हजार रुपये सालाना प्रति व्यक्ति (चार सदस्यों के परिवार की आमदनी 3 लाख रुपये सालाना के हिसाब से), यानि इस 30 करोड़ आबादी के हिस्से में आता है 22 लाख करोड़ रुपये सालाना। और बची हुई उच्च सम्पन्न वर्ग की 5 करोड़ आबादी के हिस्से में आता है 50 लाख करोड़ रुपयें सालाना अर्थात प्रति व्यक्ति 10 लाख रुपये सालाना या चार व्यक्तियों के सम्पन्न परिवार के हिस्से में 40 लाख रुपये सालाना। पिछले सप्ताह मैं अखबार में कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की वर्ष 2011-12 की तनख्वाहों के बारे में पढ़ रहा था। नवीन जिंदल जो संसद सदस्य भी हैं की सालाना तनख्वाह थी 73.4 करोड़ रु, कलानिथि मारान तथा कावेरी मारान प्रत्येक की 57 करोड़ रु, पवन मुंजाल तथा बी.एल. मुंजाल प्रत्येक की 34.5 करोड़ रु। 10 सबसे बड़े अधिकारियों के बीच 387 करोड़ रु की तनख्वाहें बांटी गईं।
मैं आंकड़ों की बात ज्यादा नहीं करूंगा। मैं सिद्धांत की बात करना चाहूंगा। बाकी आप पर निर्भर करेगा कि सैद्धांतिक सच्चाई के बरक्स आप अपनी आकांक्षाओं को यथार्थ के साथ किस प्रकार जोड़ना चाहते हैं।
आम तौर पर लेखक, साहित्यकार व इतिहासकार, भगतसिंह के व्यक्तित्व और क्रांतिकारी कार्य कलापों के विभिन्न आयामों को अपने-अपने हितों और पूर्वाग्रहों के अनुसार पाठकों के सामने पेश करते हैं और इसमें भगतसिंह की वैचारिक विकास प्रक्रिया, जो हर दौर में नई पीढ़ी को अपना रास्ता ढूंढने में मदद कर सकती है, नेपथ्य में खो जाती है।
भारतीय समाज में एक तबका ऐसा है जिसका हित इस बात में है कि नई पीढ़ी की सोच में अंध राष्ट्रभक्ति का जुनून सवार रहे ताकि वह सभी राष्ट्रीय समस्याओं का स्रोत विदेशी मूल में और समाधान के किसी भी विचार का स्रोत पूरी तरह शुद्ध राष्ट्रीय मूल में ही ढूंढे। और यह समूह भगतसिंह के व्यक्तित्व को एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में पेश करता है जो राष्ट्रभक्ति के जुनून से ओतप्रोत था और जिसके लिए विदेशी हुकूमत से देश को आजादी दिलाने का मकसद जान से भी ज्यादा प्यारा था। यह तबका भगतसिंह के जन्मदिन तथा शहीददिवस को एक पर्व के रूप में मनाने और उन्हें देवता के रूप में प्रतिष्ठित करने को अपना धर्म समझता है।
दूसरे एक तबके का हित निम्न-मध्य-वर्ग की अनिश्चितता में है ताकि निम्न-मध्य-वर्ग अपनी सम्पन्नता का सपना इसी राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था के अंदर ही देखता रहे और समतामूलक समाज की मारीचिका को यथार्थ समझ कर काल्पनिक समाजवाद के पीछे ही दौड़ता रहे। यह तबका भगतसिंह की तस्वीर एक ऐसे क्रांतिकारी के रूप में पेश करता है जो न केवल देश की जनता को विदेशी शासकों की गुलामी से निजात दिलाना चाहता था बल्कि आजाद भारत में एक समतामूलक समाज अर्थात समजवाद की स्थापना का सपना भी देखता था। यह तबका समाजवाद को अपने स्वार्थ और हितों के अनुसार परिभाषित कर उसको भगतसिंह के सपने के रूप में नई पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करता रहता है।
तीसरा तबका वह है जो शोषण विहीन समाज की स्थापना के लिए शोषित वर्ग के नेतृत्व का दावा करता है और इस दायित्व को पूरा करने के लिए आवश्यक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उस पर आधारित सिद्धांत की अपनी समझ के पुख्ता होने का दावा करता है। यह तबका भगतसिंह की पुख्ता मार्क्सवादी बनने की ओर अग्रसर क्रांतिकारी के रूप में पहचान करता है और उनके समाजवाद की स्थापना के लक्ष्य, अपने कम्युनिस्ट होने की घोषणा और मार्क्स तथा लेनिन से प्रेरित होने के दावे को दलीलों के रूप में इस्तेमाल करता है। यह तबका मार्क्सवाद की अपनी आधी अधूरी समझ का, भगतसिंह की मार्क्सवाद की समझ के संदर्भ से, परिपक्व समझ होने का दावा करता रहता है।
भगतसिंह को सही-सही समझने के लिए उनके विचारों को पूरी विकास प्रक्रिया, गुणात्मक रूप से भिन्न तीन अलग-अलग चरणों, के साथ समझना होगा। भगतसिंह का वैचारिक आंकलन उनके अपने वक्तव्यों तथा सैद्धांतिक दावों और सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित होना चाहिए न कि इस बात पर कि इतिहासकारों या साहित्यकारों की उनके बारे में क्या राय है। इसी को ध्यान में रखते हुए, आगे बढ़ने से पहले मैं कुछ महत्वपूर्ण तारीखों, उनके कुछ वक्तव्यों तथा कुछ वाक्यांशों को उद्धृत करना चाहूंगा।
1907, सितम्बर   - भगतसिंह का जन्म
1922, फरवरी                 - गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस
1923,                          - गृह-त्याग तथा एच.आर.ए. के क्रांतिकारियों के साथ संपर्क
1925, अगस्त                 - काकोरी काण्ड
1926,                          - नौजवान भारत सभा की स्थापना, काकोरी विद्रोहियों को फांसी
1926, साल का अंत          - भगतसिंह का पूरी तरह नास्तिक हो जाना
1928,                          - नौजवान भारत सभा का पुनर्गठन
1928, सितम्बर               - एच.एस.आर.ए की स्थापना
1928, दिसम्बर   - सांडर्स की हत्या
1929, अप्रैल                  - सेंट्रल असेम्बली में बम और गिरफ्तारी
1930,  अप्रैल                 - सांडर्स हत्या के मुकदमे के लिए ट्रिब्यूनल का गठन
1930, नवम्बर                 - फांसी की सजा का आदेश
1931, मार्च                    - फांसी  
आजादी के आंदोलन के गांधी जी के तरीके से मोहभंग हो जाने के बाद घर छोड़ने से लेकर काकोरी कांड के क्रांतिकारियों के मृत्यु दंड तक की अपनी चार साल की वैचारिक यात्रा के बारे में स्वीकारोक्ति के तौर पर, अपनी मृत्यु से चंद दिन पहले लिखे अपने लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में, उन्होंने लिखा था - 'Up to that period I was only a romantic idealist revolutionary. Uptil then we were to follow. Now came the time to shoulder the whole responsibility. .... That was a turning point in my revolutionary career. "Study" was the cry that reverberated in the corridors of my mind. Study to enable yourself to face the arguments advanced by the opposition. Study to arm yourself with arguments in favour of your cult. I began to study. My previous faith and convictions underwent a remarkable modification.' यानि 'उस दौर तक मैं केवल एक रोमांटिक आदर्शवादी क्रांतिकारी भर था। उस समय तक हमें अनुकरण करना था। अब समय आ गया था सारी जिम्मेदारी को कंधों पर लेने का। ...... वही मेरे क्रांतिकारी जीवन का प्रस्थान बिंदु था। 'अध्ययन करो' की पुकार मेरे मस्तिष्क के गलियारों में गूंज रही थी। अध्ययन करो, अपने आप को विरोधियों के द्वारा पेश की गई दलीलों का मुकाबला कर सकने योग्य बनाने के लिए। अध्ययन करो अपनी धारणा के समर्थन के लिए अपने आप को तर्कों से लैस करने के लिए। मैंने पढ़ना शुरु कर दिया। मेरी पुरानी आस्थाओं तथा विश्वासों में असाधारण परिवर्तन हो गया।'
            इसी में वे आगे लिखते हैं, 'I studied Bakunin, the anarchist leader, something of Marx, the father of communism and much of Lenin. ....... By the end of 1926 I had been convinced as to baselessness of the theory of existence of an Almighty Supreme Being who created, guided and controlled the universe....... I had become a pronounced atheist.' यानि 'मैंने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को, थोड़ा कुछ कम्युनिज्म के प्रणेता मार्क्स का और लेनिन का बहुत कुछ पढ़ा। ........ 1926 के अंत तक, सर्वशक्तिमान सर्वभौमिक संरचना जिसने संसार की रचना की, जो उसे संचालित और नियंत्रित करता है, की मौजूदगी के सिद्धांत की बेहूदगी के बारे में मैं पूरी तरह आश्वस्त हो चुका था। ..... मैं पूरी तरह घोषित नास्तिक बन चुका था।'
            इसके बाद 1927-28 के दो वर्षों में भगतसिंह ने संगठनात्मक स्तर पर दो महत्वपूर्ण काम किए, नौजवान भारत सभा का पुनर्गठन तथा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी का गठन। पर इसी दौर के अंत में उन्होंने दो ऐसे रोमांटिक आदर्शवादी काम किये जो उनके और उनके उद्देश्य के लिए आत्मघाती सिद्ध हुए। एक था सांडर्स की हत्या करना और दूसरा था सेंट्रल असेम्बली में बम फेंकने के बाद अपनी गिरफ्तारी देना।
            8 अप्रैल 1929 से 23 मार्च 1931 के दो वर्ष के बंदी जीवन के दौरान लिखे उनके लेख और पत्र उनकी वैचारिक विकास प्रक्रिया पर अत्यंत महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं।
            6 जून 1929 को सेशन्स कोर्ट में दिये गये अपने वक्तव्य में भगतसिंह ने लिखा था, 'A grim struggle will ensure involving the overthrow of all obstacles, and the establishment of the dictatorship of the proletariat' यानि 'एक तीव्र संघर्ष सारी बाधाओं को उखाड़ फेंकना और सर्वहारा के अधिनायकत्व को स्थापित करना सुनिश्चित करेगा।'      
            1930 के उत्तरार्ध में सुखदेव को लिखे अपने पत्र के शुरु में ही भगतसिंह लिखते हैं, 'I realise that the changed situation has affected us differently. The things you hated outside have now become essential to you. In the same way, the things I used to support strongly are of no significance to me anymore.' यानि 'मैं जानता हूं कि बदली हुई परिस्थिति ने हम दोनों को अलग-अलग तरीके से प्रभावित किया है। बाहर तुम्हें जिन चीजों से नफरत थी वे ही अब तुम्हारे लिए जरूरी हो गई हैं। इसी प्रकार, मैं जिन चीजों का दृढ़ता से समर्थन करता था उनकी अब मेरे लिए कोई अहमियत नहीं रह गई है।'
            और जनवरी 1930 में लाला रामसरन दास की पुस्तक ' Dreamland' की प्रस्तावना में भगतसिंह लिखते हैं, 'I am a materialist and my interpretation of the phenomenon would be causal.' यानि 'मैं भौतिकवादी हूं और दृग्विषयों की मेरी व्याख्या करणात्मक होगी'। इसी प्रस्तावना में वे आगे लिखते हैं, 'The Communist society that we want to build' यानि 'कम्युनिस्ट समाज जो हम बनाना चाहते हैं' और 'The socialist society can not be brought about by violent means, but that it should grow and evolve from within. ...... We the revolutionaries are striving to capture power in our hands and to organize a revolutionary government which should employ all its resources for mass education, as is being done in Russia today.' यानि 'हिंसा के जरिए समाजवादी समाज अस्तित्व में नहीं लाया जा सकता है, उसे तो आंतरिक तौर पर ही बढ़ना और विकसित होना चाहिए। ..... हम क्रांतिकारी अपने हाथों में राजसत्ता हासिल करने और एक क्रांतिकारी सरकार, जो सारे संसाधनों को व्यापक शिक्षा में लगाये जैसे कि आज रूस में किया जा रहा है, का गठन करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।'    
युवा राजनैतिक कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए, 2 फरवरी 1931 को भगतसिंह ने एक संदेश लिखा था। उस में वे दूसरे और तीसरे पैराग्राफ में रूसी क्रांति के संदर्भ से लेनिन की कार्य प्रणाली का वर्णन करते हैं फिर चौथे पैराग्राफ में लिखते हैं, 'About tactics and strategy one should study life-work of Lenin' यानि 'रणकौशल तथा रणनीति के बारे मे लेनिन के जीवन-कार्य के बारे में पढ़ना चाहिए।' इसी संदेश में वे आगे सरकारी मशीनरी के बारे में लिखते हैं, 'We want to snatch and handle it to utilise it for the consummation of our ideal, i.e. social reconstruction on new, i.e. Marxist, basis.' यानि 'हम उसे अपने आदर्शों की पूर्ति अर्थात नये यानि मार्क्सवादी आधार पर समाज के पुनर्निर्माण के लिए छीनना और नियंत्रित करना चाहते हैं।' वे आगे लिखते हैं, 'We require - to use the term so dear to Lenin - the "professional revolutionaries".' अर्थात 'हमें जरूरत है - अगर उन शब्दों को प्रयोग करें जो लेनिन को इतने प्रिय थे - पेशेवर क्रांतिकारियों की।' अंत में वे लिखते हैं,  'I have got the same ideas, same convictions, same zeal and same spirit as I used to have outside, perhaps - nay, decidedly - better. Hence I warn my readers to be careful while reading my words. ...... I am not a terrorist and I never was, except perhaps in the beginning of my revolutionary career' यानि 'मेरे विचार वही हैं, मेरी आस्थाएं वही हैं, वही उत्साह और वही भावना जैसे बाहर थे, शायद - नहीं, निश्चय ही - उनसे बेहतर। इसलिए मैं अपने पाठकों को आगाह करता हूं मेरे शब्दों को पढ़ते समय सावधान रहें। ..... मैं दहशतगर्द नहीं हूं और न कभी था, सिवाय शायद अपने क्रांतिकारी जीवन के शुरुआती दौर के।'                          अपनी मृत्यु से चंद दिन पहले लिखे अपने लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं' में उन्होंने लिखा था, 'You go and oppose the prevailing faith, you go and criticise a hero, a great man, who is generally believed to be above criticism because he is thought to be infallible, the strength of your argument shall force the multitude to decry you as vainglorious. This is due to the mental stagnation. Criticism and independent thinking are the two indispensable qualities of a revolutionary.' अर्थात 'आप आगे बढ़कर प्रचलित आस्थाओं का विरोध करते हैं, आप आगे आकर एक हीरो, एक महान आदमी जिसे आमतौर पर आलोचना से ऊपर माना जाता है क्योंकि उसका अमोघ होना सर्वमान्य है, की आलोचना करते हैं, आप के तर्क की शक्ति, जनसाधारण को मजबूर करेगी कि वह आप को दंभी कह कर दुत्कारे। ऐसा मानसिक जड़ता के कारण होता है। आलोचना तथा आजाद चिंतन एक क्रांतिकारी के दो अपरिहार्य गुण हैं।' और 'I am a realist. I have been trying to overpower the instinct in me by the help of reason. I have not always been successful in achieving this end. But man's duty is to try and endeavour, success depends upon chance and environment. ....... Where direct proofs are lacking philosophy occupies the important place.' अर्थात 'मैं एक यथार्थवादी हूं। मैं अपने अंदर की सहज प्रवृत्तियों पर अपने तर्क द्वारा काबू पाने की कोशिश कर रहा हूं। इस नतीजे को हासिल करने में मैं कामयाब, हमेशा नहीं रहा हूं पर इंसान का कर्तव्य है कोशिश और सतत प्रयास करना, सफलता संयोग तथा माहौल पर निर्भर करती है। ..... जहां प्रत्यक्ष प्रमाण पूरे नहीं पड़ रहे हैं वहां दर्शन  विशेष स्थान ग्रहण कर लेता है।'
फांसी से चंद दिन पहले मिलने आई छोटी बहन से उन्होंने कहा था 'रोती क्यों हो। यह सच है कि चंद दिनों में हमें फांसी हो जायेगी और उसके बाद लोग हमें भूल जायेंगे। पर यह भी सच है कि अंग्रेजों को 15 साल में यह देश छोड़ कर जाना होगा क्योंकि उनकी जड़ें खोखली हो चुकी हैं। और उसके बाद जो निजाम आयेगा वह लूट-खसोट का निजाम होगा क्योंकि कांग्रेस पूंजीपतियों तथा व्यापारियों की लड़ाई लड़ रही है। फिर एक समय ऐसा आयेगा जब लोग हमें पुनः याद करना शुरु करेंगे और तब जो परिवर्तन होगा वह मेहनतकश को उसका हक दिलवायेगा।'
इस सब से यह बात साफ हो जाती है कि उन्होंने कम्युनिज्म तथा समाजवाद के बारे में  पढ़ा था और समाजवाद को मानव जाति की भलाई के लिए अपरिहार्य मानते थे, कि वे मार्क्सवाद तथा रूसी क्रांति से पूरी तरह प्रभावित थे और भारत में उसी तरह के सर्वहारा के अधिनायकत्व की स्थापना का सपना देखते थे। लेनिन को वे अपना आदर्श मानते थे, परंतु उन्होंने मार्क्स या एंगेल्स को अधिक नहीं पढ़ा था। एक बात साफ है कि वे मार्क्सवाद से पूरी तरह से अभिभूत थे और सजग तौर पर उनकी सोच काफी हद तक मार्क्सवाद से प्रभावित थी। पर बुनियादी तौर पर मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम से वे पूरी तरह अनभिज्ञ थे जैसा कि उनके द्वारा 'Dialectical' की जगह 'Causal' शब्द का प्रयोग किया जाना दर्शाता है।
भगतसिंह की वैचारिक प्रक्रिया को समझने के लिए मार्क्सवाद की चंद मूल बातों को समझना तथा ध्यान में रखना जरूरी है।
मार्क्सवाद में प्रकृति को समझने की पद्धति द्वंद्वात्मक है और व्याख्या भौतिकवादी है। कार्ल मार्क्स ने फॉयरबाख के भौतिकवाद तथा हेगेल के द्वंद्ववाद के आधार पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की अपनी मार्क्सवादी समझ विकसित की थी।
मार्क्स ने निम्न मध्यवर्ग की मानसिकता के बारे में लिखा था, 'एक विकसित समाज में और अपनी परिस्थिति के कारण, निम्न मध्यवर्गीय एक ओर तो समाजवादी बन जाता है और दूसरी ओर एक अर्थवादी, अर्थात वह उच्च मध्यवर्ग के ऐश्वर्य से चुंधियाया होता है और विपन्नों की विपन्नता से द्रवित भी। वह एक ही समय पर पूंजीपति भी है और जनता का आदमी भी। ........ निम्न पूंजीपति आने वाली सभी सामाजिक क्रांतियों का अभिन्न अंग होगा।'  
और लेनिन ने निम्न मध्यवर्गीय आंदोलनकारियों के बारे में लिखा था, 'जो हमारे आंदोलन की वास्तविक परिस्थिति से थोड़े भी परिचित हैं, मार्क्सवाद के व्यापक विस्तार के साथ सैद्धांतिक स्तर में गिरावट उनकी नजरों में आये बिना नहीं रह सकती है। काफी तादाद में लोग, सतही या पूरी तरह नदारद सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ, आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा सफलता के कारण, उसमें शामिल हो गये हैं।'
मार्क्स ने सैद्धांतिक समझ के बारे में लिखा था, 'सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है। सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने में सक्षम तब होता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनकाब करता है, और वह पूर्वाग्रहों को तब बेनकाब करता है जब वह मूलाग्रही होता है। मूलाग्रही होने का मतलब है चीजों को उनके मूल के जरिए समझना।'
और एंगेल्स ने लिखा था, 'सैद्धांतिक चिंतन एक प्रकृति प्रदत्त गुण केवल प्राकृतिक क्षमता के रूप में है। इस प्राकृतिक क्षमता को विकसित और परिष्कृत करना आवश्यक है, और इसके परिष्कार का कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि पुराने दर्शनों का अध्ययन किया जाय।'  
साथियो आप लोगों को आज के विषय के लिए यह भूमिका बहुत लंबी मालूम हो सकती है, पर इसे समझ लेने के बाद भगतसिंह के क्रांतिकारी और वैचारिक आयामों की तस्वीरें आपको पूरी तरह साफ नजर आ जाएंगी। भूमिका की पूरी समझ के बिना दोनों तस्वीरें एक दूसरे को आच्छादित कर धुंधला कर देती हैं।
भगतसिंह का पारिवारिक परिवेश धार्मिक रूप से उदारवादी और राजनैतिक तौर पर राष्ट्रवादी था। उनके दादा सहित पूरा परिवार आर्यसमाजी था और पिता तथा एक चाचा गांधीवादी क्रांतिकारी तथा दूसरे चाचा उग्रवादी क्रांतिकारी थे।            
भगतसिंह की शिक्षा डी.ए.वी. स्कूल और नेशनल कालेज लाहौर में हुई जहां माहौल क्रांतिकारियों तथा क्रांतिकारी गतिविधियों से भरा हुआ था। यहां उन्हें द्वारकादास लाइब्रोरी हासिल थी जिसमें क्रांतिकारी और मार्क्सवादी साहित्य की भरमार थी।
इस परिवेश के कारण वे 12 साल की अल्पायु से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रुचि लेने लगे थे और 16 साल की उम्र में असहयोग आंदोलन से मोहभंग होने के बाद उग्रवादी क्रांतिकारी आंदोलन की राह पर चल पड़े थे। यहां उनकी तुलना लेनिन से करना आवश्यक है। लेनिन के बड़े भाई अलेक्जेंडर को 21 साल की अल्पायु में रूस की राजशाही के खिलाफ विद्रोह के आरोप में फांसी की सजा दे दी गई थी। उस समय लेनिन की आयु भी 17 साल थी। भाई की फांसी पर लेनिन के शब्द थे, 'यह मेरा रास्ता नहीं होगा।' उस समय सारे यूरोप में मार्क्सवाद, अनेकों संशोधनवादी तथा अतिवादी स्वरूपों के साथ, मजदूर वर्ग की विचारधारा के रूप में प्रचलन में था। लेनिन के सामने सफल क्रांति का कोई उदाहरण नहीं था इस कारण उन्होंने समर में कूदने से पहले मार्क्सवाद का गहन अध्ययन किया, उसके दार्शनिक आयाम की पुख्ता समझ हासिल की और क्रांति का आह्वान करने के पहले रूस के कम्युनिस्ट आंदोलन में मौजूद दक्षिणपंथी तथा वामपंथी संशोधनवादी तत्त्वों को बेनकाब कर बोल्शेविक पार्टी का गठन किया। इसके विपरीत भगतसिंह के पास रूस की सफल क्रांति का उदाहरण था और उससे प्रभावित होकर वे मार्क्सवाद की पुख्ता समझ हासिल किये बिना क्रांतिकारी आंदोलन में कूद पड़े थे।
अपने क्रांतिकारी जीवन के शुरुआती चार साल उन्होंने सक्रिय आंदोलन में गुजारे जिसमें सैद्धांतिक समझ विकसित करने का अवसर लगभग नहीं के बराबर था। गहन सैद्धांतिक अध्ययन का अवसर 1927-28 के दो वर्षों में मिला जरूर पर जाहिर है क्रांतिकारी सक्रियता के कारण अध्ययन रूस की क्रांति तथा लेनिन की कार्यप्रणाली पर ही केंद्रित रहा क्योंकि उन्होंने कार्ल मार्क्स या फ्रेडरिक एंगेल्स की रचनाओं को लगभग नहीं के बराबर ही पढ़ा था। अंतिम दो वर्षों के बंदी जीवन में भी उन्हें मार्क्सवाद के क्रांति तथा राज्य से संबंधित आयामों के बारे में पढ़ने तथा समझने का मौका तो मिला पर दार्शनिक आयाम को पढ़ने या समझने का मौका बिल्कुल नहीं मिला और इस कारण वे मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम से अनभिज्ञ ही रहे। उस समय मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम की चर्चा भारतीय राजनैतिक आंदोलन में दूर-दूर तक नहीं थी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, जो उस समय तक अस्तित्व में आ चुकी थी, का शीर्ष नेतृत्व भी मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम से पूरी तरह अनभिज्ञ था। निम्न मध्य वर्ग से आये इन लोगों की मानसिकता के बारे में मार्क्स और लेनिन की टिप्पणियां तथा व्याख्याएं अक्षरशः लागू होती थीं और दुर्भाग्यवश सभी कम्युनिस्ट पार्टियों की स्थिति आज भी वही है।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि भगतसिंह अपने क्रांतिकारी आयाम में सजग रूप से पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ शोषणविहीन समाज की स्थापना के लिए पूर्णरूप से समर्पित तथा संघर्षरत थे। पर वैचारिक आयाम में वे अपने आपको अपनी निम्न मध्यवर्गीय मानसिकता से मुक्त नहीं कर पाये थे क्योंकि उस समय की ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण उन्हें मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम को समझने का मौका ही नहीं मिला था। और मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम को समझे बिना न तो शोषण की प्रक्रिया को समझा जा सकता और न ही समाज के विकास को सही दिशा देने के लिए कोई सजग प्रयास सफलता पूर्वक पूरा किया जा सकता है।
मुझे आशा है आप सब युवा, मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम, जो वास्तव में दर्शन (पारंपरिक अर्थ में) न होकर विज्ञान है, को समझने का प्रयास करेंगे। और मैं भरोसा दिला सकता हूं कि हर विज्ञान की तरह यह भी आपके लिए अपने व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में उपयोगी सिद्ध होगा।
सुनहरे भविष्य के लिए आप सब को ढेरों शुभकामनाएं।

सुरेश श्रीवास्तव  

9810128813