Saturday, 17 January 2026

वेनेज़ुएला घटनाक्रम की मार्क्सवादी व्याख्या

वेनेज़ुएला घटनाक्रम की मार्क्सवादी व्याख्या ऐतिहासिक भौतिकवाद, किसी भी घटना का विश्लेषण और व्याख्या द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और घटनाक्रम की निरंतरता के आधार पर ही करता है। मार्क्सवाद के अनुसार समाज एक जैविक संरचना है जिसका अपना कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता है। वह समाज को व्यक्तियों की चेतना के समुच्चय के रूप में देखता है। इस कारण किसी भी सामाजिक घटनाक्रम का विश्लेषण करते समय विशिष्ट व्यक्तियों को सामाजिक चेतना के मूर्त रूप में देखना चाहिए न कि व्यक्तिगत रूप में। वर्ग विभाजित समाज में, किसी राष्ट्रराज्य की सीमाओं के अंदर और बाहर सामाजिक चेतना को वर्ग चेतनाओं के रूप में देखना और विशिष्ट व्यक्ति किस समय किस वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं यह भी समझना जरूरी है। 3 जनवरी 2026 की सुबह 2:00 बजे अमेरिका द्वारा हवाई हमले के साथ वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरै और उनकी पत्नी के अपहरण की घटना का विश्लेषण करने के लिए हमें इतिहास में थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। सभ्य समाज का इतिहास वर्ग विभाजित समाजों का इतिहास है; श्रम विभाजन से उपजे, वर्गों में विभाजित समाजों में वर्ग संघर्षों का इतिहास; गैर-उत्पादकों द्वारा बल तथा छल-कपट के द्वारा, उत्पादकों द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त उत्पाद के अधिग्रहण के लिए संघर्षों का इतिहास, शुरुआती दौर में भौतिक हिंसा के साथ शारीरिक नियंत्रण के द्वारा, तत्पश्चात राजसत्ता द्वारा बनाये गये और संगठित बलों के समर्थन के आधार पर लागू किये गये क़ानूनों के साथ वैचारिक नियंत्रण के द्वारा। उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ ही उपयोगी चीज़ों का उत्पादन कमोडिटी के रूप में होने लगा और आदान-प्रदान का स्थान विनिमय ने ले लिया। विनिमय में विविध चीजों की मात्रात्मक तुलना का निर्धारण उनमें अंतर्निहित मूल्य (वैचारिक) के आधार पर ही किया जा सकता है और मूल्य को प्रदर्शित करने के लिए धन (स्थूल), जिसकी निर्धारित मात्रा में अंतर्निहित मूल्य, मूल्य की इकाई के रूप में सर्वमान्य हो, की भूमिका पहले सोने-चांदी ने निभाई, कालांतर में राज्य द्वारा निर्धारित मुद्रा ही धन का पर्याय हो गई। मुद्रा द्वारा प्रदर्शित मूल्य का उसके अपने मूल्य से कुछ लेना देना नहीं होता है। राजसत्ता का आश्वासन मुद्रा को मूल्य का पर्याय बनाता है और उसे सर्वमान्य राज्य का कानून बनाता है। इसीलिए उसे अधिदिष्ट मुद्रा या फ़िएट मनी भी कहा जाता है। चीज़ों के विनिमय में मूल्य (वैचारिक) का स्थान मुद्रा (स्थूल) द्वारा लेने के बाद सामाजिक चेतना में मुद्रा ही जीवन के लिए आवश्यक उपयोगी चीज़ों का पर्याय बन गई। विनिमय के लिए दो चीज़ें आवश्यक थीं मुद्रा की सार्वजनिक स्वीकार्यता और संपत्ति के निजी स्वामित्व की सार्वजनिक मान्यता, जिनके लिए पूरी अर्थव्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण होना आवश्यक था। बाज़ारवादी व्यवस्था के शुरुआती दौर में दोनों चीज़ों के लिए राज्य द्वारा बनाये गये कानूनों को लागू करने के लिए प्रत्यक्ष तौर पर राजसत्ता की भौतिक शक्ति का हस्तक्षेप आवश्यक था पर कालांतर में राज्य द्वारा बनाये गये क़ानूनों की वैधानिक मान्यता के सामाजिक चेतना में घर कर लेने पर, राज्य की भौतिक शक्ति का हस्तक्षेप परोक्ष में चला गया, पर प्रभावी वह हमेशा ही रहा है। और यह विरोधी वर्गों के विरोध को नियंत्रित और निष्प्रभावी करने और राज्य द्वारा बनाये क़ानूनों को लागू करने के लिए हमेशा ही जरूरी है। कहने की जरूरत नहीं कि किसी राजसत्ता का नियंत्रण उसके राज्य की भौगोलिक सीमाओं के अंदर ही हो सकता है। औद्योगिक क्रांति के बाद पूँजीवाद अपनी उच्चतम अवस्था में पहुंच चुका था और चेतना के लिए भौगोलिक सीमाएं बेमानी हो गईं। वैश्विक बाजार में, अतिरिक्त मूल्य अर्थात मुनाफा, के लिए, उत्पादन से अधिक महत्वपूर्ण वितरण हो गया। वर्गों के संघर्ष में सामंतवर्ग तथा बुर्जुआवर्ग के अलावा अब सर्वहारा वर्ग और निम्न बुर्जुआवर्ग भी महत्वपूर्ण भूमिका में आ गये। अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में पूँजीवाद अपनी उच्चतम अवस्था में प्रथम विश्व युद्ध के पहले ही पहुंच चुका था। पूँजी का वर्चस्व सर्वव्यापी हो चुका था। सभी राष्ट्र राज्यों की चेतनाएँ पूँजी के नियंत्रण में आ चुकी थीं। पूँजी, पिशाच की तरह मृत श्रम (उत्पाद में अंतर्निहित मूल्य) है जो जीवित श्रम को चूस कर जीवित रहता है और जितना अधिक देर जीवित रहता है उतना ही अधिक वह जीवित श्रम चूसता है। वैश्विक व्यापार के लिए मूल्य के पर्याय के रूप में सर्वमान्य मुद्रा आवश्यक हो गई थी। द्वितीय विश्व की समाप्ति तक यह स्पष्ट हो गया था कि राजनीति के क्षेत्र में बु्र्जुआ जनवादी चेतना (बुर्जुआ अधिनायकवादी) के साथ नव जनवादी चेतना (सर्वहारा अधिनायकवादी) भी सर्वव्यापी हो गई है। और बुर्जुआ जनवादी चेतना के प्रतिनिधि के रूप में अमेरिका ने ब्रैटनवुड समझौते के जरिए पूँजीवादी राष्ट्रों और व्यवस्थाओं को अपने और डालर के पीछे एकजुट कर लिया था। सर्वहारा अधिनायकवादी चेतना के प्रतिनिधि के रूप में सोवियत संघ और समाजवादी चीन इस व्यवस्था से बाहर रहे। समाजवादी चेतना स्वाभाविक रूप से से दो अलग-अलग वर्गीय चेतनाओं में बंटी होती है। शेखचिल्ली समाजवादी चेतना निम्न बुर्जुआ वर्ग की चेतना होती है और वैज्ञानिक समाजवादी चेतना सर्वहारावर्ग की चेतना होती है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सोवियत संघ में वैज्ञानिक समाजवादी चेतना काफी कमजोर हो गई थी। (इसके लिए लेखक के ब्लॉग ‘महान अक्टूबर क्रांति के सबक’ ………. http://marx-darshan.blogspot.com/2017/11/blog-post.html) को देखें। स्टालिन की असामयिक मृत्यु के बाद बीसवीं कांग्रेस में सीपीएसयू ने सर्वहारा जनवाद की राह छोड़ कर सार्विक जनवाद की घोषणा कर दी जब कि सीपीसी का इससे गहरा मतभेद था। लंबी बहस के बाद दोनों के रास्ते अलग हो गये। सोवियत संघ शेखचिल्ली समाजवाद का और चीन वैज्ञानिक समाजवाद का केंद्र हो गया। इसके बाद वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों में अमेरिका का बर्चस्व स्थापित हो गया था। अमेरिका ने अपनी सैन्य शक्ति का अत्याधिक विस्तार कर लिया। दुनिया भर में जगह जगह सैन्य अड्डे स्थापित कर लिये। डालर को सोने से असंबद्ध कर लिया। तेल के सबसे बड़े उत्पादक साउदी अरब के साथ सैन्य सुरक्षा के आश्वासन के साथ पेट्रो डालर का समझौता कर लिया। सैन्य शक्ति के बल पर दुनिया भर के समुद्री रास्तों के नियंत्रण और सर्वमान्य मुद्रा के रूप में डालर के जरिए दुनिया की बैंकिंग प्रणाली और व्यापार पर नियंत्रण करने के बाद अमेरिकी पूँजी के लिए उत्पादन पर नियंत्रण से अधिक फ़ायदेमंद वितरण पर नियंत्रण हो गया। अगले पच्चीस साल दुनिया भर में मजदूर आंदोलनों के लिए सैद्धांतिक संघर्ष का दौर था। संशोधनवाद ने दुनियाभर के बुद्धिजीवियों को ऐसे भटकाव में ला दिया था कि किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि मार्क्सवाद का सिद्धांत अगर शाश्वत नहीं है तो फिर क्या संशोधन करना है। संशोधनवाद और मार्क्सवाद के बीच के अंतर्विरोध का समाधान, सोवियत संघ में हुआ सीपीएसयू तथा सोवियत संघ के विघटन में, और चीन में हुआ तियानआनमेन स्क्वायर की घटना के बाद ‘आर्थिक सुधार - हाँ, पर राजनीतिक उदारीकरण - न’ के रूप में। मार्क्सवाद की सही समझ वाली सीपीसी ने संशोधनवाद और राजसत्ता पर पूरी तरह क़ाबू पा लिया और रूस में संशोधनवादी सत्ता पर क़ाबिज़ हो गये तथा कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबंदी लग गई। मार्क्सवादी जानते हैं कि समाजवाद का रास्ता उत्पादक शक्तियों के विकास से होकर गुजरता है और उसका एक पहलू है उत्पादक शक्तियों का विकास और अतिरिक्त मूल्य का अधिक से अधिक उत्पादन। उत्पादक शक्तियों का विकास मजूरी आधारित उत्पादन प्रणाली के जरिए ही हो सकता है, और अतिरिक्त मूल्य के अधिक से अधिक उत्पादन के लिए सामूहिक उत्पादन अनिवार्य शर्त है। दूसरा पहलू है बाजारवादी व्यवस्था के नियमों के अनुरूप सामूहिक श्रम द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य में, जीवित श्रम के हिस्से को सामूहिक स्वामित्व में रखना और सामूहिक हित के लिए खर्च करना। जाहिर है इसके लिए जरूरी है नियमों को बनाने तथा लागू करने वाली राजसत्ता पर नियंत्रण। मार्क्सवादी जानते हैं कि जब तक मजदूर वर्ग जागरूक नहीं हो जाता है वह बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधियों को ही अपना प्रतिनिधि मानता रहता है और इसलिए कम्युनिस्टों के हित में है कि वे आंदोलन में आगे न चलें और हरावल दस्ते को अंतिम युद्ध में निर्णायक भूमिका के लिए तैयार करें। पुतिन अच्छी तरह जानते हैं कि रूस में कम्युनिस्ट अल्प मत में हैं और राहुल गांधी जानते हैं कि भारत में संशोधनवाद की जड़ें गहरी हैं। पुतिन और राहुल जिन्हें मार्क्सवाद की सही समझ है, इसे अच्छी तरह जानते हैं, पर भारतीय कम्युनिस्ट मानने को तैयार ही नहीं कि बुर्जुआ जनवादी पार्टी में रहते हुए पुतिन या राहुल मार्क्सवादी हो सकते हैं। एंगेल्स ने समझाया था कि मार्क्सवादी वह नहीं है जो मार्क्स को उद्धृत कर सके, मार्क्सवादी वह है जो किसी भी परिस्थिति में उसी तरह सोचे जिस तरह मार्क्स ने सोचा होता। इन पच्चीस सालों में निरंतर गिरती अर्थव्यवस्था ने सोवियत संघ का विघटन कर दिया। चीन को अपनी उत्पादक शक्तियों का विकास अपने दम पर करना पड़ा। पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था में अमेरिकी साम्राज्यवाद का एकाधिकार हो गया था और बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों ने पूँजीवाद को मानव समाज के अंतिम सत्य का दावा करते हुए इतिहास के अंत की घोषणा कर दी। पर इक्कीसवीं सदी की शुरुआत मानव समाज के विकास की अगली सीढ़ी साबित होने जा रही थी। अतिरिक्त मूल्य का, सामूहिक उत्पादन और व्यक्तिगत स्वामित्व, पूंजीवाद का मूल अंतर्विरोध है। पूंजीवादी चेतना के विश्वव्यापी होने के साथ सर्वहारा चेतना का विश्वव्यापी होना अनिवार्य है। वैचारिक स्वरूप के कारण चेतना के प्रसार के लिए राष्ट्रराज्य की सीमाएं बेमानी होती हैं पर भौतिक चीज़ों का आवागमन राष्ट्रराज्य की सीमाओं द्वारा निर्धारित होता है। मार्क्सवादी अस्तित्त्व तथा चेतना के द्वंद्वात्मक संबंध की समझ के आधार पर जानते हैं कि किसी राज्य में उत्पादक शक्तियों का और उत्पादन संबंधों का विकास राजसत्ता नियंत्रित करने वाले वर्ग की चेतना और समझ पर निर्भर करता है। इस कारण वैज्ञानिक समाजवाद के विकास का रास्ता और स्तर अलग अलग राष्ट्रों में अलग-अलग होगा। समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा सर्वहारा चेतना का मूल आधार है। और छोटे बड़े सभी राष्ट्रों की स्वायत्तता का आदर और उनके बीच सहयोग इसी की उप्रमेय है। संशोधनवादी अस्तित्त्व तथा चेतना के द्वंद्वात्मक संबंध से अनजान सारी दुनिया में एक साथ समाजवादी क्रांति का राग अलाप कर मजदूर वर्ग को गुमराह करते रहते हैं। वेनेजुएला में अमेरिकी सीमित सैन्य कार्यवाही का उद्देश्य समझने के लिए हमें पहले अमेरिकी आर्थिक मॉडल को समझना होगा। मुद्रा के रूप में डालर अमेरिकी सरकार का आश्वासन दर्शाता है कि उसका धारक प्रदर्शित मूल्य के बराबर मूल्य की वस्तु या समतुल्य अन्य मुद्रा कभी भी हासिल कर सकता है जिसकी गारंटी अमेरिकी फेडरल बैंक देता है। चूँकि तेल को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में केवल डालर के बदले ही बेचा-ख़रीदा जा सकता है इस कारण हर सरकार और व्यापारिक प्रतिष्ठान के लिए आवश्यक हो जाता है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में वह अपनी चीज़ों को डालर के बदले बेचे या ख़रीदे और डालर इकट्ठा करे। अमेरिका सहित पश्चिमी देशों ने समाजवाद-साम्यवाद नाम के प्रेत का डर संपन्नवर्ग की चेतना में रोपित कर दिया है कि वह उनकी सारी निजी संपत्ति लूट लेगा। अमेरिका ने अटलांटिक तथा प्रशांत महासागरों में नौ परिवहन मार्गों पर सैनिक नियंत्रण कर रखा है। व्यापार को भविष्य के काल्पनिक ख़तरों से सुरक्षा का आश्वासन भी, एक तरह की काल्पनिक कमोडिटी है जिसको बेच कर अमेरिकी सरकार सुरक्षा शुल्क (protection money) के रूप मे अरबों डालर कमाता है। अमेरिका अर्थ व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य तो कारपोरेट घरानों के निजी स्वामित्व में चला जाता है और तरह तरह के टैक्सों से धन जुटाने के बाद भी अरबों डालर का बजटीय घाटा पूरा करने के लिए अमेरिकी सरकार फेडरल बैंक से कर्ज लेती है। चीन, रूस के अलावा अन्य विकसित देश जिनके पास व्यापारिक लाभ में डालर इकट्ठे हो जाते हैं वे भी अमेरिका को कर्ज दे देते हैं। फेडरल बैंक के पास डालर नहीं होते हैं तो वह छाप लेता है क्योंकि उसे छापे गये डालर के बराबर सोना या चाँदी रखने की जरूरत नहीं है। अपने आर्थिक मॉडल की स्वीकार्यता और अपना बर्चस्व बनाये रखने के लिए अमेरिका के लिए जरूरी है कि वह अपनी सैन्य शक्ति का दबदबा बनाये रखे और जो भी राष्ट्र इस मॉडल से बाहर निकलने की कोशिश करे उसके शासकीय नेतृत्व को आर्थिक नाकेबंदी और जरूरत पड़े तो सैन्य हस्तक्षेप कर के अमेरिका के प्रभाव क्षेत्र में रहने को मजबूर करे। रूस और चीन दोनों परमाणु तथा अत्याधुनिक हथियारों तथा विशाल सेनाओं से संपन्न विशाल भूभाग वाले देश हैं। इक्कीसवीं सदी के शुरुआत में पुतिन द्वारा रूस का नेतृत्व संभालने के बाद दोनों देशों के बीच सैद्धांतिक सहयोग स्थापित हो गया है। अमेरिका उनके खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी का असफल प्रयास तो कर सकता है पर सैनिक कार्यवाही का दुस्साहस नहीं कर सकता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने लेटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के तीसरी दुनिया के देशों के साथ, सहयोग तथा बराबरी के आधार पर आर्थिक समझौते करना शुरू कर दिये। ईरान, लेबनान, सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में सैन्य कार्यवाही के बावजूद अमेरिका, चीन और रूस के संरक्षण में तीसरी दुनिया के देशों की एकजुटता को, और सामूहिक रूप से पैदा किये गये मूल्य के सामूहिक बंटवारे के नियम के साथ पारस्परिक सहयोग को तोड़ने में असफल ही रहा है। रूस द्वारा यूक्रेन पर सैनिक कार्यवाही के बाद अमेरिका ने रूस के 300 बिलियन डालर के रिज़र्व को फ़्रीज़ कर दिया। इसने अमेरिकी क़र्ज़दारों के कान खड़े कर दिये। ब्रिक्स देशों ने अपनी बैंकिंग व्यवस्था और व्यापार को अमेरिकी सरकार के प्रभाव से बाहर लाने के प्रयास शुरू कर दिये। अमेरिकी पाबंदियाँ और धमकियाँ बेअसर हो रहीं थी। किसी भी मुद्रा की स्वीकार्यता राजसत्ता के आश्वासन पर निर्भर करती है। अपना प्रभुत्व पुनर्स्थापित करने के लिए ट्रंप तीसरी दुनिया के किसी देश में तख़्ता पलट का अवसर देख रहे थे। पर इसके लिए किसी घर के भेदी की तलाश थी। और वह मिला जनरल खावियार तबाता के रूप में जिसके ऊपर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की आंतरिक सुरक्षा की ज़िम्मेदारी थी। उन्होंने मादुरो का अपहरण करने के लिए पूरी ताक़त झोंक दी। शेखी बघारते हुए उन्होंने घोषणा की, “One of the most stunning, effective and powerful display of American military might and confidence in American History.” जाको प्रभु दारुण दुख देही। ताकी मति पहले हर लेही। ट्रंप को अंदाज़ा नहीं था कि ह्यूगो चावेज के कम्यूनल काउंसिल आधारित राजनीतिक अर्थव्यवस्था के मॉडल से वेनेजुएला कि जनता को समझ आ गया है कि वे कहाँ खड़े हैं। उपराष्ट्रपति डेलसी रोड्रिग्ज़ ने घोषणा कर दी है कि उनकी सरकार मादुरो की सरकार है। अपने अधीनस्थ रणनीतिक सहयोगियों, नाटो तथा इज़राइल के साथ के बावजूद, अमेरिका न तो फ़िलिस्तीन को और न ही ईरान को अपनी शर्तें मनवाने के लिए मजबूर कर सका है। वैश्विक स्तर पर अपनी असफलता की खीज अमेरिकी नेतृत्व अपनी ही जनता के मानवीय अधिकारों के हनन के साथ निकाल रहा है। यही बुर्जुआ अधिनायकवाद की हताशा और खीज को दर्शाता है। एक समय ‘अब की बार ट्रंप सरकार’ का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी का व्यवहार ट्रंप जैसा ही है इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो तथा उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस का अमेरिका द्वारा अपहरण, अमेरिका के आधिपत्य की समाप्ति में मील का पत्थर साबित होगा। सुरेश श्रीवास्तव 17 जनवरी, 2026

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