Thursday, 29 January 2026

भारतीय कम्युनिस्टों के प्रशिक्षण स्थलों में यूजीसी के नये नियम

भारतीय कम्युनिस्टों के प्रशिक्षण स्थलों में यूजीसी के नये नियम SFS, सोसायटी फॉर साइंस, सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग बुद्धिजीवियों के बीच वैज्ञानिक दृष्टिकोण और एकजुटता विकसित करने के लिए सैद्धांतिक और सामयिक विषयों पर विमर्श गोष्ठियाँ आयोजित करता है। SFS के 25 जनवरी 2026 के वेनेज़ुएला की घटना पर विमर्श के दौरान डा. दुर्गेश कुमार ने, यूजीसी के नये ईक्यूटी रेगुलेशन 2026 के नियमों पर मेरे विचार जानना चाहे थे। उसी के संदर्भ से मैं अपनी यह टिप्पणी सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग बुद्धिजीवियों के सामने रख रहा हूँ। रोहित वेमुला (2016) और पायल तड़वी (2019) की आत्महत्या के बाद दाखिल की गई PIL में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश (2020) के अनुपालन में UGC ने, 13 जनवरी 2026 को गजट प्रकाशन के साथ Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 को लागू कर दिया था जिस पर उच्चतम न्यायालय ने फ़िलहाल रोक लगा दी है, पर उसने युवावर्ग के बीच जाति के आधार पर विभाजन को और अधिक गहराने का और रोजगार के आधार पर होनेवाली एकजुटता को कमजोर करने का अपना काम पूरा कर दिया है। इन दस सालों में क्रांतिकारी युवाओं की एक पीढ़ी का सारा जोश ठंडा हो चुका है और वह यथास्थितिवादियों की क़तारों में शामिल हो चुकी है। उच्च शिक्षण संस्थानों के पहले तीन चार साल के दौरान युवा 18-21 साल के आयु वर्ग में होते हैं और उनका प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स विकसित हो रहा होता है। उत्सुकता और यथास्थिति से विद्रोह उनके मानसिक विकास प्रक्रिया के प्रमुख लक्षण होते हैं। स्कूल और परिवार के नियंत्रित वातावरण के बाद उन्हें स्वतंत्र वातावरण में विकास का नया अवसर मिलता है। आठ से दस साल के अंत तक उनकी तर्कशक्ति और रूढ़िवादिता अस्थिभूत (Ossified) हो जाते हैं। शासकवर्ग के लिए नई पीढ़ी की चेतना को अपने अनुकूल ढालने के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। “कहने की जरूरत नहीं है कि [बुर्जुआ राजसत्ता में] सरकारी प्रोफ़ेसरों द्वारा आधिकारिक तौर पर पढ़ाया जाने वाला, बुर्जुआ विज्ञान तथा दर्शन, सरमायेदारों की युवा पीढ़ी को बहकाने तथा उन्हें बाहरी तथा अंदरूनी दुश्मनों के खिलाफ तैयार करने के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है”, और विश्वविद्यालयों में नियम क़ायदे भी युवा वर्ग को गुमराह करने, उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रदूषित करने, तथा उनकी एकता को खंडित करने के उद्देश्य से ही बनाये जाते हैं। आर्थिक आधार पर होनेवाले सामाजिक भेदभाव पर से ध्यान हटाने के लिए, अन्य सभी तरह के सामाजिक भेदभावों को जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण दर्शाया जाता है और उसी के अनुरूप वातावरण व नीतियाँ बनाई जाती हैं। इनमें धर्म और जाति आधारित भेदभाव सबसे ज्यादा कारगर होते हैं क्योंकि वे कई पीढ़ियों की, जन्म, विवाह तथा मृत्यु से संबंधित, रूढ़ियों तथा परंपराओं के कारण बचपन से अनभिज्ञ चेतना में गहरे बैठे होते हैं। ‘रोहित वेमुला को श्रद्धांजली’ के शीर्षक से 29 जनवरी 2016 मैंने एक लेख लिखा था। उसके अंश उद्धृत कर रहा हूँ जो आज भी उतने प्रासंगिक हैं जितने दस साल पहले थे।(http://marx-darshan.blogspot.com/2016/01/blog-post_28.html) “आत्महत्या से पहले रोहित भी, छात्र राजनीति में सक्रिय, अन्य छात्रों की तरह ही एक छात्र था, अन्य युवाओं की तरह ही अपरिपक्व, अति-उत्साही, महत्वाकांक्षी, आदर्शवादी, अतिसक्रिय। अत्याधिक ग़रीब, पिछड़े और शोषित तबके से आने के बावजूद, संघर्ष के जरिए अपने बल पर पीऐचडी के लिए अनारक्षित श्रेणी में स्कॉलरशिप पाना, उसके जीवट को दर्शाता है। प्रकृति विज्ञान का स्नातक होने के बावजूद समाज विज्ञान का विषय शोध के लिए चुनना, सामाजिक सरोकारों के प्रति उसकी सजगता को दर्शाता है। उसका मार्क्सवाद से अभिभूत होना और शुरुआती दौर में ऐस.ऐफ.आई. से जुड़ा होना दर्शाता है कि वह विश्वविद्यालय में अंबेडकर छात्र संगठन में सक्रिय होने के पहले तक जातिगत शोषण के कारणों को भी अर्थव्यवस्था में ही देखता था। सामाजिक सरोकारों के प्रति जागरूक, ऐसे कर्मठ संघर्षरत नौजवान का, मार्क्सवाद से मोह भंग होना और संघर्ष के लिए ऐसा रास्ता चुनना जो अंतत: उसे अंधी गली के उस छोर पर पहुँचा देगा जहाँ उसके पास आत्महत्या ही एकमात्र विकल्प रह जायेगा, उन परिपक्व मार्क्सवादियों के लिए चिंतनीय स्थिति होना चाहिए जो वामपंथी आंदोलन में आये ठहराव से चिंतित हैं, और चेतावनी होना चाहिए उन अति-उत्साहित नौजवानों के लिए जो क्रांति करने की जल्दबाज़ी में इस या उस वामपंथी संगठन में शामिल होना चाहते हैं जिनके लिए सिद्धांत की गहरी समझ से अधिक महत्वपूर्ण है आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी।” “मार्क्स का कहना है कि हर वर्ग अपने आर्थिक संबंधों के आधार पर सामाजिक और राजनैतिक विचारों का एक ऐसा तिलस्म खड़ा कर लेता है जो उसके आर्थिक आधार से पूरी तरह असंबद्ध नजर आता है, …………….. मार्क्सवाद की संशोधनवादी समझ के कारण वामपंथी, अंबेडकरवाद तथा मार्क्सवाद के दार्शनिक आयामों के बीच के अंतर को नहीं समझ पाते हैं और मार्क्स तथा अंबेडकर को एक ही पाले में रख कर नीति निर्धारण करते हैं।” “पर चार महीनों में ही उसका भ्रम टूट गया जब उसने पाया कि क़ानूनी लड़ाई में वह बिल्कुल अकेला है और राजसत्ता सत्तासीन पार्टी के हितों के अनुसार ही काम करेगी। उसे आख़िरी आशा भारतीय क़ानून व्यवस्था से थी, इसीलिए उसने अपने निलंबन के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दाख़िल की थी। पर उसकी वह आशा भी टूट गयी जब उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका को, उसके खिलाफ ऐफआईआर के लिए डाली गयी याचिका के साथ, संलग्न कर दिया।” “अब तक रोहित के वामपंथियों, प्रगतिशील और उदारपंथियों द्वारा पैदा किये गये सारे भ्रम टूट चुके थे। उसे समझ आ गया था कि राजसत्ता के लिए सबसे आसान होता है क़ानूनी प्रक्रिया का पालन करते हए दिखाकर व्यक्ति की आजादी छीन लेना, उसे जेल में बंद कर देना। ……………….. अठारह जनवरी को दोनों याचिकाओं पर सुनवायी होनी थी। जिन गंभीर धाराओं के लिए ऐफआईआर की मांग की गयी थी उनमें ज़मानत मिलने की कोई संभावना नहीं थी। जेल जाने के बाद सालों साल मुकदमेबाजी, और आगे बढ़ने के सारे रास्ते बंद। पीछे हटने का भी कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में एक ही रास्ता बचा था जिसे सत्रह तारीख़ की शाम रोहित ने चुन लिया।” ……………..उसके प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी नई पीढ़ी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित सिद्धांत की वह समझ पैदा करना जिसकी रोशनी में वे अपने भविष्य का रास्ता तलाश सकें और जिसके अभाव में किसी अंधी गली के बंद मुहाने पर पहुँच कर उन्हें भी वही विकल्प न चुनना पड़े जो रोहित को चुनना पड़ा।” कुछ दिन बाद 7 फरवरी 2016 को मैंने दूसरा लेख लिखा था ‘रोहत वेमुला की आत्महत्या से सबक़’।उसके भी कुछ अंश दोहराना चाहूँगा। (http://marx-darshan.blogspot.com/2016/02/blog-post.html) “रोहित और नवकरण दोनों के, आत्महत्या से पहले लिखे गये पत्र दर्शाते हैं को दोनों आत्महत्या के समय मानसिक रूप से संतुलित थे और उनकी आत्महत्या के कारण व्यक्तिगत नहीं थे। उन दोनों की समतामूलक सामाजिक मूल्यों में आस्था थी और वे इन मूल्यों के लिए लड़ रहे संगठनों के सक्रिय सदस्य थे। उनकी लड़ाई व्यक्तिगत न हो कर सामूहिक थी। अपने संघर्ष के दौरान किन्हीं कारणों से वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि, उन आदर्शों तथा मूल्यों को, जिनके लिए वे जी रहे थे, हासिल करना उनके लिए असंभव हो गया था और इस कारण उनके जीवन का कोई मूल्य भी नहीं रह गया था और उनके लिए आत्महत्या ही एकमात्र विकल्प रह गया था।” “रोहित और नवकरण का मसला, मार्क्सवादी होने के नाते इस लेखक के लिए इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही विज्ञान के विद्यार्थी रहे थे और मार्क्सवादी विद्यार्थी संगठनों जुड़े रहे थे। दोनों ही होनहार विद्यार्थी थे, शोषण के खिलाफ संघर्ष की भावना से ओतप्रोत, मार्क्सवाद से प्रभावित और मार्क्सवादी संगठनों के जुझारू कार्यकर्ता। परिस्थितियों के कारण रोहित की आत्महत्या को, मौजूदा सरकार तथा हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन द्वारा दलित उत्पीड़न का परिणाम दर्शाने के लिए पर्याप्त सामग्री हासिल थी इसलिए उसको व्यापक प्रचार मिल रहा है जब कि नवकरण की आत्महत्या की चर्चा कुछ वामपंथी संगठनों के बीच सिमट कर रह गयी है।” “रोहित ने रात में अभाविप के छात्र के कमरे पर जा कर और धमकी के द्वारा माफ़ीनामा लिखवाकर, व्यवस्था को मौक़ा दे दिया कि वह रोहित को राजनैतिक दायरे से बाहर खींच कर क़ानूनी दायरे में सबसे अलग-थलग कर उसके अस्तित्व पर हमला करे। रोहित ने पाया कि वह बिना किसी राजनैतिक संरक्षण, व्यवस्था के सामने अकेला है।” “बुर्जुआ जनवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा हथियार है व्यक्ति की आजादी छीन लेना। 18 जनवरी को हाईकोर्ट में ऐफआईआर दर्ज करने के मामले में सुनवाई के बाद अंतहीन बंदीजीवन के मुक़ाबले, 17 जनवरी की शाम जीवन समाप्त करने का विकल्प रोहित को बेहतर लगा।” “मार्क्सवादियों का नैतिक दायित्व है कि वे नई पीढ़ी को, इससे पहले कि वह अतिसक्रियता के रोमांस में मुख्यधारा की राजनीतिक भँवर में फँस जाय, मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम की सही समझ से लैस करें ताकि नौजवान अंधानुकरण की प्रवृत्ति को छोड़ कर वैज्ञानिक मानसिकता के साथ परिस्थितिओं का विश्लेषण कर हर क़दम पर सही निर्णय ले सकें।” 1964-72 के दौर में मेरे आराध्य धार्मिक देवी देवता न हो कर मार्क्स-एंगेल्स-लेनिन-स्टालिन-माओ होते थे और मैं भी क्रांति करने के शेखचिल्ली सपने देखता था। वह तीन साल का दौर मार्क्सवादी पार्टी का एक से दो और दो से तीन में विखंडन का दौर था। प्रक्रिया इतनी तीव्र थी कि मुझे समझ ही नहीं आया कि कौन सैद्धांतिक तौर पर सही है। मेरी तर्कबुद्धि और चीज़ों को मूल से पकड़ने की आदत ने मुझे संशोधनवाद के दलदल में फँसने से बचा लिया। अगले तीस साल वैश्विक परिस्थितियां समाजवाद के लिए प्रतिगामी थीं और उस माहौल में मुझे भी मार्क्सवाद की अंतर्वस्तु तथा अधिरचना को समझने में लग गये। जब मैंने SFS का गठन कर मार्क्सवाद की सैद्धांतिक समझ विकसित करने बीड़ा उठाया तब तक मेरे और उच्च शिक्षण संस्थानों की नई पीढ़ी के बीच चार पायदानों का फ़ासला हो चुका था। मेरे हर संभव प्रयास के बावजूद, मेरे साथ संवाद करने में उनकी कोई रुचि नहीं थी क्योंकि उन्हें समझाया जाता रहा है कि सौ साल में बहुत बदल चुका है, मार्क्सवाद में भी बहुत कुछ संशोधन हो चुका है और पुरानी पीढ़ी की मार्क्सवादी समझ आज अप्रासंगिक हो चुकी है। बीस साल के अथक प्रयास के बाद अनूप, दुर्गेश और बजिंदर जैसे साथी मिले जो इस बात से सहमत नजर आये कि मार्क्सवाद संपूर्ण विज्ञान है और व्यक्तिगत जीवन में भी उतना ही उपयोगी है जितना सामाजिक जीवन में, और हर मार्क्सवादी का दायित्व है कि वह स्वयं मार्क्सवाद की सही समझ हासिल करे और दूसरों को हासिल करने में मदद करे। अनूप, दुर्गेश और बजिंदर जिस शिद्दत के साथ SFS को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं उससे मुझे विश्वास है कि SFS के क्वांटम का उद्भव हो गया हौ और अब SFS अपने उद्देश्य को हासिल करने में अनवरत प्रगति करेगा। सुरेश श्रीवास्तव 29 जनवरी, 2026

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