Friday, 7 August 2015

अयोध्या विवाद - एक समाधान यह भी

अयोध्या विवाद - एक समाधान यह भी
(यह लेख उद्भावना के नवंबर 2010 के अंक में छपा था)

            पूंजीवादी जनतंत्रों (शोषक वर्ग की तानाशाही) में अदालतें राज्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग होती हैं क्योंकि वर्ग संघर्ष की तीव्रता कुंठित करने हेतु वर्ग निरपेक्षता के आडंबर के लिए न्यायिक प्रणाली सबसे कारगर मुखौटा साबित हुआ है। किसी भी राजनैतिक, आर्थिक या सामाजिक समस्या (एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के अधिकारों का अतिक्रमण) के निराकरण के लिए उच्च तथा उच्चतम न्यायालय अंतिम व्यवस्था के रूप में सर्वमान्य हैं क्योंकि वे आमतौर पर निरपेक्ष न्याय प्रदान करते हैं। साधारणतया विवाद पूंजीवादी जनतंत्र के मूल आधार के लिए संकट पैदा नहीं कर रहे होते हैं इस कारण न्यायालयों के लिए निरपेक्ष होकर न्याय प्रदान करने में कोई समस्या नहीं होती है। पर अगर किसी विवाद का न्यायपूर्ण हल पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था के मूल आधार के लिए खतरा पैदा कर सकता है तो न्यायालयों के लिए निरपेक्ष रहना असंभव हो जाता है क्योंकि ऐसा न्याय आत्मघाती होगा।
            दुर्भाग्य से अयोध्या एक ऐसा मसला है जिसमें निरपेक्ष न्याय भारतीय पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। इसे पूरी तरह समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि अयोध्या विवाद क्या है, कब शुरु हुआ तथा कौन से तथ्य सर्वमान्य हैं, कौन से विवादग्रस्त हैं और इस विवाद में सही-सही पक्ष कौन से हैं, न केवल अदालत के समक्ष बल्कि अदालत के बाहर भी और निरपेक्ष न्याय किस रूप में व्यवस्था के मूल आधार के लिए घातक है।
            समस्या का एक आयाम ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है इस कारण समस्या का विश्लेषण करते समय दो बातों को ध्यान में रखना होगा। एक तो यह कि समाज का जीवन तथा विकास निरंतर तार्किक प्रक्रिया है और दूसरा सामाजिक परिवर्तन प्रक्रिया में अनेकों संभावनाएं निहित होती हैं और तथ्य तथा संभावना में भेद न कर पाना गलत होता है। इस कारण अगर किन्हीं तथ्यों पर आधारित किसी ऐतिहासिक अवधारणा में निरंतरता खंडित या तार्किकता असंबद्ध नजर आती है तो ऐसे तथ्यों तथा ऐसी अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन तथा पुनव्र्याख्या आवश्यक हो जाते हैं।
            समस्या का एक आयाम हिंदू तथा मुसलमानों की धार्मिक आस्था से भी संबंधित है इस कारण यह भी ध्यान रखना होगा कि व्यापक हिंदू और मुसलमान समाज अपने आप में, न केवल विभिन्न देवी-देवताओं, पैगम्बरों तथा धार्मिक नेताओं में आस्था के कारण अनेकों संप्रदायों में बंटे हैं बल्कि राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक निजी स्वार्थों के कारण भी अनेकों समुदायों तथा समूहों में बंटे हैं। इस कारण कुछ-एक व्यक्तियों या समूहों का दावा कि वे अपने-अपने व्यापक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं सिद्धांततः गलत है तथा समस्या का विश्लेषण करते समय उनके सुझाव और मांगें दावे के रूप में अमान्य होने चाहिए।
            अयोध्या-समस्या का आधार है वह भूमि है जिस पर लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था और जिसके, कुछ हिंदू संगठन, भगवान राम के जन्म स्थान होने का दावा करते हैं, खड़ी थी और जिसे, उस समय की केंद्रीय तथा राज्य सरकारों के उच्चतम न्यायालय को दिये गये आश्वासनों के बावजूद, गैर-कानूनी तथा अलोकतांत्रिक तरीके से 6 दिसम्बर 1992 को जमींदोज कर दिया गया।
            आमतौर पर समस्या अधिकारों के अतिक्रमण को लेकर होती है और यहां भी समस्या भूमि के स्वामित्व को लेकर ही है। जहां कुछ हिंदू संगठनों का दावा है कि भगवान राम उसी जगह पैदा हुए थे, उस स्थान पर प्राचीन काल से मंदिर बना हुआ था तथा शाहंशाह बाबर के शासन में मंदिर गिरा कर उस जगह मस्जिद का निर्माण किया गया था वहीं मुसलमान संगठनों का दावा है कि बाबर के शासनकाल में मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर किया गया था न कि किसी धार्मिक स्थल को गिराकर।
            ऐतिहासिक इमारत का निर्माण 1528 में बाबर के शासनकाल में हुआ था इस बारे में सभी पुरातत्त्ववेत्ता तथा इतिहासकार एकमत हैं। लगभग साढ़े तीन सौ साल 1528 से 1885 के बीच कोई भी साक्ष्य या दस्तावेज नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि इमारत तथा भूमि को लेकर हिंदू तथा मुसलमानों के बीच कोई मतभेद था या और किसी रूप में धार्मिक आसहिष्णुता थी। बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू मुसलमान एक साथ मिलकर लड़े थे तथा उत्तर मध्य भारत में बहादुरशाह जफर को भारत का सम्राट भी स्वीकार किया गया था।
            विवाद को कानूनी दायरे में 29 जनवरी 1885 में पहली बार लाया गया जब महंत रघुबर दास द्वारा अदालत के सामने रामजन्मस्थान के लिए दावा पेश किया गया। सब-जज पंडित हरिकिशन ने मूल दावे में तथा जिलाधीश चामियर ने अपील में हिंदू पक्षकार को राहत देने से इनकार कर दिया पर आश्चर्यजनक रूप से दोनों ने अपने अपने आदेशों में टिप्पणी शामिल कर दी कि हिंदुओं के पूजास्थल को गिराकर उस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था बावजूद इसके कि दावे में ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं किया गया था जो हिंदुओं के पूजास्थल को गिराकर उस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किये जाने के दावे को तथ्य के रूप में दर्शाता। पर इस एक टिप्पणी से मजबूत हिंदू-मुसलमान एकता में ऐसा पच्चर ठोंक दिया गया जिसने आने वाले दिनों में हिंदू-मुसलमान एकता को ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की आजादी की लड़ाई के तीव्र होने के साथ-साथ हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता ने इतना कटु रूप धारण किया कि लाखों लोगों की कुर्बानियों के साथ-साथ देश के बंटवारे की कीमत भी भारत की जनता को चुकानी पड़ी, उस आजादी के लिए जिसमें 90 प्रतिशत जनता की आर्थिक आजादी आज भी संदेह के कटघरे में खड़ी है। आजादी मिलने के बाद 22-23 दिसम्बर 1949 की रात चोरी-छिपे रामलला की मूर्तियां ऐतिहासिक इमारत के अंदर रख दी गयी थीं। 1986 में ताले खुलवाने से पहले तक पूजा-अर्चना गैर-कानूनी तरीके से की जाती रही थी, 6 दिसम्बर 1992 में उच्चतम न्यायालय को दिये गये आश्वासनों के बावजूद केंद्रीय तथा राज्य सरकारें उन्मादी हिंदू कार-सेवकों की भीड़ द्वारा ऐतिहासिक इमारत को गिराये जाने से रोकने में असफल रहीं और गैर-कानूनी तरीके से किये गये विध्वंस के प्रतिकार स्वरूप ध्वस्त की गई ऐतिहासिक इमारत के पुनर्निर्माण की दिशा में सरकार ने कोई पहल नहीं की है ये ऐतिहासिक तथ्य हैं जिन्हें सभी इतिहासकार निर्विवाद रूप से मानते हैं और आम जनता भी जानती है। और अब धर्मनिरपेक्ष संविधान तथा कानून को नजरअंदाज कर हिंदू पक्षकारों के आस्था के दावे के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा दिये गये निर्णय ने हिंदुओं के धार्मिक उन्माद और हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता को नये शीर्ष पर पहुंचा दिया है।
            आज अयोध्या विवाद को समझने के लिए उस समय के कुछ और तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
            1857 में शुरु हुए विद्रोह को काबू में करने के बाद 1858 में बर्तानवी साम्राज्य ने भारतीय उपनिवेश की व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। साम्राज्य ने सबसे पहला काम किया कंपनी की सेना जिसमें मुख्यतया मध्यभारत के अवध राज्य के ब्रााहृण तथा मुसलमान थे, को विघटित कर सेना का क्षेत्रीय तथा जातीय आधार पर पुनर्गठन करना। दूसरा महत्वपूर्ण काम था भारतीय दंड संहिता (IPC1860) को लागू करना। तीसरा महत्वपूर्ण काम था इंपीरियल पुलिस सर्विस तथा इंपीरियल सिवल सर्विस का गठन जो आज के स्वतंत्र भारत में आई. पी. एस. तथा आई. ए. एस. के नाम से जानी जाती हैं। इसके साथ ही एक और नीतिगत निर्णय भी लिया गया। जहां कंपनी ने धार्मिक रूढ़िवादिता को समाप्त करने के लिए सती-प्रथा पर पाबंदी लगाने जैसे प्रगतिशील काम किये थे वहीं साम्राज्य ने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का निर्णय कर धार्मिक रूढ़िवादिता तथा धर्मांधता को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त माहौल प्रदान किया। इस प्रकार साम्राज्य ने जहां आई.पी.सी., आई.पी.एस. तथा आई.ए.एस. के जरिए धर्मनिरपेक्षता का चेहरा दर्शाया वहीं सेना के पुनर्गठन तथा नीतिगत निर्णयों के जरिए हिंदू-मुसलमान एकता को ध्वस्त करने की परोक्ष रणनीति अपनाई।
            साम्राज्य को अपनी औपनिवेशिक नीतियां लागू करने के लिए एक ऐसे संगठन की आवश्यकता थी जो दिखावटी तौर पर भारतीय राष्ट्रीयता से प्रेरित नजर आये पर वास्तव में साम्राज्य के हितों के अनुरूप काम करे और इसके लिए 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई। संस्थापक थे लॉर्ड ए. ओ. ह्रूम। वही ए. ओ. ह्रूम जो 1857 में इटावा के कलेक्टर थे और जिन्होंने विद्रोह को कुचलने के लिए हजारों निरीह आदमियों, औरतों और बच्चों को गांव-गांव में जाकर कत्ल किया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल किये गये भारतीय उस वर्ग से थे जो कंपनी राज में कंपनी की दलाली का काम किया करते थे और भद्रलोग कहलाते थे। इस प्रकार धर्म निरपेक्ष नजर आने वाली पर वास्तव में भारतीय अवाम को तकसीम करने वाली साम्राज्य की औपनिवेशिक नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को। यह महज संयोग नहीं है कि हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग जैसे कट्टर धार्मिक संगठनों को आधार प्रदान करने वाले पं. मदन मोहन मालवीय तथा मुहम्मदअली जिन्ना जैसे लोग किसी समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर काबिज थे। अनेकों राष्ट्रभक्त नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज भी अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से छुटकारा नहीं पा पाई है। 1949 दिसम्बर में आधी रात ऐतिहासिक इमारत के अंदर रामलला की मूर्तियां रखवाकर पूजा शुरु करवाना, 1984 में सिख विरोधी दंगों का नेतृत्व, 1986 में शाहबानो मामले में संविधान संशोधन तथा रामलला की पूजा के लिए ऐतिहासिक इमारत का ताला खुलवाना जैसे उदाहरण, भारतीय अवाम को सांप्रदायिक वैमन्स्य के आधार पर बांटने की अंग्रेजों की रणनीति तथा मानसिकता की निरंतरता के ही द्योतक हैं।
            उपर्लिखित ऐतिहासिक तथ्यों के अलावा कुछ और संभावनाएं तथा सामाजिक यथार्थ हैं जिन्हें तार्किक आधार पर इस मामले में ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
            पूर्व-आधुनिक काल से पहले यानि सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत तक राजसत्ता पूरी तरह धर्म के आधीन होती थी और राज्यों के बीच के झगड़े सीधे-सीधे युद्ध के द्वारा निपटाए जाते थे इस कारण पराजित पक्ष को मानसिक रूप से पंगु तथा प्रतिरोध के अयोग्य बनाने के लिए विजयी पक्ष द्वारा परास्त पक्ष के प्रमुख धार्मिक प्रतीकों तथा पूजा स्थलों को नष्ट करने के अभियान सामान्य बात थी।
            आदिकाल में एक राज्य का जीवन कुछ शताब्दियों का ही होता था। इसी प्रकार इमारतों का जीवनकाल भी कुछ शताब्दियों का होता था। आबादी का विस्थापन भी अनहोनी बात नहीं थी। इस कारण कुछ सहस्त्राब्दियों में एक ही स्थान पर अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न धर्मों के अनुयायियों तथा भिन्न-भिन्न धर्मों के पूजास्थलों के होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
            तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस अवधी में लिखे जाने से पहले तक रामकथा के भिन्न-भिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप थे इस कारण राम व्यापक हिंदू समाज के आराध्यदेव नहीं थे। कृष्ण और शिव के भक्त भी लगभग उतने ही थे जितने राम के थे और तीनों के बीच व्यापक सामन्जस्य का भी अभाव था। तुलसीदास द्वारा अवधी, जो कि मध्यभारत में आमभाषा थी, में लिखे जाने के कई दशकों बाद ही राम आम हिंदू के आराध्यदेव और कृष्ण-भक्तों तथा शिव-भक्तों के लिए भी उतने ही पूज्यनीय बन सके थे।          
            राजा दशरथ के आदिकाल से लेकर कंपनी राज के आधुनिक काल के बीच मध्य भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन और इस्लाम धर्मानुयायी राजाओं ने राज किया है। सभी धर्मों के पूजा स्थल या उनके अवशेष अयोध्या में अनेकों जगह आज भी मौजूद हैं।
            अब हम ऊपर लिखे ऐतिहासिक तथ्यों तथा संभावनाओं और तर्कों के आधार पर अयोध्या विवाद का विश्लेषण कर सकते हैं।
            अयोध्या में विवादित भूमि के बारे में हिंदू पक्षकारों का दावा है कि उस स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था और आदिकाल से वहां राममंदिर बना हुआ था जिसे मुगल शासक बाबर के सेनापति मीर बकी ने गिरवाकर उस स्थान पर मस्जिद का निर्माण करवाया था। चूंकि राम सारे हिंदू समाज के आराध्य तथा आस्था के प्रतीक हैं इस कारण गुलामी के दौर में किये गये उस अपकार का स्वाधीन भारत में प्रतिकार किया जाना अनिवार्य है। और इस प्रक्रिया में ऐतिहासिक इमारत का ढहाया जाना भी अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
            दूसरी ओर मुसलमान पक्षकारों का दावा है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनाई गई थी वह खाली स्थान था, उस स्थान पर हिंदुओं का या किसी और धर्म का कोई भी पूजा स्थल नहीं था क्योंकि किसी भी धार्मिक स्थल को तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद तामीर करना इस्लाम के अनुसार नाजायज है। उनके अनुसार अगर रामजन्म मंदिर या कोई और पूजास्थल रहा भी होगा तो वह बाबरी मस्जिद की भूमि से हटकर कहीं और रहा होगा इस कारण हिंदू पक्षकार रामजन्म मंदिर बनाना ही चाहते हैं तो बाबरी मस्जिद की भूमि छोड़कर कहीं भी बना सकते हैं।
            अयोध्या विवाद का बीजारोपण तो 1885 में महंत रघुबर दास के दावे के साथ ही कर दिया गया था पर अयोध्या विवाद अपने मौजूदा स्वरूप में 1949 में खड़ा किया गया था। यह महज इत्तेफाक नहीं था कि 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान, जिसमें भारत के सभी नागरिकों को अपनी-अपनी आस्था तथा पूजा-पाठ के लिए पूरी आजादी की गारंटी की गयी थी, को पारित करने के एक महीने के भीतर ही 22-23 दिसम्बर 1949 की रात में चोरी-छिपे रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गयी जिसे तुरंत हटाये जाने के पंडित नेहरू के आदेश के बाद भी नहीं हटाया गया। 1986 में पूजा-अर्चना के लिए ताले खुलवाने तथा 6 दिसम्बर 1992 में ऐतिहासिक इमारत के ढहाये जाने और अब धर्मनिरपेक्ष संविधान तथा कानून को नजरअंदाज कर हिंदू पक्षकारों के आस्था के दावे के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा दिये गये निर्णय ने हिंदुओं के धार्मिक उन्माद और हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता को नये शीर्ष पर पहुंचा दिया है।
            विवाद के लिए तो अनगिनत मुद्दे खड़े किये गये हैं और किये जा सकते हैं पर मुख्य मुद्दा है कि क्या 1528 में वहां राम या सीता के नाम से कोई मंदिर मौजूद था क्योंकि अगर वहां पर कोई मंदिर था तो फिर उस को गिराकर बाबरी मस्जिद तामीर की गई थी यह तार्किक तौर पर संभावना से बढ़कर तथ्य हो जाता है। पर कई हजारों साल पहले पैदा हुए राम से संबंधित लगभग सभी बातें तथ्यों से अधिक आस्था पर आधारित हैं वहीं पिछली दो-तीन सहस्त्राब्दियों से पिछली कुछ शताब्दियों के बीच अनेकों हिंदू, बौद्ध, जैन धर्माबलंबी राजसत्ताओं का अस्तित्व में होना तथ्यों पर आधारित है। साथ ही कुछ शताब्दियों पहले अगर मंदिरों तथा अन्य पूजास्थलों को ध्वस्त करना इस्लामी कट्टरता का अंग था तो गिराये गये पूजास्थल पर मस्जिद का निर्माण न करना उसी इस्लाम कट्टरता में शामिल है। ऐसी स्थिति में इस बात की अधिक संभावना है कि किसी भी पूजास्थल को ध्वस्त कर उसके स्थान पर मस्जिद नहीं बनायी गयी थी बल्कि बाबरी मस्जिद पहले से खाली जगह पर ही बनाई गयी थी।
            अदालत के समक्ष जो पक्षकार हैं उनका दावा है कि वे व्यापक हिंदू तथा मुसलमान जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि यथार्थ में व्यापक हिंदू तथा मुसलमान समाज को अयोध्या विवाद में किसी पक्ष के साथ सहानुभूति से अधिक उससे दहशत है। आम हिंदू को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि राम ठीक उसी जगह पैदा हुए थे जहां ऐतिहासिक इमारत खड़ी थी या उससे कुछ सौ मीटर या कुछ किलोमीटर दूर पैदा हुए थे। उसके लिए तो सारी अयोध्या तथा वहां मौजूद सभी मंदिर समान रूप से पूज्यनीय हैं। इसी प्रकार सारे भारत के आम मुसलमानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उस ऐतिहासिक इमारत में रामलला की मूर्तियां रखी हैं या उसमें अयोध्या के मुसलमान नमाज पड़ते हैं। उसे तो फर्क तब पड़ता है जब रामजन्मभूमि की आड़ में उसके जीवन तथा रोजी-रोटी के साधनों पर हमला किया जाता है।
            भारतीय संविधान जहां व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार की तथा धार्मिक आजादी की सुरक्षा सुनिश्चित करता है वहीं पर कुछ समूहों द्वारा धर्म के आधार पर सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार के तथा धार्मिक उन्माद फैलाने के कुटिल प्रयासों को रोकने के लिए सरकार के अधिकार तथा दायित्व को भी सुनिश्चित करता है। भारतीय राष्ट्र-राज्य का दायित्व है कि वह ईमानदारी से, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की तथा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करे और संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान पारित करने के बाद किये गये किसी भी गैर-कानूनी काम का प्रतिकार करे।
            निरपेक्ष न्याय की कसौटी होगी हिंदू तथा मुसलमानों की व्यापक आबादी के बीच धार्मिक सौहार्द के वातावरण की सुनिश्चिति ताकि उनके जीवन तथा जीवन-यापन के साधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
            अयोध्या विवाद हल करने के लिए सरकार को चाहिए कि सारी विवादित तथा गैर विवादित 67 एकड़ जमीन जिसके लिए 1993 में कानून बनाया गया था अपने कब्जे में ले, हिंदू तथा मुसलमान दोनों समुदायों से संविधान के अनुपालन तथा आपसी सौहार्द की व्यापक अपील करे, 1992 में गिरायी गयी ऐतिहासिक इमारत का पुनर्निर्माण करवाये, इमारत के ऐतिहासिक महत्व को सुरक्षित रखते हुए रामलला की मूर्तियों की स्थापना तथा पूजा-अर्चना की व्यवस्था करे, ऐतिहासिक इमारत की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आस्था के अनुरूप हिंदुओं के लिए मंदिर तथा मुसलमानों के लिए मस्जिद निर्माण की व्यवस्था करे। इस प्रकार का हल व्यापक तौर पर हिंदू तथा मुसलमानों के बीच सौहार्द, परस्पर विश्वास तथा एकता सुनिश्चित करेगा इसलिए दोनों समुदायों का बहुमत इसका स्वागत करेगा। न केवल सारे देश के आम मुसलमान बल्कि अयोध्या के मुसलमान भी अपने जीवन तथा रोजी-रोटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐतिहासिक इमारत को हिंदुओं को सौंपने के लिए सहर्ष तैयार हो जाएंगे क्योंकि वे जानते हैं कि जिस प्रकार मक्का उनके लिए पवित्र और महत्वपूर्ण है उसी प्रकार हिंदुओं के लिए राम संबंधित सभी चीजें हैं।          
            पर ऊपर सुझाया गया समाधान जहां हिंदू-मुसलमान एकता का वातावरण तैयार करेगा वहीं वर्ग संघर्ष में शोषित वर्ग की एकजुटता का मार्ग भी प्रशस्त करेगा और यही बात सामंती तथा बुर्जुआ हितों की हिमायती व्यवस्था के लिए घातक है। जाहिर है व्यवस्था में बैठे सामंती तथा बुर्जुआ हितों के पैरोकारों के लिए सुझाया गया समाधान स्वीकार्य नहीं होगा। पर जो लोग शोषित वर्ग के हिमायती होने का दावा करते हैं उनका नैतिक दायित्व है कि इस प्रकार के समाधान को लागू करने की मांग करें।
सुरेश श्रीवास्तव
(9810128813)

अक्टूबर 2010

Friday, 15 May 2015

विद्यामंदिरों से मार्क्सवाद का निर्वासन

विद्यामंदिरों से मार्क्सवाद का निर्वासन


            यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई कि कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र विभाग ने कार्ल मार्क्स को पाठ्यक्रम से निकाल बाहर किया है। (जनसत्ता, 8 मई 2015, आज की दुनिया में मार्क्स, अपूर्वानंद)। हर दौर में विश्वविद्यालयों में पढ़ानेवाले प्राध्यापकों तथा साहित्यकारों ने मार्क्सवाद के बारे में इतना अधिक भ्रम फैलाया है कि नई पीढ़ी समझ ही नहीं पाती है कि मार्क्सवाद एक ऐसा सिद्धांत है जो, प्रकृति में होने वाले या हो सकने वाले सभी परिवर्तनों को सही-सही समझ सकने और उनमें सार्थक हस्तक्षेप कर सकने की क्षमता प्रदान करता है। जो लोग मार्क्सवाद को केवल समाजवादी क्रांति के लिए एक विचारधारा के रूप में देखते हैं वे अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण मार्क्सवाद की अंतर्वस्तु को समझने में नाकाम हैं। वे मार्क्सवाद की अधिरचना के एक सूक्ष्म आयाम तक ही सीमित रह जाते हैं। अपूर्वानंद जी से क्षमा याचना के साथ कहना चाहूँगा कि उनकी टिप्पणियाँ इसकी पुष्टि करती हैं। लेख के अंत में संदर्भ से काट कर की गई उनकी टिप्पणी, 'और उसके लिए तो पढ़ना पड़ेगा ही। जितना बुद्ध को, उतना ही मार्क्स को। लेकिन बिना बौद्ध हुए या बिना मार्क्सवादी हुए। आख़िर यह मार्क्स ने ही कहा था कि एक बात जो तय है, वह यह है कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ', भ्रामक है। 1870 के दशक में फ़्रांस की कम्युनिस्ट पार्टी में व्याप्त संशोधनवाद की आलोचना करते हुए मार्क्स ने लिखा था ' अगर वे मार्क्सवादी हैं तो एक बात तय है कि मैं मार्क्सवादी नहीं हूँ।' और मार्क्स को पढ़ने से पहले मार्क्सवादी होना ज़रूरी है। मार्क्स की मृत्यु के बाद किसी ने एंगेल्स से पूछा था कि आप मार्क्सवादी किसे कहेंगे, तो एंगेल्स का उत्तर था, "मार्क्सवादी वह नहीं है जो मार्क्स को उद्धृत कर सके, मार्क्सवादी वह है जो किसी भी परिस्थिति में उसी प्रकार सोचे जिस प्रकार उस परिस्थिति में मार्क्स ने सोचा होता।" और मार्क्स के सोचने का तरीक़ा क्या था इसको समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि, मार्क्स अपने द्वारा प्रतिपादित किये गये सिद्धांत को मार्क्सवाद नाम दिये जाने का तीस साल तक विरोध करते रहे। उनका कहना था कि जो कुछ मैंने लिखा है वह तो सर्वहारा-वर्गचेतना पर आधारित समाज का ज्ञान है। पर अंत में 1872 में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की हेग कांग्रेस की पूर्व संध्या पर अपने साथियों के आग्रह पर, अपने सिद्धांत तथा संशोधनवादियों द्वारा फैलाये जा रहे भ्रामक प्रचार के बीच भेद करने के लिए, उन्होंने मार्क्सवाद नाम को स्वीकार किया था।
            अपूर्वानंद जी की यह टिप्पणी, ‘लेकिन यह भी मार्क्स का ही कहना है कि एक समय आकर विचार खुद भौतिक शक्ति में बदल जाते हैं ’ भी भ्रामक है। हेगेल के अधिकार के दर्शन की आलोचना करते हुए मार्क्स ने लिखा था, “आलोचना का हथियार, जाहिर है, हथियार की आलोचना का स्थान नहीं ले सकता है, भौतिक शक्ति को भौतिक शक्ति द्वारा ही विस्थापित किया जा सकता है; लेकिन सिद्धांत भी जनता के मन में घर कर लेने पर भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है। सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने में सक्षम तब होता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनकाब करता है, और वह पूर्वाग्रहों को तब बेनकाब करता है जब वह मूलाग्रही होता है। मूलाग्रही होने का मतलब है चीजों को उनके मूल के जरिए समझना ” जो लोग मार्क्स पर हिंसा की वकालत करने का आरोप लगाते हैं वे सरासर झूठ बोलते हैं। हिंसा के लिए प्रतिगामी शक्तियां उत्तरदायी होती हैं, जब वे प्रगति के रास्ते में व्यवधान पैदा करती हैं और प्रगतिशील शक्तियों के हाथों में परिवर्तन की कमान शांतिपूर्वक सौंपने से इनकार करती हैं।
            अपनी प्रसिद्ध पुस्तक, पूँजी के 1867 के जर्मन संस्करण की प्रस्तावना में, मार्क्स लिखते हैं, 'विनिमय-मूल्य, जिसका पूर्ण विकसित स्वरूप मुद्रा है, प्रारंभिक तथा अत्याधिक सरल स्वरूप है। फिर भी मानव मस्तिष्क, 2000 साल तक उसकी तह में पहुँचने के लिए असफल प्रयास करता रहा है, जब कि दूसरी ओर, वह और अधिक संयोजित तथा क्लिष्ट स्वरूपों को समझने में कुछ हद तक कामयाब रहा है।' जिस चीज को अनेकों दार्शनिक और चिंतक 2000 साल तक नहीं समझ सके उसे मार्क्स किस सिद्धांत के आधार पर, और कैसे समझ सके, इसे समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि मार्क्स ने सर्वहारा-वर्गचेतना में क्या पाया जिसके कारण वे सोचने का वह तरीका हासिल कर सके जो मार्क्सवादी बनने की अनिवार्य शर्त है। लेनिन ने 100 साल पहले लिखा था, “कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी प्रोफेसरों द्वारा आधिकारिक तौर पर पढ़ाया जाने वाला, बुर्जुआ विज्ञान तथा दर्शन, सरमायेदारों की युवा पीढ़ी को बहकाने तथा उन्हें बाहरी तथा अंदरूनी दुश्मनों के खिलाफ तैयार करने के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है।” सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग बुद्धिजीवियों के लिए यह एक अच्छा समाचार है कि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम से मार्क्सवाद को निकाल बाहर किया जा रहा। युवा पीढ़ी, विश्वविद्यालयों में फैले भ्रम जाल से बाहर निकल कर, सर्वहारा-वर्गचेतना की उस अंतर्वस्तु की पहचान, जो मार्क्सवादी बनने की अनिवार्य शर्त है, हासिल करने के लिए, जब अपने मध्यवर्गीय पूर्वाग्रहों को छोड़कर मेहनतकश जनता के साथ एकजुट होगी, वह भारत में वामपंथी आंदोलन के लिए प्रस्थानबिंदु होगा।

सुरेश श्रीवास्तव
15 मई 2015
मो. 9810128813        

                   

Thursday, 30 April 2015

वामपंथी आंदोलन में विचारधारा का संकट

वामपंथी आंदोलन में विचारधारा का संकट


अभी हाल ही में माकपा की पार्टी की 21वीं कांग्रेस संपन्न हुई है जिसमें सीताराम येचुरी को महासचिव चुना गया है। उन से एक इंटरव्यू में पूछा गया कि क्या कारण है कि उनकी पार्टी आदिवासी तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ नहीं बना पाई है तो उनका जवाब था कि मार्क्सवाद को समझने के लिए एक न्यूनतम शिक्षा का स्तर चाहिए। और माकपा के पूर्ववर्ती महासचिव प्रकाश करात ने कुछ दिन पहले भाकपा की 22वीं कांग्रेस के समक्ष अपने अतिथि वक्तव्य में रेखांकित किया था कि वाम के एक अंश के सशक्तीकरण के फलस्वरूप सारा वाम सशक्त होगा। (We need to acknowledge that the strengthening of one part of the Left will result in the strengthening of the Left as a whole.) दोनों महासचिवों की टिप्पणियाँ माकपा की सामूहिक सोच का प्रतिनिधित्व करती हैं और तथाकथित मार्क्सवादियों की मार्क्सवाद के बारे में नासमझी को दर्शाती हैं।
कार्ल मार्क्स तथा फ़्रेडेरिक एंगेल्स ने सर्वहारा वर्ग की चेतना की जिस अंतर्वस्तु की पहचान मार्क्सवाद के रूप में की थी, और जिसे परिभाषित करते हुए एंगेल्स ने कहा था कि मार्क्सवादी वह नहीं है जो मार्क्स को उद्धृत कर सके, मार्क्सवादी वह है जो किसी भी परिस्थिति में उसी तरह सोचे जिस तरह उस परिस्थिति में मार्क्स ने सोचा होता, और जिस मार्क्सवाद के लिए लेनिन ने कहा था कि मार्क्सवाद का सिद्धांत सर्वशक्तिमान है क्योंकि वह सत्य है, उस सिद्धांत की व्यावहारिक समझ के लिए औपचारिक स्कूली शिक्षा को आवश्यक मानना, निम्न मध्यवर्गीय मानसिकता को दर्शाता है। लेनिन ने संशोधनवाद के खिलाफ अपने संघर्ष को केंद्रित करते हुए 1902 में लिखे गये महत्वपूर्ण आलेख, ‘क्या किया जाय’ (What is to be done) में रेखांकित किया था, “काफी तादाद में लोग सतही या पूरी तरह नदारद सैद्धांतिक प्रशिक्षण के साथ, आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा सफलता के कारण, उसमें शामिल हो गये हैं” और 1908 में उन्होंने मार्क्स की 90वीं वर्षगाँठ के अवसर पर लिखा था, "कहने की ज़रूरत नहीं है कि सरकारी प्रोफ़ेसरों द्वारा आधिकारिक तौर पर पढ़ाया जानेवाला, विज्ञान तथा दर्शन, सरमायेदारों की युवा पीढ़ी को बहकाने तथा उन्हें बाहरी तथा अंदरूनी दुश्मनों के ख़िलाफ़ तैयार करने के उद्देश्य से पढ़ाया जाता है।" कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन जिसकी नींव निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों ने देश के बाहर रखी थी शुरू से ही संशोधनवाद के दलदल में फँस गया था जिससे वह आज तक नहीं निकल पाया है।
माकपा की आवधिक पत्रिका The Marxist में, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद, समाजवाद, जनवादी केंद्रीयता जैसे सैद्धांतिक विषयों पर छपे अनेकों लेखों से पार्टी की, निम्न मध्यवर्गीय मानसिकता तथा अवैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित, मार्क्सवाद की संशोधनवादी समझ साफ़ नजर आती है। मार्क्सवाद और समाजवाद में समय के अनुसार बदलाव की ज़रूरत और उन्हें भारतीय परिस्थिति के अनुसार विकासित किये जाने की आवश्यकता पर हर स्तर पर ज़ोर दिया जाता है पर बदलाव या बदले हुए स्वरूप की रूप-रेखा के बारे में संदर्भ पूरी तरह नदारद है। पार्टी के चिंतक, मार्क्सवाद या समाजवाद की संरचना और स्वरूप से पूरी तरह अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं। मार्क्सवाद की अंतर्रचना और अधिरचना के द्वंद्वात्मक संबंध को समझे बिना यह समझ पाना या समझा पाना, कि बदलाव आंतरिक संरचना में होना है या बाहरी स्वरूप में, असंभव है।
पिछले 25 वर्षों से जब से भाजपा, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभरी है, तथाकथित मार्क्सवादी पार्टियों के लिए जनवाद और गैर-सांप्रदायिकता की सुरक्षा-असुरक्षा भारतीय समाज का मुख्य अंतर्विरोध बन गया है और उनके सारे आंदोलन जनवाद और गैर-सांप्रदायिक मूल्यों की रक्षा पर ही केंद्रित हो गये हैं। लोहियावादी और जयप्रकाशवादी समाजवाद के नाम पर खड़ी की गयीं अनेकों क्षेत्रीय पार्टियां तो हमेशा से ही इन्हीं मूल्यों की दुहाई देती रही हैं। ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि वैज्ञानिक-समाजवाद विहीन, सभी तरह के काल्पनिक-समाजवादों की खिचड़ी ही, जनता की नजरों में वामपंथी आंदोलन का पर्याय बन गयी है । कम्युनिस्ट पार्टियां भी अन्य क्षेत्रीय पार्टियों की तरह कभी कांग्रेस या भाजपा के साथ तो कभी विरोध में खड़ी दिखायी देती हैं, और जनता कांग्रेस तथा भाजपा के विकल्प के रूप में माकपा या भाकपा की जगह आआपा को देखने लगी है । जनमानस के बीच वामपंथ के बारे में व्याप्त भटकाव के इस माहौल में करात का दावा, द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के बारे में उनकी नासमझी को जाहिर करता है। वामपंथ के एक अंश का सशक्तीकरण, वामपंथ के अन्य अंशो के निर्बलीकरण या पूरे वाम के निर्बलीकरण के बावजूद भी हो सकता है। अन्ना आंदोलन तथा आआपा के उभरने के साथ कम्युनिस्ट पार्टियों का अपनी जमीन खोना यही दर्शाता है।      
राजनैतिक अर्थव्यवस्था सामाजिक जीवन का आधार है और उसमें सार्थक हस्तक्षेप, सही विचारधारा से लैस एक राजनैतिक पार्टी ही कर सकती है। विभिन्न वर्गों में बंटे समाज में, अपनी परिस्थिति के कारण निम्न मध्यवर्ग के बीच से ही सामाजिक सरोकार रखनेवाले बुद्धिजीवी आते हैं। उन्हीं के बीच से जनता को भ्रमित करने वाले आते हैं  तो उन्हीं के बीच से सर्वहारा वर्ग को मार्क्सवाद के बारे में जागरूक करने और वैज्ञानिक समाजवाद के बारे में शिक्षित करने का दायित्व निबाहने वाले आते हैं। दायित्व का निर्वहन करने के लिए आवश्यक है कि युवा बुद्धिजीवी स्वयं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनायें, अमूर्त चिंतन की क्षमता विकसित करें और मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम की और वैज्ञानिक समाजवाद की सही-सही समझ हासिल करें। जैसा कि एंगेल्स ने समझाया था, अमूर्त चिंतन विकसित करने का एक ही रास्ता है, और वह है कि पुराने दर्शन को बार-बार पढ़ा जाय। यहां इस छोटे से लेख में मार्क्सवाद के दार्शनिक आयाम को विस्तार से समझाना संभव नहीं है पर लेखक का प्रयास है कि युवा पाठकों के सामने कुछ मूलभूत बातें और प्रश्न रखे जायें ताकि उनके उत्तर ढूँढने के प्रयास में जागरूक युवा पाठक अपना रास्ता ख़ुद ढूँढ सके।
प्रकृति में किसी भी चीज़ को पूरी तरह समझने के लिए आवश्यक है कि उसकी अंतर्वस्तु अर्थात आंतरिक संरचना तथा अधिरचना अर्थात बाहरी स्वरूप की सही-सही पहचान की जाय और उनके बीच के द्वंद्वात्मक संबंध को ठीक-ठीक समझा जाय। अंतर्वस्तु गुण निर्धारित करती है तो अधिरचना परिवेश के साथ अंतर्व्यवहार को तय करती है। और इस प्रक्रिया में दोनों द्वंद्वात्मक रूप से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। अधिरचना में परिवर्तन मात्रात्मक होते हैं तो अंतर्वस्तु में परिवर्तन गुणात्मक होता है।
चेतना के दो आयाम होते हैं। चेतना की अंतर्वस्तु अवचेतना है तो सजग चेतना अधिरचना दर्शाती है। चेतना का बाहरी जगत के साथ संपर्क इंद्रियों के ज़रिए होता है। बाहरी जगत के बारे में विचार या उसका ज्ञान, मस्तिष्क में बाह्य जगत का प्रतिबिंब होता है। मानवीय चेतना अन्य जीवों की चेतना से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है। अमूर्त चिंतन के द्वारा ऐसी चीज़ों की कल्पना कर सकना जिनका अस्तित्व ही नहीं है और उस कल्पना को मूर्त रूप प्रदान कर सकना, मानवीय चेतना का विशिष्ट गुण है।
किसी चीज़ का अस्तित्व भौतिक हो सकता है अर्थात उसका अस्तित्व चेतना के बाहर और चेतना से  निरपेक्ष तथा स्वतंत्र हो सकता है, या वैचारिक हो सकता है अर्थात मस्तिष्क के अंदर होने वाली प्रक्रिया जो बाह्य जगत का सटीक या विकृत प्रतिरूप हो सकता है।
व्यक्ति एक जैविक संरचना है जिसका भौतिक अस्तित्व है और जिसकी इकाइयाँ, जीवित कोशिकाएं, भौतिक रूप से एक दूसरे से जुड़ी होती हैं। समाज एक जैविक संरचना है, जिसका अस्तित्व भौतिक न होकर वैचारिक  है क्योंकि उसकी इकाइयाँ एक दूसरे से भौतिक रूप से संबद्ध न होकर वैचारिक रूप से संबद्ध होती हैं। सामाजिक चेतना का वास व्यक्तियों के मस्तिष्क में ही होता है, पर सामाजिक चेतना व्यक्तिगत चेतना से पूरी तरह भिन्न होती है। इस प्रकार व्यक्ति न केवल अपनी व्यक्तिगत चेतना का वाहक होता है बल्कि सामूहिक चेतना का भी वाहक होता है।
व्यक्तियों की आवश्यकताएँ न केवल शारीरिक होती हैं, बल्कि मानसिक भी होती हैं और माँगों की पूर्ति के लिए उत्पादों की ज़रूरत होती है। लोगों के बीच चीज़ों का आदान-प्रदान भौतिक और वैचारिक दोनों स्तरों पर होता है और उत्पादों के अस्तित्व का आयाम भौतिक और सामाजिक दोनों होता है। किसी भी उत्पाद के इंद्रियगम्य स्वरूप का अस्तित्व भौतिक है पर उसमें अंतर्निहित मूल्य का स्वरूप सामाजिक है। सिक्का या करेंगी नोट भौतिक उत्पाद हैं तो मुद्रा सामाजिक उत्पाद है। मशीन और संपत्ति भौतिक उत्पाद हैं तो पूंजी का स्वरूप पूरी तरह वैचारिक है, और सरमायेदार तथा पूँजीपति दो अलग-अलग व्यक्ति हैं। किसी उत्पादन व्यवस्था में श्रम-संबंधों और उत्पादन संबंधों को समझे बिना न तो सामंतवाद और पूँजीवाद के भेद को समझा जा सकता है और न ही समाजवाद के विकास में पूँजीवादी श्रम-संबंधों के योगदान को समझा जा सकता है।
जिन्हें द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समझ नहीं है, वे चेतना और अस्तित्व के संबंध को नहीं समझ सकते हैं। वे एक राजनैतिक दल को व्यक्तियों के समूह के रूप में ही देख पाते हैं जिसमें हर व्यक्ति अपने विचार और व्यवहार में पूरी तरह सजग और स्वतंत्र है। वे संगठन को एक ऐसे जैविक अस्तित्व के रूप में नहीं देख पाते हैं, जिसकी अवयव इकाइयाँ प्रत्यक्ष रूप में स्वतंत्र इकाइयाँ हैं, पर जो परोक्ष में, संगठन के सामूहिक उद्देश्य के दायरे में, एक स्वतंत्र जैविक अस्तित्व के, वैचारिक स्तर पर सुसंगठित अवयव हैं, जिनके माध्यम से संगठन एक जीवंत व्यवस्था के रूप में व्यवहार करता है। चीजों या प्रक्रियाओं की सही समझ के लिए उनकी आंतरिक संरचना तथा अधिरचना के भौतिक या वैचारिक स्वरूपों तथा उनके बीच के द्वंद्वात्मक संबंध को समझना आवश्यक है और जिनको समझे बिना सार्थक हस्तक्षेप असंभव है। पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अपनी भूमिका के कारण सर्वहारा, अपनी वर्ग चेतना के आधार पर श्रम, मूल्य, अतिरिक्त मूल्य तथा मुद्रा जैसी चीजों और अपने शोषण में उनकी भूमिका को सहज ही समझ लेता है। विडंबना ही है कि अधिकांश वामपंथी बुद्धिजीवी अपनी मध्यवर्गीय भूमिका के कारण, उत्पाद, मूल्य और मुद्रा के भौतिक और वैचारिक स्वरूपों को नहीं समझ पाते हैं, और इसलिए उनके लिए अतिरिक्त मूल्य और शोषण को समझना तथा समझाना असंभव है। इसी तरह अतिरिक्त मूल्य, संपत्ति तथा पूंजी के भौतिक तथा वैचारिक स्वरूपों तथा श्रम के साथ उनके संबंधों को समझे बिना सामंतवादी और पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था के भेद को समझना असंभव है। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की सही समझ ही, सामाजिक सरोकारों के प्रति सजग बुद्धिजीवियों को, भारतीय समाज के अंतर्विरोधों की सही-सही समझ हासिल करने और सार्थक हस्तक्षेप करने में मदद कर सकती है।
मौजूदा राजनैतिक अर्थव्यवस्था में, व्यक्तिगत हितों की टकराहट के चलते विभिन्न गुटों में बँटीं क्रांतिकारी शक्तियों को, सामूहिक हित के लिए दीर्घकालीन संघर्ष में एकजुट रखने तथा उनको मार्गदर्शन प्रदान करने का दायित्व, एक संगठित राजनैतिक दल  ही पूरा कर सकता है। और बिना किसी अपवाद के यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत आकांक्षाओं तथा निहित स्वार्थों और दल के उद्देश्यों तथा सांगठनिक हितों के बीच उचित सामंजस्य के बिना दीर्घकालीन एकजुटता असंभव है। उचित सामंजस्य के लिए सही विचारधारा की सही समझ पहली और अनिवार्य शर्त है।
युवावर्ग के लिए आज भी सार्थक है लेनिन की नसीहत, ‘जो कोई भी संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों, जिनके चलते मतभेदों के समाधान पहले के मुकाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते हैं, को नहीं समझता है, वह व्यापक मजदूर-वर्ग को ऐसे फैसलों में विजयी अभियान के लिए तैयार करने के मकसद से संसदवाद के आधार पर कभी भी उसूल सम्मत प्रचार तथा आंदोलन नहीं चला सकता है।’

सुरेश श्रीवास्तव
1 मई 2015

Wednesday, 29 April 2015

पार्टी, विचारधारा तथा लोकतंत्र

पार्टी, विचारधारा तथा लोकतंत्र

कुछ दिन पहले एक गोष्ठी की पूर्व-सूचना मिली थी। विषय था 'पार्टी, विचारधारा तथा लोकतंत्र'। आजकल गोष्ठियों में जाना लगभग बंद कर रखा है क्योंकि अधिकांश में सैद्धांतिक विमर्श पूरी तरह नदारद होता है और विमर्श के नाम पर होता है, मंचस्थ वक्ताओं का, आयोजकों की आकांक्षाओं के अनुकूल, एकतरफ़ा संवाद या आपसी आरोप-प्रत्यारोप। और एकाध अपवाद को छोड़कर, श्रोतागण भी आयोजकों तथा वक्ताओं की तर्ज पर ही होते हैं, जिनकी रुचि प्रश्नों के ज़रिए अपनी उपस्थति दर्ज कराने में ही होती है न कि सैद्धांतिक समझ विकसित करने में। विषय के तीनों अवयवों के महत्व को समझते हुए मैंने विचार गोष्ठी में शामिल होने का निर्णय किया पर गोष्ठी के अंत में हताशा के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं लगा।
सभी वक्ताओं और श्रोताओं का संवाद, किसी समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन को अंजाम दे सकने में सक्षम होने के लिए एक पार्टी की मूलभूत संरचना के गठन में आवश्यक अभिलक्षणों (Characteristics) की सैद्धांतिक पड़ताल की जगह, पूरी तरह आआ पार्टी के संदर्भ से, राजनैतिक परिवेश पर सतही टिप्पणियों तक ही सीमित था। सभी वक्ताओं का दावा था कि आआपा का गठन जनतांत्रिक और नैतिक मूल्यों में आस्था रखनेवाले आम कार्यकर्ताओं की पहल व भागीदारी से, आम सहमति के आधार पर हुआ था और पार्टी में निर्णय प्रक्रिया सामूहिक नेतृत्व आधारित थी, पर चुनावी सफलता के बाद, कुछ लोगों की अधिनायकवादी प्रवृत्ति के कारण पार्टी में संकट पैदा हुआ है और पार्टी विभाजन के कगार पर पहुँची है। प्रमुख अतिथि के रूप में प्रोफ़ेसर आनंद कुमार सहित सभी वक्ताओं का कहना था कि आआपा के गठन का वैचारिक आधार बिल्कुल सही था और पार्टी में आज जो भी संकट है वह अरविंद केजरीवाल की अधिनायकवादी प्रवृत्ति के कारण है। प्रोफ़ेसर आनंद कुमार का दावा था कि पार्टी की विचारधारा में कोई कमी नहीं है और आंतरिक संघर्ष के ज़रिए पार्टी को सही राह पर लाया जा सकता है। परंतु भ्रष्टाचार तथा सांप्रदायिकता विरोध के अलावा वे आआपा की विचारधारा के विभिन्न आयामों की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं कर सके, विशेषकर संसाधनों के उपयोग और अर्थव्यवस्था से संबंधित विषयों पर, सिवाय लोहियावादी समाजवाद के नारे के।
प्रश्नोत्तर काल में इस लेखक ने पूछा था,  कि सभी वामपंथी, मध्यमार्गीय तथा दक्षिणपंथी पार्टियां संगठन के मार्गदर्शन में अपनी-अपनी विचारधारा का दावा करती हैं, और कार्यप्रणाली में जनवाद की दुहाई देती हैं, पर व्यावहारिक तौर पर सभी किसी न किसी दौर में, नेतृत्व के अधिनायकवादी रवैये के विरोध में विखंडन के दौर से गुजरती रही हैं। पर संघ परिवार अपने अनेकों संगठन-सदस्यों के बीच वैचारिक मतभेद और नेतृत्व के अधिनायकवादी रवैये के बावजूद, न केवल अपने आप को एकजुट रख सका है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाने में भी सफल रहा है। इसका क्या कारण है। पर किसी भी वक्ता ने इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास नहीं किया।
कुछ दिन बाद आनंद कुमार का एक लेख ' राजनीति का सत और असत ' जनसत्ता में छपा जिसमें उन्होंने व्यक्ति की राजनैतिक भागीदारी को, विशिष्ट व्यक्ति, विचार, कार्यक्रम या संगठन के प्रति आकर्षण अथवा विरोध, अर्थात आठ स्वतंत्र प्रेरकों से प्रेरित, पूरी तरह ऐच्छिक कर्म माना है। उनका लेख, दर्शाता है कि वे विचारधारा की संरचना तथा महत्व से अनभिज्ञ हैं। वे इस बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं कि विचार किसी एक चीज़ या परिस्थिति पर ही केंद्रित होता है, जब कि विचारधारा कई संबद्ध चीज़ों तथा परिघटनाओं के अपेक्षत: अधिक व्यापक आयाम के बारे में तार्किक रूप से सुसंगठित विचारों की श्रंखला होती है।
निम्न मध्यवर्गीय चेतना व्यक्ति केंद्रित होती है इस कारण निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी का, विचार, कार्यक्रम या संगठन के प्रति आकर्षण उसकी अपनी निजी महत्वाकांक्षा का ही विस्तार होता है और विशिष्ट व्यक्ति के प्रति निष्ठा में वह अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति होते देखता है। इसीलिए आंतरिक जनवादी कार्यशैली के दावे के बावजूद हर संगठन में व्यक्ति ही संगठन का पर्याय बन जाता है। अगर हम कम्युनिस्ट पार्टियों, कांग्रेस पार्टियों तथा सोशलिस्ट पार्टियों के गठन, कार्यशैली तथा विघटन पर नजर डालें तो प्रत्यक्ष में हमें आनंद कुमार का निष्कर्ष ही सही नजर आयेगा। विचार, कार्यक्रम या संगठन के प्रति आकर्षण या विरोध की परिणति भी अंततः विशिष्ट व्यक्ति के प्रति आकर्षण या विरोध में ही होती है।
आर्थिक रूप से वर्ग विभाजित समाज में, राजनैतिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक संगठनों में भी, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तथा आर्थिक हितों की टकराहट के चलते अगर संगठन का सामूहिक नेतृत्व अपने आप को एकजुट नहीं रख पाता है तो सदस्य भी विरोधी गुटों में बंट जाते हैं और अंततः संगठन भी टुकड़ों में बंट जाता है। संघ परिवार की विचारधारा धर्म आधारित है और उसका सामूहिक नेतृत्व निरंतर, आत्म-मंथन के ज़रिए धर्म और विचारधारा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता सुनिश्चित करता रहता है। धार्मिक आस्था, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रण में रखने में सहायक होती है, और संघ परिवार का नेतृत्व अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सजगता के साथ, अपने आप को राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक मंचों से दूर रख कर, संघ के अंदर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को पनपने का मौक़ा नहीं देता है।
व्यक्ति के मस्तिष्क के अंदर होने वाली वैचारिक प्रक्रिया ही व्यक्ति के आचरण को संचालित करती है, और लोग किसी व्यक्ति के विचारों का आंकलन उसके आचरण के आधार पर ही करते हैं। इसी प्रकार संगठन के कार्य-कलाप उसकी विचारधारा से ही संचालित होते हैं और लोग किसी संगठन की विचारधारा का आंकलन उसके कार्य-कलापों के आधार पर ही करते हैं। कांग्रेस तथा भाजपा की पहचान सरमायेदारों की राजनैतिक पार्टियों के रूप में करने के बाद, अटकलों और अनुभव के आधार पर, मेहनतकश जनता, कभी जेपी, कभी वीपी और कभी अन्ना के पीछे चल पड़नेवाली, वामपंथी पार्टियों सहित, क्षेत्रीय पार्टियों के बीच ही एक विकल्प की तलाश में भटकती रहेगी, जब तक की वह इतनी जागरूक नहीं हो जाती है कि सर्वहारा के नेतृत्व में अपनी स्वयं की पार्टी का गठन कर सके। विडंबना है कि 90-95 साल पहले चंद निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों ने, रूमानियत में, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित विचारधारा की अधकचरी समझ के साथ, एक पार्टी का गठन किया था, जो आज भी अनेकों टुकड़ों में बिखरने के बावजूद विचारधारा की वह सैद्धांतिक समझ विकसित नहीं कर सकी है जो उसे सर्वहारा का नेतृत्व कर सकने की क्षमता प्रदान कर सके। तलाश अभी जारी है।

सुरेश श्रीवास्तव
28 अप्रेल, 2015