Monday, 21 November 2016

500₹ तथा 1000₹ के नोटों के विमुद्रीकरण के निहितार्थ

500तथा 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण के निहितार्थ

-           परिवेश से आगत सूचना के अनुसार प्रतिक्रिया करना, सभी जीवों का सहज प्राकृतिक गुण है। पर तर्कबुद्धि के आधार पर योजनाबद्ध तरीके से परिवेश के साथ अंतर्व्यवहार करना मानवीय चेतना का विशिष्ट प्राकृतिक गुण है।
-           प्रकृति संसाधनों से भौतिक जीवन के लिए आवश्यक चीजों का उत्पादन करने तथा उनका उपभोग करने के लिए परस्पर सहयोग करना, मानव समाज के विकास में जंगलयुग के स्तर का सहज प्राकृतिक गुण है। पर उत्पादन में सहयोग तथा उपभोग में प्रतिस्पर्धा व संघर्ष, और प्रतिस्पर्धा व संघर्ष से उपजे संकट से समाज को बचाने के लिए तर्कबुद्धि के आधार पर उचित हस्तक्षेप करना, मानव समाज के विकास में, वर्ग विभाजित सभ्यता के स्तर पर, सामाजिक चेतना का विशिष्ट गुण है।
-           प्रतिस्पर्धा तथा संघर्षों के घातक परिणामों से समाज को बचाने के लिए, राजनैतिक-अर्थव्यवस्था में हस्तक्षेप करने के लिए, सिद्धांत आधारित रणनीति तैयार करना और दूरगामी परिणामों को हासिल करने के लिए कार्यनीति बनाना तथा उसमें आवश्यक बदलाव सिद्धांत के आधार पर ही करना, तर्कबुद्धि आधारित हस्तक्षेप का द्योतक है। (सिद्धांत का अर्थ है वह अवधारणा जो व्यापकतम परिस्थितियों की सही व्याख्या कर सके।) फौरी राजनैतिक फायदों के लिए सिद्धांत रहित व्यवहार को ही सिद्धांत तथा रणनीति के तौर पर देखना, तर्कबुद्धि विहीन हस्तक्षेप का द्योतक है।
-           8 नवंबर 2016 की शाम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रसारण से उपजे आर्थिक संकट तथा उससे निपटने के उपायों के निरपेक्ष विश्लेषण के आधार पर ही तय किया जा सकता है कि मौजूदा सरकार का, 500 तथा 1000 के नोट बंद करने का यह कदम, फौरी राजनैतिक फायदे के लिए किया गया सिद्धांत रहित विवेकहीन हस्तक्षेप है, या फिर दूरगामी आर्थिक सहिष्णुता हासिल करने के लिए आर्थिक नीति में किया गया सिद्धांत आधारित विवेकपूर्ण हस्तक्षेप है।
-           निरपेक्ष विश्लेषण के लिए, मूल्य, मुद्रा तथा करेंसी की मूलभूत समझ हासिल करना तथा अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका को समझना जरूरी है।
-           अर्थ व्यवस्था में सभी उपयोगी चीजों के विनिमय में, उनकी मात्रा की तुलना, उनके अंदर निहित, जिस मूल्य के आधार पर की जाती है वह मानवीय श्रम-शक्ति के द्वारा ही पैदा होता है। किसी चीज के उत्पादन में लगने वाली मानवीय श्रम-शक्ति के दो पहलू होते हैं। एक तो श्रम-शक्ति की विशिष्ट श्रम पैदा करने की वह क्षमता जो किसी वस्तु को उपभोग योग्य बनाता है। दूसरा वह औसत सामाजिक श्रम पैदा करने की क्षमता जिसके कारण विनिमय में अलग-अलग उत्पादों की मात्रात्मक तुलना उनमें लगे हुए औसत श्रमकाल (जिसे मूल्य कहा जाता है) के आधार पर की सकती है। जिस सर्वमान्य मापदंड के आधार पर चीजों के मूल्य की तुलना की जाती है या जिसके आधार पर चीजों की कीमत दर्शायी जाती है, उस मुद्रा का न अपना कोई मूल्य होता है और न उपयोग सिवाय इसके कि उसका सभी प्रकार की वस्तुओं के विनिमय की इकाई के रूप में इस्तेमाल होता है क्योंकि वह राज्य द्वारा सत्यापित होती है तथा राज्य की सीमाओं के अंदर उसकी स्वीकार्यता कानूनी रूप से हर किसी के लिए बाध्यकारी होती है।
-           हर वस्तु की उपयोगिता उसके भौतिक स्वरूप तथा गुणों पर निर्भर करती है, पर वस्तु का मूल्य पूरी तरह एक वैचारिक चीज है जो समाज में विनिमय की परिस्थितियों में उजागर होता है और विनिमय के क्षेत्र के बाहर न उसका कोई अस्तित्व होता है और न ही कोई उपयोगिता। विनिमय के दौरान खरीदने वाले के लिए खरीदी जाने वाली वस्तु के मूल्य की पहचान उस वस्तु के भौतिक स्वरूप में उपभोग मूल्य के रूप में हो जाती है, पर बेचने वाले की रुचि किसी उपभोग योग्य वस्तु में न होकर केवल, राज्य द्वारा प्रत्याभूत मुद्रा की उतनी संख्या में होती है जो कीमत के रूप में बेची जानेवाली वस्तु के मूल्य को दर्शाती है।  
-           इस प्रकार मुद्रा का, विनिमय से बाहर एक उपयोगी भौतिक वस्तु के रूप में उपभोग-मूल्य, और विनिमय के दौरान, राजसत्ता द्वारा प्रत्याभूत मुद्रा (एक आश्वासन का मूर्त रूप) से तुलना के आधार पर कीमत के रूप में दर्शाया गया विनिमय-मूल्य, दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। सिक्कों का वास्तविक मूल्य उनमें मौजूद धातु के बाजार मूल्य के बराबर होता है, पर मुद्रा के रूप में उनका प्रत्यक्ष मूल्य उनके वास्तविक मूल्य से कई गुना अधिक होता है। पर विशिष्ट परिस्थितियों में जहां धातु की बाजार में कीमत इतनी बढ़ जाती है कि सिक्के में लगी धातु की कीमत उसके प्रत्यक्ष मान से अधिक हो जाय तो सिक्का मुद्रा के रूप में विनिमय से स्वयं बाहर हो जाता है। इसी प्रकार करेंसी नोट का, विनिमय से बाहर वास्तविक मूल्य एक रद्दी कागज के मूल्य के बराबर ही होता है, पर विनिमय के दौरान मुद्रा के रूप में उसका मूल्य कई गुना अधिक होता है। 1000 के करेंसी नोट की उत्पादन लागत लगभग 3 होती है, पर विनिमय में वह 1000 के मूल्य का पर्याय है। यह समझ कि नगद में रखा हुआ रुपया संपत्ति होता है गलत समझ है। जेब में रखे हुए 1000 के नोट का अपना कोई मूल्य नहीं होता है, मूल्य होता है उस पर अंकित राज्य के उस आश्वासन का जो उसे प्रतिभूति का स्वरूप प्रदान करता है। जिस क्षण राज्य का आश्वासन समाप्त हो जाता है उसी क्षण उसका विनिमय मूल्य शून्य रह जाता है। 8 नवंबर 2016 के बाद 500 रुपये तथा 1000 के नोटों का आम जनता के बीच विनिमय मूल्य शून्य हो गया है क्योंकि इस प्रकार के विनिमय में सरकार ने आश्वासन वापस ले लिया है। पर पेट्रोल पंप, बिजली विभाग आदि स्थानों पर विनिमय में उनका मूल्य अभी भी उन पर अंकित मूल्य के बराबर ही है क्योंकि उन विभागों को किये जाने वाले भुगतान को अभी भी सरकार का आश्वासन हासिल है।       
-           इस पृथ्वी पर मौजूद सारी भौतिक संपत्ति की पहचान, मानवीय श्रम द्वारा निर्मित उपयोगी वस्तुओं के रूप में ही की जाती है। संपत्तियां जब तक अपने निष्क्रिय रूप में होती हैं उनका मोल केवल काल्पनिक तथा भावनात्मक होता है। उनका वास्तविक मूल्य या तो उपभोग के दौरान उजागर होता है या विनिमय के दौरान। करेंसी नोट के रूप में संचित मुद्रा का मूल्य केवल विनिमय के दौरान ही होता है, विनिमय के बाहर उसका कोई उपयोग नहीं और इसलिए कोई उपयोगी मूल्य भी नहीं है। 9 नवंबर के बाद 500 तथा 1000 की करेंसी का कोई मूल्य नहीं रह गया है क्योंकि विनिमय के लिए उसे गैरकानूनी घोषित कर दिया गया है। उन्हें केवल एक आश्वासन के रूप में दूसरे नये आश्वासन के साथ ही बदला जा सकता है। मुद्रा सरकार के नियंत्रण में ही छापी जाती है तथा छपने के बाद सबसे पहले सरकार की ही संपत्ति होती है। या यूं कह सकते हैं कि सरकार, बहुत ही कम वास्तविक लागत के साथ, केवल अपनी साख के आधार पर अतिरिक्त मूल्य अर्थात अपने लिए मुनाफा पैदा करती है, पर साथ ही आश्वासन के रूप में देनदारी भी पैदा करती है।  मुनाफा तो सरकार के हाथ में सिक्कों या करेंसी नोटों के जारी होने के साथ ही आ जाता है, पर देनदारी तभी उत्पन्न होती है जब सरकार को किन्हीं परिस्थितियों में किसी करेंसी को वापस लेना पड़े जैसे नोटों के गलने या फटने पर होता है या किसी कारण कुछ नोटों को वापस लेना पड़े जैसा कि पिछले दिनों 1000 के नोटों की छपाई में कुछ सीरीज के नोटों में खामी होने के कारण उन्हें वापस लेना पड़ा था।
-           मूल्य पूरी तरह एक वैचारिक सामाजिक चीज है, जो सामूहिक-चेतना तथा व्यक्तिगत-चेतना में उस वास्तविक औसत सामाजिक समरूप श्रम का प्रतिबिंबि होता है जो, उत्पादन के दौरान उन चीजों में अंतर्निहित हो जाता है, जिनके भौतिक स्वरूप के कारण, विनिमय के दौरान वह प्रतिबिंबित होता है। इसी प्रकार मुद्रा भी पूरी तरह एक वैचारिक सामाजिक चीज है जो मूल्य के पर्याय के रूप में, सामाजिक-चेतना तथा व्यक्तिगत चेतना में राज्य समर्थित उस आश्वासन से उपजती है जो सिक्कों तथा करेंसी के भौतिक स्वरूप में मौजूद होता है।
-           प्रकृति प्रदत्त संसाधनों को, व्यक्तिगत तथा सामूहिक श्रम द्वारा उपभोग योग्य बनाना ही मानव के व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन का आधार है। विनिमय आधारित अर्थव्यवस्था, विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों में ही जन्म लेती है, और संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया का एक अंश मात्र है न कि संपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया। विनिमय में भी, करेंसी आधारित विनिमय का तो और भी बहुत छोटा अंश होता है। इस कारण केवल मुद्रा से तुलना के आधार पर दर्शाई गई कीमत को ही उत्पादों और सेवाओं का मूल्य मान कर न तो राजनैतिक-अर्थव्यवस्था का सही-सही विश्लेषण किया जा सकता है और न ही सामाजिक विकास प्रक्रिया को ठीक-ठीक समझा जा सकता है। राजनैतिक-अर्थव्यवस्था के सही-सही विश्लेषण के लिए उत्पादों तथा सेवाओं के विनिमय में, उनके विनिमय मूल्य को मुद्रा के सापेक्ष कीमत के रूप में न देखकर, उनके उत्पादन में लगे, दोहरी प्रकृति के श्रमकाल के रूप में देखना होगा। इसके बिना यह समझ पाना असंभव है कि विनिमय आधारित अर्थव्यवस्था में, उत्पादों को उनकी कीमत पर बेचे जाने के बावजूद अतिरिक्त मूल्य अर्थात मुनाफा कैसे पैदा होता है और किस प्रकार पूंजी अतिरिक्त मूल्य को हासिल कर स्वविस्तार करती है। श्रम आधारित मूल्य की गलत समझ के कारण ही वामपंथी समझ ही नहीं पाते हैं कि पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य के हस्तांतरण की प्रक्रिया सामंतवादी उत्पादन व्यवस्था में हस्तांतरण की प्रक्रिया से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है।(संदर्भ के लिए देखें,  तू ही राहबर, तू ही राहजन            http://marx-darshan.blogspot.in/2015/12/blog-post.html)
-           उत्पादन तथा उपभोग प्रक्रिया का चक्र दो भागों में पूरा होता है। पहली प्रक्रिया है प्राकृतिक संसाधनों, मानव द्वारा निर्मित उत्पादन के साधनों तथा मानवीय श्रम-शक्ति के द्वारा उपभोग योग्य वस्तुओं का उत्पादन करना, दूसरी प्रक्रिया है उत्पादित वस्तुओं के उपभोग के द्वारा उत्पादन के तीनों अवयवों को पुनर्जीवित तथा विकसित करना।  
-           उत्पादन के पहले दो अवयव निर्जीव निष्क्रिय होते हैं और नये उत्पाद के मूल्य में उनका उतना ही योगदान होता है जितना मूल्य उनके रख रखाव के लिए जरूरी चीजों के उपभोग पर खर्च होता है। निर्जीव निष्क्रिय अवयव अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं कर सकते हैं। पर अतिरिक्त मूल्य पैदा करना सजीव सक्रिय मानवीय श्रमशक्ति का प्रकृति प्रदत्त गुण है। खर्च की गई श्रमशक्ति को पुनर्जीवित तथा परिष्कृत करने में श्रमिक जितने मूल्य के उत्पाद का उपभोग करता है उससे कहीं अधिक मूल्य वह अपनी श्रमशक्ति को खर्च कर पैदा कर सकता है। इसके साथ ही सामूहिक श्रमशक्ति की उत्पादकता, व्यक्तिगत श्रमशक्ति की उत्पादकता से गुणात्मक रूप से भिन्न और कई गुना अधिक होती है। चीजों के विनिमय के दायरे के बाहर बहुत से कार्य कलाप होते हैं जो पूरी तरह व्यक्तिगत तथा सामूहिक सामाजिक होते हैं, पर जिनका व्यक्तिगत तथा सामूहिक क्षमताओं के तथा उत्पादकता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है ।
-           अतिरिक्त मूल्य या मुनाफा केवल उत्पादन में मानवीय श्रमशक्ति के फलोत्पादक उपयोग के द्वारा ही पैदा किया जा सकता है। जितना अधिक दक्ष उत्पादन की योजना तथा उसका कार्यान्वयन होगा उतना ही अधिक अतिरिक्त मूल्य होगा। श्रमशक्ति के उपभोग या खर्च के बिना अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं हो सकता है, उसका केवल एक उत्पाद से दूसरे में रूपांतरण हो सकता है। किसी चीज के उत्पादन से उपभोग तक की विनिमय प्रक्रिया, खरीद-बिक्री के एक ही चरण में पूरी हो सकती है या कई चरणों में भी। हर चरण में, उत्पाद को खरीदने में लगाई गई पूंजी, उत्पाद की बिक्री पर अतिरिक्त मूल्य के साथ वापस हो जाती ही। अनेकों छोटे-छोटे खरीद-बिक्री के चक्रों से मिलकर उत्पादन-उपभोग का चक्र पूरा होता है। हर चरण में बिक्री-मूल्य तथा खरीद-मूल्य के अंतर (आंशिक अतिरिक्त मूल्य) का कुल जोड़, उपभोग के समतुल्य-मूल्य तथा लागत मूल्य के अंतर अर्थात कुल पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य के बराबर होता है। ऊपर दिया कथन कि ‘सिक्के और करेंसी जारी कर सरकार अपनी साख के आधार पर अतिरिक्त मूल्य अर्थात अपने लिए मुनाफा पैदा करती है’ पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि उसके साथ ही उतनी देनदारी भी पैदा होती है। जारी किये गये सिक्कों तथा करेंसी का मूल्य सरकार पूंजी के रूप में इस्तेमाल करती है। जारी किये गये सिक्कों तथा करेंसी का मूल्य, सरकार का पूंजी निवेश होता है जिसके आधार पर अर्थव्यवस्था में पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य में से एक हिस्सा सरकार रेपो रेट पर ब्याज, उत्पाद कर तथा अन्य करों के रूप में वसूलती है।
         -  वर्ग विभाजित समाज में, सारा संघर्ष उस अतिरिक्त मूल्य में अधिक से अधिक हिस्सा बंटाने के लिए होता है जो उत्पादन के स्तर पर उत्पाद के रूप में पैदा होता है पर हासिल उत्पाद के उपभोग के बाद ही होता है। उत्पादन में लगने वाले तीनों अवयवों के स्वामित्व के आधार पर, तीनों वर्ग अपनी-अपनी ताकत के आधार पर अतिरिक्त मू्ल्य का हिस्सा हड़पने में कामयाब होते हैं।
-           सामंतवादी व्यवस्था में प्राकृतिक संसाधन सामंतवर्ग के आधिपत्य में होते हैं, श्रमशक्ति तथा श्रम के साधन श्रमिकवर्ग के आधिपत्य में और अन्य संपत्तियां तथा वितरण के साधन बुर्जुआवर्ग के आधिपत्य में होती हैं। सामंतवादी व्यवस्था में राज्य का गठन राजशाही के रूप में होने के कारण, सामंतवादी वर्ग सबसे अधिक ताकतवर होता है। उत्पादन व्यक्तिगत स्तर पर होने के कारण मजदूरवर्ग सबसे कमजोर वर्ग होता है।
-           उत्पादन का स्तर बढ़ने तथा व्यापार का विस्तार राज्य की सीमाओं के बाहर होने के साथ बुर्जुआवर्ग के पास साधन एकत्रित होते जाते हैं। इसके साथ ही बुर्जुआवर्ग निम्न बुर्जुआजी की मदद से, श्रमिकवर्ग को अपने पीछे लामबंद कर राज्य की शक्ति कब्जाने में सफल हो जाता है और राज्य का गठन राजशाही की जगह राष्ट्र-राज्य के रूप में जनवाद के आधार पर हो जाता है। राज्य के समर्थन तथा संचित पूंजी के आधिपत्य के कारण उत्पादन तथा अतिरिक्त मूल्य का सृजन अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच जाता है।
-           पूंजीवादी व्यवस्था में, प्राकृतिक संसाधन राज्य के नियंत्रण में आ जाते हैं, उत्पादन के साधन और परिसंपत्तियां बुर्जुआवर्ग के स्वामित्व में तथा कामगार की श्रमशक्ति पूंजीपति के नियंत्रण में हो जाती है। अतिरिक्त मूल्य की भागीदारी में राज्य ब्याज तथा विभिन्न करों के रूप में अपना हिस्सा लेता है, बुर्जुआवर्ग किराये तथा ब्याज के रूप में अतिरिक्त मूल्य में हिस्सा बंटाता है, और पूंजीपतिवर्ग मुनाफे के रूप में अतिरिक्त मूल्य में हिस्सा बंटाता है। यहां पर वर्ग तथा व्यक्ति का अंतर समझना महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति एक ही समय पर या अलग-अलग समय चेतन या अवचेतन स्तर पर अलग-अलग समूहों तथा वर्गों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि अतिरिक्त मूल्य के बंटवारे में मुख्य संघर्ष दो गुटों के बीच होता है। एक ओर होता है पूंजीपतिवर्ग और दूसरी ओर होता है संपत्तिवानवर्ग। राज्य, प्राकृतिक संसाधनों तथा संगठित हिंसक शक्ति के नियंत्रण के कारण दोहरी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक तो प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के कारण संपत्तिवानवर्ग की भूमिका तथा दूसरी संघर्षरत वर्गों के बीच पंच की भूमिका। पर असंगठित तथा राजनैतिक रूप से अपरिपक्व होने के कारण मजदूरवर्ग की भूमिका महत्वहीन रहती है। संघर्षरत संपत्तिवानवर्ग तथा पूंजीपतिवर्ग राजसत्ता का समर्थन हासिल करने के लिए जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत देकर अपनी ओर मिलाने का प्रयास करते हैं।
-           पूंजी, एकत्रीकरण के अपने चरित्र के कारण, दिनोंदिन अधिक शक्तिशाली होती जाती है और सभी वर्गों को अपने प्रभाव में लेती जाती है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण हर राष्ट्र की मुद्रा स्वयं एक जिंस या पण्य उत्पाद बन जाती है जिसका विनिमय उसी प्रकार होने लगता है जिस प्रकार अन्य उत्पादों का। अंतर्राष्ट्रीय बैंकों के करार-पत्रों का आश्वासन, मुद्रा के रूप में राज्य के आश्वासन से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जैसे-जैसे पूंजी का बर्चस्व बढ़ता जाता, ब्याज की दरें तथा कॉरपोरेट टैक्स की दरें घटती जाती हैं तथा मुनाफे की दरें बढ़ती जाती हैं।
-           अतिरिक्त मुनाफे की हवस के कारण पूंजीपति बही खातों में हेराफेरी कर टैक्स चोरी करते हैं और यही धन काला धन कहलाता है। इसी काले धन का एक हिस्सा, पूंजी के प्रबंधकों, बैंक प्रबंधकों और सरकारी कर्मचारियों तथा जनप्रतिनिधियों के बीच रिश्वत के रूप में बंटता है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के मूल चरित्र के कारण, काले धन के उत्पादन तथा बंटवारे को रोकने के लिए किए गये सभी उपाय अंततः बेकार साबित होते हैं।
-           पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में पूंजी के एकत्रीकरण के साथ केंद्रीकृत सामूहिक उत्पादन का स्तर बढ़ता जाता है और छोटे स्तर का उत्पादन घटता जाता है। संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारण सामाजिक चेतना का हिस्सा होती है जिसके कारण सामूहिक रूप से पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का बंटवारा व्यक्तिगत आधार पर होता है। यही अवधारणा सारे भ्रष्टाचार तथा काले धन का आधार और स्रोत है। जब तक सामाजिक चेतना में यह अवधारणा मौजूद है तब तक न भ्रष्टाचार को मिटाया जा सकता है न काले धन को।
-           सरकार के मौजूदा निर्णय का आंकलन करने के लिए कुछ आंकड़े भी ध्यान में रखना होगा। अनुमान लगाया जाता है कि प्रतिवर्ष लगभग 30-40 लाख करोड़ रुपये का काला धन पैदा होता है। 500 तथा 1000 के करेंसी नोटों का मूल्य क्रमशः 2 लाख करोड़ तथा 12 लाख करोड़ है। पहले 9 दिनों में 4 लाख रुपये की करेंसी बदली जा चुकी है जब कि नई करेंसी की आपूर्ति सीमित थी। अगर मान लिया जाय कि दिसंबर के अंत तक और 8 लाख करोड़ वापस हो जायेंगे तो माना जा सकता है कि केवल 2 करोड़ की करेंसी ही काले धन को रूप में बचेगी जो सरकार के खाते में आ जायगी क्योंकि सरकार उतनी देनदारी से मुक्त हो जायेगी। इसका अर्थ है कि काले धन का 5-6% ही करेंसी के रूप में बचता है बाकी या तो परिसंपत्तियों में जमा हो जाता है या फजूलखर्ची में उड़ा दिया जाता है। परिसंपत्तियों से वसूल पाना असंभव है क्योंकि संविधान के अनुसार संपत्ति मौलिक अधिकार है और कानूनी प्रक्रिया के द्वारा यह सिद्ध कर पाना असंभव है कि संपत्ति गैर कानूनी तरीके से अर्जित की गई है। चूंकि काले धन में सरकारी कर्मचारियों तथा जनप्रतिनिधियों की भी भागीदारी होती है इसलिए किसी नेता द्वारा कालेधन को वसूल करने का दावा करना एक जुमले के अलावा कुछ नहीं है।
-           संपन्न वर्ग तथा काले धन के खिलाफ जन आक्रोश को देखते हुए काले धन के खिलाफ लड़ाई का जुमला अक्सर चुनाव के लिए एक प्रभावी नारा होता है। जाहिर है कि आनेवाले उ.प्र. तथा पंजाब के चुनाव में इस जुमले का इस्तेमाल किया जा सकता है। जनता की स्मृति अल्पकालिक होती है, पर इतनी अल्पकालिक भी नहीं कि 2014 के चुनाव में इस्तेमाल किये गये जुमले को इतनी जल्दी भूल जाय।
            यह तो समय ही बतायेगा कि 20 करोड़ मेहनतकश जनता की जिंदगी को 15 दिन के लिए दूभर बना देना अच्छी चुनावी रणनीति साबित होता है कि नहीं।

सुरेश श्रीवास्तव
21 नवंबर, 2016

Tuesday, 25 October 2016

सन्निपात में भारतीय कम्युनिस्ट


सन्निपात में भारतीय कम्युनिस्ट
सुरेश श्रीवास्तव
(त्रैमासिक मार्क्स दर्शन के वर्ष 2 अंक 2, जनवरी-जून 2012 से उद्धृत)

            ए.आई.पी.एफ. नामक संस्था ने भारत का समाजवाद का रास्ता’ (India’s Path to Socialism) के नाम से सी.आर.आर. फाउन्डेशन के एन.आर.आर. केंद्र पर 27-30 दिसम्बर 2011 में एक कार्यशाला का आयोजन किया था। कार्यशाला की विषयवस्तु का विचार जिस प्रकार की भ्रामक समझ पर आधारित था उससे कोई दिशा तो क्या मिलनी थी, और अधिक भ्रम ही फैलना था। और वही हुआ। लगभग 50 भागीदारों ने शिरकत की और 22 पर्चे पेश किये गये। हर कोई नया पथ सुझाने में लगा था जिसकी भूलभुलैया में समाजवाद ही कहीं नजर नहीं आया, रास्ता तो क्या मिलना था। श्रोतागण कार्यशाला के शुरु में जितनी उलझन में थे उससे कहीं अधिक भटके हुए कार्यशाला के अंत में नजर आये। अपनी ढपली अपना राग की तर्ज पर हर वक्ता नये समाजवाद के रास्ते की अपनी-अपनी व्याख्या करने में लगा हुआ था, नये समाजवाद की अपनी किसी भी अवधारणा के बिना, और जहां से शुरु किया अंत में घूम फिर कर वापस वहीं पहुंचने के लिए अभिशप्त। हर किसी की आधारभूत मान्यता थी कि मार्क्सवाद ही समाजवाद का रास्ता दर्शा सकता है, पर साथ ही कि पुराना मार्क्सवाद पूंजीवाद के नये स्वरूप पर लागू नहीं किया जा सकता है और इसी कारण नये समाजवाद पर भी नहीं। अतः निष्कर्ष के तौर पर समाजवाद के नये स्वरूप के संदर्भ में मार्क्सवाद में सुधार की आवश्यकता है, लेकिन पेंच तो यही है कि नये समाजवाद की अवधारणा भी तो संशोधित मार्क्सवाद की रोशनी में ही विकसित की जा सकती है, और इसी पेंच ने हर किसी को मतिभ्रमित कर छोड़ा।
            जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी ने नयी पीढ़ी की खीझ को इन शब्दों में व्यक्त किया, ‘मैं यहां वक्ताओं से आग्रह करना चाहता हूं कि कृपया हमें विभिन्न देशों में पूंजीवाद की वर्तमान स्थिति के बारे में या सोवियत संघ के विघटन का इतिहास न बतायें। आज इंटरनेट तथा अपनी लाइब्रेरी के द्वारा उससे कहीं अधिक सूचना हमारी पहुंच में है, जिसे यहां वक्ता हमें देना चाह रहे हैं। कृपया हमारा मार्गदर्शन करें कि हमें करना क्या है, और अगर आपको नहीं मालूम है तो कृपया हमें अकेला छोड़ दीजिये, हम अपना रास्ता स्वयं ढूंढ लेंगे
            अधिकांश वक्ता मार्क्सवादी द्वंद्व तथा भौतिकवाद की दुहाई दे रहे थे पर अपनी कार्यप्रणाली में घोर तत्त्ववादी (Metaphysical), पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। सभी पर्चों में डायलेक्टिक्स, थीसिस तथा एण्टीथीसिस, यूनिटी एण्ड स्ट्रगल ऑफ अपोजिट्स, निगेशन ऑफ निगेशन और क्वांटिटेटिव तथा क्वलीटेटिव चेंज जैसी बकबक की भरमार थी और सभी का लब्बो-लुआब था कि एसटीआर (Scientific and Technical Revolution) और आईसीआर (Information and Communication Revolution) के कारण उत्पादन प्रक्रियाओं में क्रांतिकारी बदलाव आया है, बुर्जुआजी तथा सर्वहारा के चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है, प्रजातंत्र तथा समाजवाद की अवधारणाएं एक दूसरे का पर्याय बन गये हैं और इस सब के कारण मार्क्स, एंगेल्स तथा लेनिन के काल से अब तक मानव समाज में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है और इस कारण मार्क्स, एंगेल्स तथा लेनिन की नसीहतों में आमूल-चूल बदलाव आवश्यक हो गया है।
            कार्यशाला में पढ़े गये सभी पर्चों में व्यक्त हर विचार पर विस्तृत चर्चा दस्तावेजों का पुलिंदा तैयार कर देगी जो अन्वेषी नई पीढ़ी को हताश ही करेगी इस कारण मैं अपने आप को एसटीआर तथा आईसीआर की बुनियादी धारणाओं तथा उत्पादन प्रक्रिया में उनकी भूमिका, सामाजिक-आर्थिक संरचना के रूप में समाज की आधारभूत अवधारणाओं और राज्य की भूमिका तक सीमित रखूंगा, और इस निर्णय को पाठकों के विवेक पर छोड़ूंगा कि पूंजीवाद की तर्कसंगति में कोई गुणात्मक परिवर्तन हुआ है या नहीं। सभी महान चिंतकों से क्षमायाचना के साथ मैं कहना चाहता हूं कि मैं अपने विचारों के समर्थन के लिए उनके उद्धरणों के प्रयोग से बचना चाहूंगा। इसके बनिस्पत मैं मानव तथा मानव-समाज पर लागू होने वाले प्रकृति के आधारभूत नियमों की रोशनी में ही समझाना चाहूंगा कि तथाकथित एसटीआर तथा आईसीआर के कारण पूंजीवाद की मूल तार्किकता तथा समाजवाद की व्याख्या में किसी परिवर्तन की आवश्यकता है, या उनका प्रभाव केवल अधिरचना में कुछ ढांचागत बदलावों तक ही सीमित है। और अंत में मेरे लिए प्रकृति को समझने के लिए द्वंद्व के नियमों को गढ़ने का कोई प्रश्न ही नहीं है बल्कि उन्हें तथा उनके विकास को तो प्रकृति के अंदर ही ढूंढना है।
            मानव अपने जीवन-यापन के साधन, न केवल जानवरों की तरह अपने श्रम द्वारा जुटाते हैं, बल्कि उनसे अलग, श्रम-साधनों के जरिए उत्पादन द्वारा भी जुटाते हैं। जैसे ही वे अपने जीवन-यापन के साधनों का उत्पादन करने लगते हैं, वे अपने आप को जानवरों से अलग रूप में पहचानने लगते हैं, एक ऐसा कदम जिसका कारण उनकी शारीरिक संरचना में निहित है। जीवन-यापन के साधनों का उत्पादन कर मनुष्य अप्रत्यक्ष रूप से वास्तव में अपने भौतिक जीवन का निर्माण करने लगते हैं। एक दूसरा खास फर्क जो मानव-इतिहास की ऐन शुरुआत से ही अस्तित्व में आ जाता है वह है कि मानव जो रोज अपने निजी जीवन का निर्माण करते हैं, वे अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे मानवों का भी निर्माण करने लगते हैं - स्त्री तथा पुरुष के बीच संबंध, मां-बाप तथा बच्चों के बीच संबंध, परिवार के रूप में। जीवन का उत्पादन, स्वयं का मानवीय श्रम में और नये का प्रजनन में, अब एक द्वय-संबंध के रूप में उदित होता है - एक ओर प्राकृतिक स्वरूप में और दूसरी ओर सामाजिक संबंध के रूप में। सामाजिक से तात्पर्य है अनेकों व्यक्तियों के बीच पारस्परिक सहयोग, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह सहयोग किन परिस्थितियों में, किस रूप में और किस उद्देश्य के लिए है। इस से निष्कर्ष निकलता है कि किसी भी उत्पादन का स्वरूप या औद्योगिक स्तर हमेशा ही किसी न किसी प्रकार के सहयोग या सामाजिक स्तर पर आधारित होता है, और यह सहयोग का स्वरूप अपने आप में एक उत्पादक शक्ति है। उत्पादन की प्रारंभिक शर्त है सहयोग और उन्नत उत्पादन सहयोग को विकसित करता है और यह प्रक्रिया चक्रिक न हो कर पेंचदार होती है जो मानव समाज को एक जैविक संरचना के रूप में अन्य जैविक संरचनाओं से अलग स्तर प्रदान करती है। व्यवहार से ज्ञान अर्जित होता है तथा अर्जित ज्ञान से व्यवहार विकसित होता है और यही वह विशिष्टता है जो मानव तथा सामाजिक चेतना को विकास की अनन्त क्षमता प्रदान करती है।
            निरंतर विकासरत वैज्ञानिक तथा तकनीकी ज्ञान का पहला मकसद हमेशा ही उत्पादकता तथा उत्पादन प्रक्रिया, जो प्राकृतिक रूप से मिलने वाले पदार्थों को मानव की किसी न किसी जरूरत को पूरा करने योग्य उपयोगी पदार्थों में परिवर्तित करती है, में सुधार करना रहा है। शुरुआत में चीजों का, उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों के लिए केवल उपयोग-मूल्य होता था, लेकिन बढ़ती उत्पादकता तथा श्रम के विभाजन के साथ बिचौलियों का एक ऐसा नया वर्ग अस्तित्व में आया जो चीजों में केवल जिंस के रूप में व्यापार करने में रुचि रखते थे और उनके लिए चीजों का मूल्य, उपयोग-मूल्य न होकर केवल विनिमय-मूल्य था। उनकी रुचि पहले जिंसों के व्यापार में, फिर उत्पादन में भी, तभी हो सकती थी जब वे विक्रय-मूल्य के रूप में उपभोक्ता से (उपयोग-मूल्य के रूप में), उस विनिमय-मूल्य से अधिक हासिल कर सकें जो कि उन्हें माल खरीदने के लिए विक्रेता को लागत रूप में, तथा उत्पादक-श्रमिक को उस माल को उपयोगी पदार्थ के रूप में परिवर्तित करने के लिए मजदूरी के रूप में, देना पड़ा था। सूक्ष्म स्तर पर परिवर्तन के लिए एक श्रमिक के श्रम की आवश्यकता होती है पर व्यापक स्तर पर वह लाखों कामगारों की सामूहिक उत्पादक श्रम-शक्ति होती है। बिचौलिए का एकमात्र मकसद था, उस अतिरिक्त मूल्य को हड़पना जो केवल तभी अस्तित्व में आता है जब किसी पदार्थ को उपयोगी वस्तु में परिवर्तित किया जाता है, यानि उत्पादन। शुरुआती काल में उत्पादन प्रक्रिया एक ही श्रमिक की श्रम-क्रिया होती थी, या फिर अनेकों श्रमिकों की श्रंखलाबद्ध श्रम-क्रिया। पर विज्ञान तथा तकनीकी के विकास के साथ ही मशीनों ने श्रमिकों की भूमिका में परिवर्तन करना शुरु कर दिया। पदार्थों को उपयोगी वस्तुओं के रूप में परिवर्तन करने में श्रमिकों की जगह अब मशीनों ने ले ली थी, जिनकी निगरानी तथा भूल-सुधार के लिए श्रम-शक्ति प्रदान करना ही अब श्रमिकों की भूमिका हो गई थी। पर अतिरिक्त मूल्य अब भी केवल जीवित श्रमिक के श्रम द्वारा ही उत्पन्न किया जा सकता है न कि मशीनों में निहित श्रम द्वारा जो खरीदे गये मूल्य पर उत्पादन की गई वस्तुओं में, ह्यास के रूप में जुड़ जाता है। विज्ञान तथा तकनीकी में हुए किसी भी क्रांतिकारी परिवर्तन के कारण अगर उत्पादन प्रक्रिया में कोई भी बदलाव होता है तो वह है कि अब अतिरिक्त मूल्य श्रमिक द्वारा लगातार पूरी प्रक्रिया में न जोड़ा जा कर प्रक्रिया के भिन्न-भिन्न पड़ावों पर जोड़ा जाता है।
            एक और आयाम जिसके कारण मानव अन्य जानवरों से गुणात्मक रूप से भिन्न है, वह है उनकी विचारों को अनेकों श्रव्य-दृष्ट (Audio-visual) संकेतों के द्वारा विशिष्ट सूचना के रूप में प्रेषित करने की क्षमता - यानि संचार - जिसके कारण वे सामाजिक रूप से भाषा का गठन कर सके। पहले-पहल संचार व्यक्तियों के बीच सीधे-सीधे सूचना के आदान-प्रदान के जरिए संभव था पर लिपि के आविष्कार तथा टंकन, टेलीग्राफ, टेलीफोन तथा बेतार आदि के रूप में सूचना तथा संचार में क्रांतिकारी परिवर्तनों के बाद तो संचार समय तथा दूरी की किसी भी सीमा के पार संभव हो गया है। कोई भी तकनीकी ज्यादा से ज्यादा मनुष्यों के बीच या मनुष्य तथा मशीन के बीच संचार में सुधार तो कर सकती है पर किसी भी रूप में मानव द्वारा सामाजिक रूप से अपने भौतिक जीवन के निर्माण के दौरान पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य के, या पूंजी के सामाजिक रूप से किये गये अतिरिक्त उत्पाद को निजी तौर पर हथिया लिए जाने की प्रक्रिया द्वारा स्वविस्तार के, मूलभूत चरित्र में कहीं कोई परिवर्तन नहीं कर सकती है।
            ऐतिहासिक विकास में किसी स्तर पर आ कर समाज सम्पन्नों तथा विपन्नों, उत्पादकों तथा परजीवियों के बीच बंट कर एक ऐसे न सुलझ सकने वाले अंतर्विरोध में फंस गया जिससे निकल पाना उसके लिए असंभव था। पर इसलिए कि कहीं ये अंतर्विरोध, विरोधी आर्थिक हितों वाले वर्ग स्वयं को तथा समाज को स्वविनाशकारी संघर्ष में न झोंक दें, संघर्ष की तीव्रता कम करने तथा उसे एक व्यवस्था की सीमाओं के अंदर बांधे रखने के लिए एक ऐसी शक्ति अपरिहार्य हो गई जो देखने में समाज से ऊपर हो, और यही शक्ति जो समाज के अंदर से ही पैदा होती है पर स्वयं को उसके ऊपर रख कर शनै-शनै अपने को उससे अलग करती जाती है, राज्य है।
            मार्क्सवादी चिंतन के अनुसार राज्य एक वर्ग के शासन का अंग है, एक वर्ग के द्वारा दूसरे वर्ग के दमन का जरिया, वह एक ऐसी व्यवस्था की रचना है जो वर्गों के बीच संघर्ष की तीव्रता को हल्का कर इस दमन को जायज तथा अनवरत बनाती है। जैसा कि निम्न-बुर्जुआ सिद्धांतकार दावा करते हैं, संघर्ष की तीव्रता को कम करने का अर्थ वर्गों के बीच समझौता होना नहीं है, उसका मतलब है शोषित वर्ग द्वारा शोषकों को उखाड़ फेंकने के संघर्ष में कुछ विशिष्ट साधनों तथा तरीकों से उनको वंचित रखना। राज्य अपने लिए एक जन-शक्ति की रचना करता है जो किसी भी रूप में जनता द्वारा अपने को हथियारबंद करने की तरह नहीं है जैसा कि आदिम गोत्र समाजों में होता था। यह जन-शक्ति हर राज्य में मौजूद होती है, इसमें शामिल न केवल सशस्त्र लोग होते हैं बल्कि इसके अनुषांगिक तत्त्व, कैदखाने तथा हर प्रकार के दमन के साधन भी शामिल होते हैं, जिन से आदिम गोत्र समाज पूरी तरह अनजान था। बिना किसी अपवाद वह सबसे शक्तिशाली, आर्थिक रूप से सब पर भारी वर्ग का राज्य होता है जो राज्य की मदद से राजनैतिक रूप से भी सबसे अधिक प्रभावशाली हो जाता है, और इस प्रकार पस्त वर्ग को दबाये रखने के तथा शोषण के नये साधन हासिल कर लेता है। मौजूदा प्रतिनिधि राज्य, पूंजी द्वारा मजूरी-श्रम के शोषण का एक औजार है।
            जनवादी जनतंत्र, जो हमारी मौजूदा परिस्थितियों में अधिक से अधिक एक अत्याज्य आवश्यकता हो जाती है, राज्य का सबसे ऊंचा स्वरूप है, और राज्य का वह स्वरूप है केवल जिस के अंदर ही सर्वहारा तथा पूंजीपति के बीच का निर्णायक युद्ध लड़ा जा सकता है - जनवादी जनतंत्र आधिकारिक तौर पर संपत्ति के अंतर को नहीं मानता है। दौलत यहां अपनी शक्ति परोक्ष रूप में इस्तेमाल करती है, पर और भी अधिक पुख्ता तौर से। यह वह दो तरह से करती है - सीधे-सीधे अधिकारियों के भ्रष्टाचार द्वारा और सरकार तथा स्टाक एक्सचेंज की मिली भगत के द्वारा, जो सरकार के कर्ज बढ़ने के साथ-साथ और जैसे जैसे ज्वाइंट स्टाक कंपनियां न केवल परिवहन बल्कि उत्पादन भी अपने हाथों में केंद्रित कर लेती हैं और स्टाक ऐक्सचेंज में अपने केंद्र स्थापित कर लेती हैं, और अधिक आसानी से हासिल किया जा सकता है।
            और अंत में संपन्न वर्ग सीधे सार्विक मताधिकार द्वारा शासन करता है। जब तक कि शोषित वर्ग, हमारे मामले में सर्वहारा, अपनी स्वयं की आजादी के लिए परिपक्व नहीं हो जाता है उस समय तक उसका बहुमत मौजूदा निजाम को ही एकमात्र विकल्प समझता रहेगा और राजनैतिक रूप से पूंजीपति वर्ग का ही पिछलग्गू, उसका चरम वामपक्ष, बना रहेगा। पर अपनी स्वयं की आजादी के पथ पर जैसे-जैसे वह परिपक्व होता जाता है वैसे-वैसे वह अपने को राजनैतिक पार्टी के रूप में गठित करता जाता है और अपने स्वयं के प्रतिनिधियों को चुनता है न कि पूंजीपतियों के। इस प्रकार सार्विक मताधिकार सर्वहारा वर्ग की परिपक्वता का मापक है। और मौजूदा राज्य में न वह इससे अधिक कुछ हो सकता है और न कभी होगा, पर यही काफी है। जिस दिन सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर मजदूरों के चरम उबाल को दर्शायेगा उसी दिन पूंजीपतियों की भांति उन्हें भी समझ आ जायेगा कि वे संघर्ष में किस मुकाम पर आ पहुंचे हैं।
            कोई भी जो बुर्जुआ जनतंत्र तथा जनतांत्रिक प्रक्रिया के अपरिहार्य आंतरिक द्वंद्व - जिसके कारण संघर्ष निर्णायक दौर में अब पहले के मुकाबले और अधिक तीव्र व्यापक हिंसा के साथ पहुंचता है - को नहीं समझते हैं वे इस जनतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए व्यापक मजदूरवर्ग को ऐसे संघर्षों में विजयी अभियान के लिए वास्तव में तैयार करने के लिए सिद्धांत संगत प्रचार तथा आंदोलनों को चलाने में कभी भी सक्षम नहीं होंगे। सामाजिक-सुधारवादी उदारवादियों के साथ गठजोड़, समझौतों तथा गठबंधनों के अनुभवों ने मुकम्मल तौर पर दर्शाया है कि ऐसे समझौते जनता की चेतना को कुंद ही करते हैं, और कि वे जुझारुओं को ऐसे तत्वों, जो लड़ने में बिल्कुल नकारा हैं और सर्वाधिक ढुलमुल तथा दगाबाज हैं, के साथ मिलाकर संघर्ष के वास्तविक महत्व को बढ़ाते नहीं बल्कि कमजोर करते हैं। यह बिल्कुल साफ है कि उत्पादन प्रक्रिया अथवा सूचना तथा संचार प्रक्रिया के विज्ञान और तकनीकी में हुआ कोई भी विकास - मात्रात्मक अथवा गुणात्मक - अधिक से अधिक उस प्रक्रिया की उत्पादन क्षमता अथवा दक्षता को ही बढ़ा सकता है। वह समाज के मूल चरित्र, जो उत्पादक तथा अतिरिक्त मूल्य हड़पने वाले विभिन्न वर्गों की चेतना तथा उनके बीच के संबंधों से तय होता है, में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है। पूंजीवाद की प्रवृत्ति पूंजी का संचयन तथा प्रसार और मजदूर का सर्वहारीकरण करना है। कोई भी जो पूंजीवाद की अंतर्वस्तु में और इसीलिए समाजवाद की अंतर्वस्तु में, उत्तर-औद्योगिक, उत्तर-आधुनिक, उत्तर-एसटीआर, उत्तर-आईसीआर आदि के नाम पर या पूंजी के विभिन्न स्वरूपों जैसे कि वित्तीय पूंजी, आवारा पूंजी आदि के नाम पर, किसी भी प्रकार के परिवर्तन को ढूंढने की कोशिश करते हैं और बुर्जुआ-जनवाद से समाजवादी-जनवाद में शांतिपूर्ण संक्रमण के विचार को आगे बढ़ाते हैं वे अपनी निम्न-बुर्जुआ मानसिकता से अभिशप्त हैं।
            विकसित समाज में तथा अपनी परिस्थिति के कारण, निम्न-बुर्जुआ एक ओर तो समाजवादी होता है और दूसरी ओर अर्थशास्त्री अर्थात उच्च-मध्यवर्ग के वैभव से चुंधियाया होता है और आमजन की पीड़ा से द्रवित। वह एक ही समय पर बुर्जुआ भी होता है और आमजन भी। अन्य खुश मध्यमवर्ग से तथाकथित रूप से भिन्न सही संतुलन हासिल करने के लिए मन ही मन वह अपनी निरपेक्षता पर गर्व करता है। इस प्रकार का निम्न बुर्जुआ हर अंतर्विरोध को खारिज करता है क्योंकि अंतर्विरोध ही उसके अस्तित्व का आधार है। वह कार्यरत सामाजिक अंतर्विरोध के अलावा कुछ भी नहीं होता है। सिद्धांत की आड़ लेकर वह अपने व्यवहार को न्यायसंगत दर्शाता है।
            सामाजिक-आर्थिक संरचना के अपने स्वयं के अस्तित्व के लिए, पूंजीवादी चेतना को ध्वस्त करने के प्रयास में, उसकी वैचारिक सामाजिक चेतना में सिद्धांत की भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है। भौतिक शक्ति को भौतिक शक्ति के द्वारा ही उखाड़कर फेंका जा सकता है, लेकिन सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर स्वयं भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता। सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने में सक्षम तब होता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनकाब करता है, और वह पूर्वाग्रहों को तब बेनकाब करता है जब वह मूलाग्रही होता है। मूलाग्रही होने का मतलब है चीजों को उनके मूल के जरिए समझना। और सैद्धांतिक चिंतन एक प्रकृति प्रदत्त गुण केवल प्राकृतिक क्षमता के रूप में है। इस प्राकृतिक क्षमता को विकसित और परिष्कृत करना आवश्यक है, और इसके परिष्कार का कोई और रास्ता नहीं है सिवाय इसके कि पुराने दर्शनों का अध्ययन किया जाय।
सुरेश श्रीवास्तव
10 अगस्त, 2011
ए-50, सेक्टर 19, नोएडा – 201301
मोबाइल - 9810128813


Monday, 17 October 2016

उड़ी हमले से आगे?

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, 18 सितंबर को उड़ी में सैन्य शिविर पर हुए आतंकी हमले की जाँच करने पर भारतीय सेना इस निष्कर्ष पर पहुँची है कि चारों आतंकवादियों द्वारा 16-17 सितंबर की रात सीमा पार करने के लिए सलामाबाद नाले के समीप बाड़ में थोड़ी सी खाली जगह का इस्तेमाल किया गया था। सूत्रों के मुताबिक़ आतंकवादियों में से एक सलामाबाद नाले के पास बाड़ में से थोड़ी सी ख़ाली जगह का इस्तेमाल कर इस पार आ गया। उसने इस तरफ से बाड़ पर एक सीढ़ी लगा दी जबकि दूसरी तरफ से उसके तीन साथियों ने दूसरी सीढ़ी लगा दी।दोनों सीढ़ियाँ उपरगामी पैदलपारपथ की तरह जोड़ दी गई थीं।
  जिस थोड़ी सी जगह में से पहला आतंकवादी इस तरफ आया, उसमें से सभी चारों के लिए घुसपैठ करना मुश्किल था क्योंकि हरेक के पास भारी मात्रा में गोला-बारूद, हथियार और खाने पीने की चीज़ों वाले बड़े-बड़े बैग थे, और इस तरह पार करने में भारी जोखिम भी था क्योंकि उन्हें इस तरह बाड़ पार करने में काफी वक़्त लगता और ऐसा करते वक़्त इलाक़े में नियमित रूप से गश्त लगाने वाली सैन्य टुकड़ियाँ इन्हें देख सकती थीं।
 आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि जब चारों आतंकवादी भारत में घुस आये तब उन्होंने पहले आतंकवादी द्वारा लाई गई सीढ़ी अपने दो गाइडों मोहम्मद कबीर अवान और बशारत, जो उनके साथ नियंत्रण रेखा तक आये थे, को वापस सौंप दी ताकि किसी को कुछ पता न चले।
  सेना गोहलान और समीप के जबलाह गाँव में जाँच कर रही है क्योंकि उसे संदेह है कि आतंकवादियों ने हमला करने से एक दिन पहले इन्हीं गाँवों में शरण ली होगी।
  आतंकवादियों की ओर से सीढ़ी का इस्तेमाल कर बाड़ पार करने की घटना इसी साल पहले उत्तरी कश्मीर के माछिल सेक्टर में सामने आई थी।
  एक सवाल यह उठता है कि, अगर भारी चौकसी के बावजूद, आतंकवादी सरहद पार कर चौबीस घंटे से ज्यादा तक भारतीय सीमा में छुपे रहे तथा सैन्य शिविर की भारी सुरक्षा के बावजूद इतनी बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम देने में कामयाब हो गये, और भारतीय सेना को हमले की ख़बर भी नहीं हो पाई, तो क्या इस बात की संभावना से पूरी तरह इनकार किया जा सकता है कि सीमा पार से होनेवाली बहुत सी आतंकवादी गतिविधियों की ख़बर पाकिस्तानी सेना को भी न हो पाती हो?
  दूसरा सवाल यह उठता है कि, अगर सर्जिकल स्ट्राइक्स की सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री तथा उनके मंत्रियों और रक्षा सलाहकारों को दिया जा रहा है, तो क्या माछिल सेक्टर के बाद फिर उसी तरीके से उड़ी में होने वाली घुसपैठ को रोक पाने में सुरक्षा बलों की विफलता की ज़िम्मेवारी प्रधानमंत्री तथा उनके मंत्रियों तथा सुरक्षा सलाहकारों की नहीं बनती है?  
  एक निष्पक्ष सजग नागरिक के तौर पर मेरा प्रधानमंत्री से निवेदन है कि वे टीवी चैनलों के जरिए उन्माद फैलाने वालों को नजरंदाज कर, सभी मसलों पर शांतिपूर्ण समाधान के लिए, पाकिस्तान को बिना शर्त वार्ता के लिए आमंत्रित करें। वार्ता का मतलब यह नहीं है कि भारतीय सेना सर्जिकल स्ट्राइक का अपना विकल्प छोड़ दे। सभी मसलों में कश्मीर को शामिल किये जाने से भी परहेज़ नहीं होना चाहिए। वार्ता का मतलब यह नहीं होता है कि हम उनकी बात मान ही लें। सभी मसलों पर शांतिपूर्ण वार्ता का माहौल न केवल कश्मीरियों के हित में है बल्कि दोनों देशों की आम जनता के हित में भी है।
सुरेश श्रीवास्तव
17 अक्टूबर, 2016

Thursday, 29 September 2016

मूल्य – मानवीय श्रम का भौतिक स्वरूप से वैचारिक स्वरूप में रूपांतरण

मूल्य – मानवीय श्रम का भौतिक स्वरूप से वैचारिक स्वरूप में रूपांतरण
(सुरेश श्रीवास्तव)

            मानवीय मस्तिष्क की यह विशिष्ट क्षमता है कि वह न केवल इंद्रियों से बाह्य जगत के बारे में सूचना ग्रहण कर प्रतिबिंबों का निर्माण करता है बल्कि पहले से मौजूद सूचना के द्वारा भी प्रतिबिंबों का निर्माण कर सकता है और इसी क्षमता के कारण सपने भी देख सकता है और ऐसी चीजों की कल्पना भी कर सकता है जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। अन्य जीवों के पास यह क्षमता नहीं है इस कारण वे न सपने देख सकते हैं और न ही भविष्य की कल्पना कर सकते हैं। जो कुछ भी मनुष्य के मस्तिष्क के बाहर है वह भौतिक या स्थूल या मूर्त है और जो मस्तिष्क के अंदर की प्रक्रिया है वह वैचारिक या सूक्ष्म या अमूर्त कहलाता है।
भौतिक जीवन के निर्माण के दौरान, इंद्रियों के द्वारा भौतिक जगत के संज्ञान से, व्यक्तिगत तथा सामूहिक चेतना का विस्तार होता है। तर्कबुद्धि तथा कल्पना के आधार पर भविष्य के लिए भौतिक जीवन के निर्माण की रूप रेखा तैयार करना तथा उस रूपरेखा के आधार पर सजग चेतना के साथ अंगों द्वारा शारीरिक श्रम से भौतिक जीवन का निर्माण करना मानव का प्राकृतिक गुण है। विचार-व्यवहार के बीच का यह द्वंद्वात्मक संबंध मानवीय चेतना का विशिष्ट गुण है। इसी गुण के कारण मानव प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों को श्रम द्वारा उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित कर उनका उपभोग करता है।
प्राकृतिक रूप में उपलब्ध पदार्थों को उपभोग के लायक बनाने की पूरी प्रक्रिया में अलग-अलग उत्पादों में लगे हुए अलग-अलग कुशलता के श्रमउत्पाद की पूर्णता मेंकुशल श्रमिक के विशिष्ट-श्रम के रूप में नजर आते हैं पर असल में हर विशिष्ट-श्रम अनेकों छोटे-छोटे समरूप-श्रमों से मिल कर बनता है। समरूप-श्रम को मानव कीबिना किसी कुशलता के,मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित, अंगों द्वारा की जा सकने वाली निम्नतर स्तर की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है जिसकी क्षमता हर मानव को प्राकृतिक रूप से हासिल है। अलग-अलग चित्रकारों द्वारा बनाये गये सभी चित्र एक दूसरे से पूरी तरह अलग और विशिष्ट चित्र होते हैं पर हर चित्रकूँची के अनेकों छोटे-छोटे एक जैसे स्ट्रोकों का योग होता है। कुशल बढ़ई के औज़ार कीलकड़ी की हर छोटी-छोटी तराशएक दूसरे के समरूप होती है पर अनेकों तराशों के योग से बनी मेज़ या कुर्सीविशिष्ट-श्रम के रूप में एक दूसरे से पूरी तरह भिन्न होती हैं। मात्रात्मक से गुणात्मक परिवर्तन का द्वंद्व का नियम।
पूरी तरह से जंगली अवस्था में एक ही व्यक्ति उत्पादक तथा उपभोक्ता दोनों होता थापर जंगली से सभ्य मानव की ओर विकास यात्रा में धीरे-धीरे, बढ़ती उत्पादकता तथा श्रम विभाजन के कारण, उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के बीच वस्तुओं का आदान प्रदान होने लगा। जब वस्तुओं का आदान प्रदान केवल उपभोग की दृष्टि से किया जाता था तो एक ही समय पर एक चीज का उत्पादक किसी दूसरी चीज का उपभोक्ता भी होता था और चीजों का आदान प्रदान उपभोग के उद्देश्य से किया जाता था। दो वस्तुओं की अदला-बदली उपभोग के लिए किये जाने की स्थिति में दोनों वस्तुओं के मालिकों की रुचिहासिल की जाने वाली तथा दी जाने वाली वस्तुओं की उपयोगिता में होती थी और अदला-बदली में उनकी मात्रा का निर्धारण स्वत: ही आवश्यकता तथा उपयोगिता के आधार पर हो जाता था। आवश्यकता से अधिक वस्तु हासिल करने में कोई रुचि न होने के कारण अदला-बदली में दोनों वस्तुओं की मात्रात्मक तुलना के आंकलन का कोई औचित्य नहीं होता था और न ही विभिन्न उत्पादों  में किसी ऐसी समरूप चीज की ओर उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं का ध्यान जाता था जिसके आधार पर विभिन्न उपयोग की चीजों के आदान-प्रदान में उनकी मात्रा की तुलना की जाय। इसलिए विशिष्ट-श्रम और समरूप-श्रम का भेद अप्रकट रहता था।
पर समाज के विकास और विस्तार के साथ उत्पादों की संख्या भी बढ़ने लगी और उत्पादों का आदान प्रदान केवल उपभोग के लिए न होकर विनिमय के लिए भी होने लगा। हर व्यक्ति जहाँ उत्पादक के रूप में एक ही प्रकार की वस्तु का उत्पादक होता थावहीं उपभोक्ता के रूप में उसकी रुचि अलग-अलग वस्तुओं में होने लगी थी। इस कारण हर व्यक्ति के लिए जरूरी होने लगा कि उत्पादक के रूप में विनिमय में दी जाने वाली अपनी वस्तु की मात्रा काविनिमय में हासिल की जाने वाली विभिन्न वस्तुओं की मात्रा के साथ तुलनात्मक आंकलन करेऔर अनजाने ही वह अपने उत्पाद तथा हासिल किये जानेवाले उत्पाद के बीचमात्रात्मक तुलना, उनमें लगे श्रमकाल के आधार पर करने लगा। परंतु प्रत्यक्ष में दोनों उत्पादों में लगे श्रम की कुशलता भिन्न होने के कारण चिंतकों तथा अर्थशास्त्रियों को तार्किक तौर पर उनकी मात्रात्मक तुलना उनके श्रमकाल के आधार पर किया जाना असंगत नजर आता था। जहां अपनी भाववादी सोच और चेतना तथा अस्तित्व के द्वंद्वात्मक संबंध की समझ न होने के कारण चिंतक तथा अर्थशास्त्री यह नहीं समझ पाते हैं कि वास्तव में विशिष्ट-श्रम भी छोटे-छोटे समरूप-श्रम के परिणामों का समुच्चय ही होता हैवहीं उत्पादकों की अवचेतना में यह तथ्य,विनिमय में उनकी भूमिका के कारणस्वत: ही घर कर जाता है। अन्य चिंतक और अर्थशास्त्री अपनी निम्नमध्यवर्गीय मानसिकता के कारण जिस तिलस्म को समझ पाने में असमर्थ थेउस तिलस्म को मार्क्स ने, अपनी वैज्ञानिक मानसिकताऔर चेतना तथा अस्तित्व के बीच के द्वंद्वात्मक संबंध की सही समझ के आधार परबेनकाब कर उस मूलाधार को उजागर किया जिस पर सारी विनिमय आधारित बाज़ार व्यवस्था विकसित हुई, तथा टिकी हुई है।
विनिमय में हासिल की जानेवाली तथा दी जानेवाली चीजों के प्रति अपनी मनस्थिति के कारणहर व्यक्ति दोनों चीजों का मूल्याँकन अलग-अलग आधार पर करता है। बेचने के लिए उत्पन्न की गई चीजों में उत्पादक को अपने लिए कोई उपयोगी मूल्य नजर नहीं आता है सिवाय इसके कि अपने द्वारा पैदा की गई चीजों के बदले में वहख़रीदार के रूप में,अपने लिए उपयोगी अन्य उत्पादकों द्वारा पैदा की गई विभिन्न वस्तुएं हासिल कर सकता है। उसके लिए अपने कुशल विशिष्ट-श्रम तथा अकुशल समरूप-श्रम में कोई अंतर नहीं होता है। वह अपने द्वारा उत्पन्न किये गये उत्पाद की विनिमय-क्षमता या विनिमय-मूल्य को, न केवल अपने द्वारा लगाये गये अकुशल समरूप-श्रम काल के आधार पर करने लगता है, बल्कि उस औसत समरूप-श्रम काल के आधार पर जो उसके आस-पास के समाज में उसके जैसे अन्य श्रमिक उस जैसी चीजों को बनाने में आम तौर पर खर्च कर रहे होते हैं । अर्थात वह देने वाली या बेचने वाली वस्तु के सापेक्ष-मूल्य को देखता है।
इसके उलट हासिल किये जाने वाले उत्पाद की उपयोगिता में रुचि होने के कारण वह हासिल किये जाने वाले उत्पाद के विनिमय-मूल्य का आंकलन, उसमें दूसरे कुशल उत्पादक द्वारा वास्तव में लगाये गये श्रम-काल के आधार पर न करके, उसकी उपयोगिता के आधार पर करता है। हासिल किये जाने वाले उत्पाद के विनिमय-मूल्य का आंकलन वह उस औसत समरूप-श्रम काल के आधार पर करता है जो उसकी अपनी समझ के अनुसार उसे करना पड़ता, अगर हासिल किये जाने वाले उत्पाद को उसे स्वयं बनाना पड़ता तो। अपने आस-पास के समाज में अपने जीवन स्तर के अनुरूप, अपने लिए हासिल की जाने वाली सभी उपयोगी वस्तुओं के विनिमय-मूल्य का आंकलन वह अपने दिन भर के श्रम से तुलना के आधार पर करता है। उन सभी वस्तुओं, जिनके उपभोग के द्वारा वह अपने दिन भर काम करने की क्षमता हासिल करता है, के विनिमय-मूल्य को वह अपने दिन भर के श्रम के मूल्य के समतुल्य देखता है अर्थात दूसरी, हासिल की जानेवाली या खरीदी जानेवाली उपयोगी वस्तुओं में, उनके बनाने में लगे हुए वास्तविक समरूप-श्रम अर्थात सापेक्ष-मूल्य को न देखकर, वह उनके विशिष्ट-श्रम के समतुल्य-मूल्य को देखता है। 
जहाँ उत्पादक की रुचि वस्तु की उपयोगिता में न होकर उसकी विनिमय क्षमता में होती हैवहीं उपभोक्ता की रुचिवस्तु कीउपभोग के ज़रिए मांग संतुष्ट कर सकने की क्षमता में होती है जिसके कारण वस्तु में अंतर्निहित श्रम का दोहरा चरित्र प्रकट होने लगता है - मांग संतुष्ट कर सकने की क्षमता उत्पन्न करने में श्रम का विशिष्ट चरित्र, और साथ ही विनिमय क्षमता उत्पन्न करने में श्रम का समरूप चरित्र। इस तरह एक ओर उत्पादक के लिए उत्पादन का उद्देश्य उपभोग के लिए न होकर विनिमय के लिए होने लगा तो दूसरी ओर एक ही उत्पाद एक ही समय पर दो अलग-अलग व्यक्तियों की चेतना में अलग-अलग मूल्य प्रतिबिंबित करने लगा और उत्पादन में लगे हुए मानवीय श्रम का दोहरा चरित्र परोक्ष से प्रत्यक्ष मेंऔर निष्क्रिय से सक्रिय भूमिका में आ गया - मानवीय श्रम की दोहरा मूल्य पैदा करने की क्षमता, समरूप-श्रम के रूप में सापेक्ष-मूल्य और विशिष्ट श्रम के रूप में समतुल्य-मूल्य पैदा करने की क्षमता। दोहरे चरित्र के मूल्य को पैदा करने की मानवीय श्रम की यह क्षमता प्रकृति प्रदत्त है, पर यह दोहरा चरित्र उजागर होता है, उत्पन्न की गई उपयोगी चीज द्वारा विनिमय-उत्पाद का रूप धारण कर लेने पर, जहां उत्पादक तथा उपभोक्ता अपनी अलग अलग मानसिकता के कारण एक ही उत्पाद में अलग अलग मूल्य देखते हैं। संचित मानवीय श्रम का भौतिक या मूर्त रूप है, उपभोग योग्य वस्तु, और वैचारिक या अमूर्त रूप है मूल्य। मानवीय श्रम-शक्ति द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों में पैदा किया गया अमूर्त समरूप-श्रम, संचित होकर गुणात्मक रूप से भिन्न विशिष्ट-श्रम में परिवर्तित होता है तथा उपयोगी उत्पाद के रूप में मूर्त रूप धारण करता है, और उपभोग के द्वारा अपने उत्पादनकर्ता – श्रम-शक्ति – को पुनर्जीवित करता है। समरूप-श्रम अपने अमूर्त रूप से, विशिष्ट-श्रम के मूर्त रूप में रूपांतरित होकर, उत्पाद का स्वरूप पाता है। समरूप-श्रम उत्पाद के अंदर अप्रत्यक्ष रूप में अंतर्निहित रहता है। प्रतिदिन श्रम-शक्ति को पुनर्जीवित करने वाले उपभोग योग्य उत्पादों के लिए विनिमय की परिस्थितियां पैदा होने पर, उत्पाद में अंतर्निहित अमूर्त समरूप-श्रम, विनिमय-मूल्य के वैचारिक-सामाजिक स्वरूप में रूपांतरित हो जाता है। मानवीय श्रम का अमूर्त से मूर्त और फिर मूर्त से अमूर्त स्वरूप में रूपांतरण।           
हर उत्पादकउपभोक्ता भी होता है। अनेकों उत्पादक कघ आदि अपने-अपने उत्पादों चझ आदि के साथ विनिमय के लिए बाज़ार में मौजूद होते हैं। उत्पादक क को अपने उत्पाद की आवश्यकता नहीं है पर उत्पाद छ की आवश्यकता है और वह अपने उत्पाद के बदले उत्पाद छ हासिल करना चाहता हैलेकिन उत्पादक ख को उत्पाद च की आवश्यकता नहीं है पर उत्पाद ज की आवश्यकता है। अनेकों उत्पादों तथा उपभोक्ताओं की मौजूदगी से परिदृष्य पूरी तरह बदल जाता है। न तो उत्पादक के लिए अनेकों उपभोक्ताओं के साथ सीधा संपर्क रख पाना संभव रह जाता हैऔर न ही उपभोक्ता के लिए यह संभव हो पाता है कि वह अलग-अलग अत्पादों को अलग-अलग उत्पादकों से हासिल कर सके। ऐसे में बीच में आ जाता है गैर-उत्पादक बिचौलियों का एक समूह जो स्वयं उत्पादक नहीं होता है पर जो सकल उत्पादों का संग्रहकर्ता भी होता है और आपूर्तिकर्ता भी। हर उत्पादक बिचौलिये को अपना उत्पाद सौंपता है और बदले में अपनी ज़रूरत के अनुसार अलग अलग उत्पाद हासिल कर लेता है। और इस तरह वस्तुओं का आदान प्रदान बिचौलिये के ज़रिये विनिमय के रूप में किया जाने लगा। और विनिमय आधारित बाजार व्यवस्था में वस्तुओं की मात्रात्मक तुलना स्वत: ही, मूल्य के रूप में उनमें अंतर्निहित समरूप-श्रम के आधार पर होने लगी।
किसी उत्पाद का, उत्पादक के लिए, सापेक्ष-मूल्य उसमें अंतर्निहत वास्तविक समरूप-श्रम होता है, पर उसी उत्पाद का उपभोक्ता के लिए, समतुल्य-मूल्य उसमें अंतर्निहत वास्तविक समरूप-श्रम न होकर आभासी-श्रम होता है जो उपभोक्ता के आंकलन में, वस्तु के उत्पादन में तथा उस तक पहुंचाने में लगा होगा।    
समय के साथ उत्पादक की कुशलता तथा श्रम के औज़ारों में उन्नति के कारणश्रमशक्ति की उत्पादकता बढ़ती है तथा एक उत्पादक निश्चित समय में पहले के मुकाबले अधिक उत्पाद बनाने लगता हैअर्थात उत्पाद के हर नग में समरूप-श्रम का हिस्सा घट जाता है और उत्पादक के लिए उसके उत्पाद का बेचने में सापेक्ष-मूल्य पहले के मुकाबले घट जाता है। इससे अलग उपभोग के लिए आवश्यक उत्पादों की मात्रा वही रहने के कारण उपभोक्ता के लिए उनका समतुल्य-मूल्य या उनमें लगने वाला आभासी-श्रम वही रहता है। इस प्रकार बढ़ती उत्पादकता के साथ, किसी भी उत्पाद के सापेक्ष-मूल्य तथा समतुल्य मूल्य का अंतर बढ़ता जाता है। चूंकि उत्पादक तथा उपभोक्ता के बीच सीधा संपर्क नहीं रह जाता है और सभी उत्पादों का क्रय-विक्रय बिचौलिये के माध्यम से होने लगता है, इस कारण सापेक्ष-मूल्य तथा समतुल्य-मूल्य के अंतर को बिचौलिये की सेवा का मूल्य मान लिया जाता है, जब कि यथार्थ में इसके दो भाग होते हैं। एक भाग तो बिचौलिए की उस सेवा का मूल्य होता है जो कि उत्पाद की संरचना में अंतर्निहित नहीं होत है, बल्कि उसकी संरचना से अलग, उसे उपभोक्ता तक पहुंचाने में लगने वाली सेवा होती है। और दूसरा भाग होता है, मुनाफे के रूप में वह अतिरिक्त मूल्य जो उत्पाद के समतुल्य-मूल्य तथा सापेक्ष-मूल्य के बीच का अंतर होता है। वह अंतर, जो उत्पादक-बिचौलिया-उपभोक्ता की अपनी-अपनी चेतना के कारण, विनिमय संबंध के दौरान, उजागर होता है। समतुल्य-मूल्य तथा सापेक्ष-मूल्य के बीच का यह अंतर अर्थात अतिरिक्त मूल्य भी उत्पाद की भौतिक संरचना में अंतर्निहित नहीं होता है। यह अंतर एक सामाजिक परिस्थिति से उपजता है, और जो विकास के एक स्तर पर उत्पादन की विशिष्ट सामाजिक परिस्थितियों के कारण सामूहिक चेतना में उत्पन्न होता है। विशिष्ट सामाजिक परिस्थिति जिसमें किसी भी उत्पादक के लिए यह संभव नहीं रह जाता है कि जीवन के लिए आवश्यक सभी चीजों का उत्पादन वह अकेले  स्वयं पैदा कर सके। 
किसी वस्तु के बनाने में, किसी कामगार द्वारा निश्चित समय तक खर्च की गई श्रमशक्ति के द्वारा उत्पन्न किये गये कार्य या श्रम के दो पहलू होते हैं। विशिष्ट-श्रम के रूप में उत्पाद में पैदा किया गया गुण जो किसी मांग की पूर्ति करता है अर्थात उपयोगी-मूल्य, तथा समरूप-श्रम के रूप में पैदा किया गया विनिमय-मूल्य जिसके आधार पर विनिमय के दौरान उत्पाद की मात्रा की तुलना अन्य उत्पादों की मात्रा से की जाती है। श्रमकाल के आधार पर तुलना की जाये तो उत्पाद के उपयोगी-मूल्य के रूप में लगी हुई विशिष्ट श्रमकाल की तथा विनिमय-मूल्य के रूप में लगी समरूप श्रमकाल की मात्रा में कोई फर्क नहीं होता है। विनिमय रहित उत्पादन-वितरण व्यवस्था अर्थात लेन-देन आधारित सामाजिक व्यवस्था में न ही विनिमय-मूल्य की कोई भूमिका होती है और न ही वह कहीं उजागर होता है। विनिमय-मूल्य अपने दोनों स्वरूपों, सापेक्ष-मूल्य तथा समतुल्य-मूल्य के साथ सामाजिक विकास के एक विशिष्ट स्तर पर ही सामाजिक चेतना में उजागर होता है, और इसलिए मूल्य (मार्क्स ने विनिमय-मूल्य के लिए मूल्य शब्द का ही प्रयोग किया है क्योंकि विनिमय के बिना मूल्य जैसी चीज का कोई अर्थ नहीं है) तथा अतिरिक्त-मूल्य भी, एक वैचारिक सामाजिक उत्पाद है न कि भौतिक व्यक्तिगत उत्पाद।
जो वामपंथी, अतिरिक्त मूल्य को कामगार के व्यक्तिगत श्रम द्वारा अतिरिक्त समय तक श्रम कर के पैदा किया गया मूल्य दर्शाते हैं तथा उस आधार पर पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था को कामगार के व्यक्तिगत शोषण का आधार दर्शाते हैं, वे न तो मार्क्सवाद को समझते हैं और न ही कामगार का विश्वास हासिल कर पाते हैं। 
मूल्य का अपना कोई भौतिक स्वरूप नहीं हैवह एक वैचारिक वस्तु है पर विनिमय में उत्पाद के भौतिक हस्तांतरण के साथ उसके मूल्य के समतुल्य भौतिक पदार्थ का हस्तांतरण भी आवश्यक है। किसी उत्पाद  के विनिमय में खरीदनेवाले की रुचि तो उत्पाद  में होती है, पर संभावना है कि  को बेचने वाले उत्पादक की रुचि, उस समय  को खरीदनेवाले के पास मौजूद  किसी भी उत्पाद में न हो। विकसित होते समाज में बाजार के विस्तार के साथ ऐसी परिस्थितियां आम हो चली थीं, इसलिए आवश्यकता थी एक ऐसे उत्पाद की जिसकी थोड़ी सी मात्रा में अधिक समरूप-श्रम निहित हो, जिसको आसानी से टुकड़ों में बांटा जा सके तथा जो मूल्य के मापक के रूप में सर्वमान्य हो ताकि उसका उपयोग केवल विनिमय के दौरान उत्पाद के मूल्य के मापक के रूप में किया जा सके न कि उपभोग वस्तु के रूप में।
अपने बहुमूल्य गुणों के कारण सोने-चांदी ने मूल्य के मापक की भूमिका निभाना शुरू कर दिया। सोने-चाँदी की एक निश्चित मात्रा में अंतर्निहित मूल्य को ईकाई के रूप में मानकर विनिमय में सभी उत्पादों के मूल्य का निर्धारण, सोने-चांदी की अनुपातिक मात्रा के आधार पर किया जाने लगा। सोने-चांदी की एक निश्चित मात्रा द्वारा, सामाजिक चेतना में, मूल्य की इकाई के रूप में घर कर लेने के बाद उचित मात्राओं के छोटे बड़े सिक्के भी ढाले जाने लगे। अब यह व्यावहारिक रूप से संभव हो गया था कि जिस किसी के भी पास सोने-चांदी को सिक्के हों वह उनके बदले में उचित मात्रा में अपनी पसंद का उत्पाद बाजार से हासिल कर सकता था। इसके साथ ही समरूप-श्रम का, मूल्य के वैचारिक सामाजिक अमूर्त रूप से रूपांतरण भौतिक मूर्त रूप में हो गया। सिक्कों में सोने चांदी की एक निश्चित मात्रा, उनके अंदर अंतर्निहित समरूप-श्रम काल की एक निश्चित अवधि का पर्याय हो गई, और विनिमय में अलग अलग उत्पादों में लगे हुए समरूप-श्रमकाल को इन्हीं सिक्कों की संख्या के रूप में दर्शाया जाने लगा। व्यवहार में सिक्कों के घिसने, उनकी धातु की शुद्धता, अलग अलग खदानों से निकलने वाले सोने-चांदी के बनाने में लगनेवाले श्रमकाल में होने वाले बदलाव आदि के कारण होने वाली समस्याओं से निपटने के लिए राजसत्ता ने अपनी मुद्रा के साथ सिक्कों को ढालना शुरु कर दिया, जिनके प्रत्यक्ष रूप से दर्शित मूल्य का उनके अपने उत्पादन मूल्य से कोई संबंध नहीं था। सिक्कों के प्रदर्शित मूल्य के, सिक्कों के वास्तविक मूल्य से असंबद्ध होने के कारण शुरू में सिक्के लोगों को स्वीकार्य नहीं थे, पर राज्य द्वारा मुद्रित सिक्कों को इनकार करना गैरकानूनी घोषित कर देने के बाद, अपने वास्तविक मूल्य से पूरी तरह असंबद्ध राज्य द्वारा सत्यापित सिक्के, समय के साथ, सामाजिक चेतना में मूल्य का पर्याय बन गये। समयांतर में सिक्कों के साथ, राज्य द्वारा सत्यापित काग़ज़ी मुद्रा या करार-पत्र भी मूल्य के रूप में स्वीकार्य हो गये। हर उत्पाद की एक इकाई का मूल्य, मुद्रा की इकाई की संख्या के रूप में दर्शाया जाने लगा तथा मुद्रा में दर्शायी जानेवाली कीमत ही मूल्य का पर्याय बन गई। और इसके साथ ही समरूप-श्रम का, मूल्य के अमूर्त रूप में रूपांतरण पूरा हो गया। 

सुरेश श्रीवास्तव
30 सितंबर, 2016
(यह लेख, सोसायटी फॉर साइंस की, 2 अक्टूबर 2016 को होने वाली विमर्श-गोष्ठी के लिए आधार-विचार के रूप में लिखा गया है। विमर्श में भागीदारी के लिए आप आमंत्रित हैं।)

Monday, 5 September 2016

भारतीय वामपंथ - संशोधनवादी अंतर्वस्तु पर मार्क्सवादी अधिरचना

भारतीय वामपंथ - संशोधनवादी अंतर्वस्तु पर मार्क्सवादी अधिरचना
सोसायटी के व्हाट्सएप ग्रुप पर दुर्गेश कुमार ने, सुरेश श्रीवास्तव से एक प्रश्न पूछा था। प्रश्न आज के संदर्भ में अत्याधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए उस प्रश्नोत्तर को सब के साथ साझा करने के उद्देश्य से उसे सोसायटी के ब्लॉग तथा फेसबुक ग्रुप पर भी पोस्ट किया जा रहा है। जिन विद्यार्थियों को इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता है कि पश्चिम बंगाल में, वामपंथी मोर्चा 35 साल के शासन के बाद क्यों हार गया, उन्हें भी इसका उत्तर मिल जायेगा, जब वे इस बात पर ग़ौर करेंगे कि, 'ज़मीन जोतनेवाले की' के नारे के नाम पर भूमिहीन किसानों को ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों का स्वामित्व सौंप कर उनमें कौन सी चेतना के बीज बोये गये थे।
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दुर्गेश -
सर जी आपके ब्लॉग के कई लेखों में लेनिन की यह नसीहत को रेखांकित किया गया है | 👉🏼युवावर्ग के लिए आज भी सार्थक है लेनिन की नसीहत, ‘जो कोई भी संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों, जिनके चलते मतभेदों के समाधान पहले के मुकाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते हैं, को नहीं समझता है, वह व्यापक मजदूर-वर्ग को ऐसे फैसलों में विजयी अभियान के लिए तैयार करने के मकसद से संसदवाद के आधार पर कभी भी उसूल सम्मत प्रचार तथा आंदोलन नहीं चला सकता है।’ 👈🏼 ये पूरी बातें हमें बिल्कुल भी समझ नहीं आ रही हैं | जैसे कि बुर्जुआ प्रजातंत्र और संसदवाद के आंतरिक अंतर्विरोध क्या हैं, जिनके कारण समाधान उग्र तथा हिंसात्मक होते हैं❓यहाँ मजदूर वर्ग के किस फैसले के बारे में बात हो रही है❓और फिर अंत में संसदवाद के कौन से आधार की बात हो रही है, जिसके समझे बिना कोई भी उसूल सम्मत प्रचार और आंदोलन नहीं हो सकता है❓🙏🏼😔
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सुरेश -
राज्य भी एक सामाजिक व्यवस्था, एक वैचारिक संरचना है जो व्यापक समाज के अंदर ही विकसित हुई है न कि समाज के बाहर से लाकर समाज के ऊपर थोपी गई कोई व्यवस्था। वह समाज के आर्थिक विकास के एक निश्चित स्तर पर पैदा हुई जब उत्पादन-वितरण संबंधों के आधार पर, समाज वर्गों में विभाजित हो कर, परस्पर अनन्य (mutually exclusive) हितों के कारण, ऐसे अंतर्विरोधों में फँस गया जिनका समाधान कर पाना उस समय मौजूद व्यवस्था की सामर्थ्य के बाहर था। परस्पर हितों की टकराहट के कारण होने वाली हिंसा में ये वर्ग कहीं समाज को ही ध्वस्त न कर दे, इस कारण इस संघर्ष की तीव्रता को कम करने और उसे व्यवस्था की सीमा में बाँधकर रखने के लिए ही इस शक्ति - राजसत्ता - का जन्म हुआ। राज्य व्यापक समाज के अंदर ही पैदा होने के बावजूद, समय के साथ, वर्ग-विभाजित समाज में संघर्षरत वर्गों से अपने आप को अलग करते हुए वर्ग-विभाजित समाज के ऊपर एक स्वायत्त रूप धारण कर लेता है।
न्याय तथा दंड प्रणाली, सामूहिक सेवा प्रणाली और कर प्रणाली राज्य का मूर्त रूप दर्शाते हैं, जब कि वर्ग संघर्ष की तीव्रता को कम करने के लिए, राज्य द्वारा किये जानेवाले हस्तक्षेप का दिशा निर्देशन करनेवाली विचारधारा या वैचारिक चेतना, उसका अमूर्त रूप है। विचारधारा राज्य की अंतर्वस्तु है तो राज्य के द्वारा तय किये गये नियमों को पालन कराने के लिए, राज्य के अनेकों संगठन उसकी अधिरचना हैं।
शुरू में सकल उत्पाद मुख्यत: कृषि आधारित था, तथा कुशल-श्रम आधारित गैर-कृषि उत्पाद की संपूर्ण सकल उत्पाद में भागीदारी बहुत कम थी। उत्पादन के साधन के रूप में प्रकृति प्रदत्त भूमि ही प्रमुख स्रोत थी जिसके ऊपर नियंत्रण चंद निजी हाथों में ही होता था और इसीलिए सामंतवादी समाज में राज्य के लिए, ईश्वर द्वारा प्रतिपादित धर्म के रूप में विचारधारा के द्वारा तथा ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में राजशाही के द्वारा, अपनी सत्ता को वर्ग-विभाजित समाज के ऊपर लागू करना संभव था। पर जैसे जैसे उत्पादक शक्तियों का विकास होता गया, गैर-कृषि उत्पादों का कुल सकल उत्पाद में भाग भी बढ़ता गया, और इसके साथ ही मुद्रा, पूंजी तथा बिचौलियों या मध्यवर्ग का प्रभाव भी बढ़ता गया। वाणिज्यिक पूँजी के प्रभाव के कारण, भूमि भी सामूहिक स्वामित्व से निकल कर निजी स्वामित्व में आ गई। मध्यवर्ग द्वारा, वाणिज्यिक पूँजी के कृषि तथा गैर कृषि क्षेत्र में निवेश के कारण, विज्ञान, तकनीक तथा उत्पादक शक्तियों का विकास अभूतपूर्व गति से होने लगा।
प्राकृतिक शक्ति के नियंत्रण, तथा स्वचलित मशीनों के विकास के कारण औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आ गया जिससे संपत्ति के स्वरूप तथा स्वामित्व में भी अभूतपूर्व विविधता आ गई। पहले सीमित उत्पादन संबंधों के आधार पर समाज उत्पादक तथा गैर-उत्पादक वर्गों में विभाजित था। पर अब उत्पादों तथा संपत्ति के विविध स्वरूपों के स्वामित्व के कारण समाज पूरी तरह विखंडित हो गया है।
अठारहवीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद विकसित होने वाली पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में, बढ़ती उत्पादकता के साथ बढ़नेवाले अतिरिक्त मूल्य के आधिपत्य के लिए विभिन्न समूहों के बीच हितों की टकराहट भी तीव्र होती जाती है। बढ़ती टकराहट के बीच राज्य के लिए ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में राजशाही के द्वारा, अपनी सत्ता को वर्ग-विभाजित समाज के ऊपर लागू करना संभव नहीं रह गया था। इसलिए आवश्यक हो गया कि संघर्षों को सीमा के भीतर रखने के लिए, राज्य की सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में, राजशाही के स्थान पर आम लोगों के बीच से प्रतिनिधियों का ऐसा समूह विकसित हो जो सभी वर्गों के हितों की रक्षा करता नजर आए। और राजशाही की जगह अस्तित्व में आया जनवादी जनतंत्र।
एंगेल्स लिखते हैं, 'राज्य चूँकि वर्ग-विरोध पर अंकुश रखने के लिए पैदा हुआ था और साथ ही चूँकि वह इन वर्गों के संघर्ष के बीच पैदा हुआ था, इसलिए वह अनिवार्य रूप से सबसे अधिक शक्तिशाली, आर्थिक क्षेत्र में प्रभुत्वशील वर्ग का राज्य होता है।' वे आगे लिखते हैं, 'राज्य का सबसे ऊँचा रूप, यानि जनवादी जनतंत्र, जो समाज की आधुनिक परिस्थितियों में अनिवार्यत: आवश्यक बनता जा रहा है और जो राज्य का वह एकमात्र रूप है, जिसमें ही सर्वहारा वर्ग तथा पूँजीपति वर्ग का अंतिम और निर्णायक संघर्ष लड़ा जा सकता है - यह जनवादी जनतंत्र औपचारिक रूप से संपत्ति में अंतर का कोई ख़याल नहीं करता। उसमें धन-दौलत अप्रत्यक्ष रूप से, पर और भी ज्यादा कारगर ढंग से, अपना असर डालती है। एक तो, सीधे-सीधे राज्य के अधिकारियों के भ्रष्टाचार के रूप में, जिसका ठेठ उदाहरण अमेरिका है। दूसरे, सरकार तथा स्टॉक एक्सचेंज के बीच गठबंधन के रूप में। जितना ही राजकीय क़र्ज़ बढ़ता जाता है और जितनी ही अधिक ज्वाइंट स्टॉक कंपनियाँ स्टॉक एक्सचेंज को अपना केंद्र बनाती हुईं न केवल यातायात को, बल्कि उत्पादन को भी अपने हाथ में केंद्रित करती जाती हैं, उतनी ही अधिक आसानी से यह गठबंधन होता जाता है। ................. अंतिम बात यह है कि संपत्तिवान वर्ग सार्विक मताधिकार के द्वारा सीधे शासन करता है। जब तक कि उत्पीड़ित वर्ग - इस मामले में सर्वहारा वर्ग - इतना परिपक्व नहीं हो जाता है कि अपने को स्वतंत्र करने के योग्य हो जाये, तब तक उसका अधिकांश भाग वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को ही एकमात्र संभव व्यवस्था समझता रहेगा और इसलिए वह राजनीतिक रूप से पूँजीपति वर्ग का दुमछल्ला, उसका उग्र वामपक्ष बना रहेगा।' (मार्क्स दर्शन, वर्ष 1: अंक 4, जुलाई-सितम्बर 2011)
वयस्क मताधिकार के द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधियों के आधार पर गठित प्रतिनिधि सभा या संसद द्वारा नियंत्रित राजसत्ता ही, विभिन्न वर्गों के बीच होने वाले संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए, सर्वोत्तम राजनैतिक व्यवस्था हो सकती है क्योंकि प्रत्यक्ष तौर पर वह भेदभाव नहीं करती है और सर्वमान्य होती है। पर यथार्थ में सभी वर्गों के बीच सबसे अधिक शक्तिशाली वर्ग का ही राजसत्ता पर नियंत्रण होता है।
उत्पाद को पैदा करने में तीन चीजें लगती हैं। पहला है श्रम का लक्ष्य अर्थात वह चीज या चीजें जिनको विभिन्न प्रक्रियाओं के द्वारा उपयोगी उत्पाद में बदला जाता है। इसमें प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कच्चे माल से लेकर वे अर्धनिर्मित चीजें हैं जिनमें पहले से कोई श्रम लगाया जा चुका होता है। इनमें वे सभी पदार्थ भी शामिल होते हैं जो सीधे उत्पाद का हिस्सा नहीं बनते हैं पर अनुपातिक रूप में खर्च होते हैं और उनका मूल्य उत्पाद के मूल्य में जुड़ता है। दूसरा है श्रम के साधन जिनके द्वारा मानवीय श्रम, लक्ष्य को उत्पाद में बदलता है। इसमें सभी प्रकार की स्वचलित या हस्तचालित मशीनें, भूमि-भवन, औज़ार आदि होते हैं जिनके जरिए, मानवीय श्रम, लक्ष्य में अंतरित होकर उसे उत्पाद में परिवर्तित करता है। जहाँ लक्ष्य का मूल्य पूरी तरह सीधे-सीधे उत्पाद में जुड़ जाता है वहीं साधनों में घिसावट के कारण उनके मूल्य में होने वाली कमी ह्रास-मूल्य के रूप में, उत्पाद के मूल्य में जुड़ती है। तीसरा है कामगार की श्रमशक्ति जो पूरी उत्पादन प्रक्रिया का संचालन तथा नियंत्रण करती है। उत्पादन प्रक्रिया में खर्च की गई श्रमशक्ति, संचित श्रम के रूप में उत्पाद में जुड़ जाती है, और संचित श्रम ही है जो उत्पाद को उपभोग योग्य बनाता है। संचित श्रम ही मूल्य का माप है। पहली दो चीजों से नया मूल्य पैदा नहीं होता है। वह तो भूतकाल में किये गये श्रम का संचित जीवाश्म है जो संपत्ति के मूल्य के रूप में पहले से मौजूद होता है। उत्पादन प्रक्रिया के दौरान उसका पुराने उत्पाद से नये उत्पाद में केवल हस्तांतरण होता है। नये मूल्य का निर्माण तो उत्पादन के दौरान खर्च की गई जीवंत श्रमशक्ति से ही पैदा होता है। श्रमशक्ति का मूल्य भी उन उत्पादों के मूल्य से निर्धारित होता है जिनका उपभोग कामगार अपनी चुकी हुई श्रमशक्ति को पुनर्जीवित करने के लिए करता है।
संपत्ति संचित श्रम का निष्क्रिय रूप है, जबकि श्रमशक्ति संचित श्रम का जीवंत सक्रिय रूप है जो निष्क्रिय संचित श्रम  (संपत्ति) का उपभोग कर नये अतिरिक्त संचित श्रम (अतिरिक्त मूल्य) को जन्म देने में सक्षम है। पूँजी, संपत्ति के स्वामित्व की सामाजिक चेतना है जो श्रमशक्ति और संपत्ति के मिलन को प्रेरित करती है तथा उस मिलन से पैदा हुए नये अतिरिक्त संचित श्रम को हासिल कर अपनी संपत्ति का विस्तार करती है।
मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्य केवल मानवीय श्रमशक्ति के द्वारा ही पैदा किया जा सकता है। यह सामान्य ज्ञान की बात है कि सभी श्रमिकों द्वारा व्यक्तिगत तौर पर पैदा किये गये सारे उत्पादों के मूल्यों का कुल योग ही समाज में पैदा किये गये सकल उत्पाद का मूल्य होगा। पर मार्क्स ने समझाया था कि द्वंद्वात्मक भौतिकवाद के नियमों के अनुरूप, पूंजीवाद की विकसित अवस्था में, जब हजारों की संख्या में सर्वहारा श्रमिक, अपनी श्रमशक्ति को मजूरी के बदले, एकीकृत पूंजी के द्वारा नियंत्रित एक औद्योगिक संगठन को सौंपकर, विशालकाय स्वचलित मशीन के पुर्जों के रूप में उत्पादन प्रक्रिया में श्रम करते हैं, तो उनकी सामूहिक-श्रमशक्ति एक उन्नत महाकाय श्रमशक्ति का रूप धारण कर लेती है जो व्यक्तिगत श्रमशक्तियों से गुणात्मक रूप से भिन्न होती है। सामूहिक-श्रमशक्ति की उत्पादकता, व्यक्तिगत श्रम-शक्तियों की उत्पादकता के कुल साधारण योग से कई गुना अधिक हो जाती है। इस कारण सामूहिक श्रमशक्ति द्वारा पैदा किया गया मूल्य, उन्हीं श्रमिकों के व्यक्तिगत श्रम द्वारा पैदा किये गये मूल्य के साधारण जोड़ से कई गुना अधिक होता है। इसीलिए सामूहिक श्रमशक्ति अपने लागत मूल्य से कहीं अधिक मूल्य पैदा करती है। सामूहिक मानवीय श्रम शक्ति का यही प्राकृतिक गुण है जो पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है।
पूँजीवादी औद्योगिक उत्पादन प्रक्रिया में, उत्पाद की लागत मूल्य की गणना में तो, श्रमशक्ति के लिए चुकाया गया मूल्य ही, लागत मूल्य में जुड़ता है, पर अंतिम उत्पाद के विक्रय मूल्य की गणना में, सामूहिक श्रमशक्ति द्वारा पैदा किया गया मूल्य जुड़ता है। चूँकि व्यक्तिगत श्रमशक्ति की कीमत का भुगतान श्रमिक को पूँजी द्वारा किया जा चुका होता है इसलिए उत्पन्न किये गये अतिरिक्त मूल्य का श्रेय पूँजी को ही मिलता है।
पूँजीवाद के अंतर्गत बाज़ार व्यवस्था की, क्रय-विक्रय प्रक्रिया में, उत्पादों की क़ीमत के निर्धारण में व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का कोई महत्व नहीं रह जाता है, और हर चीज उसके अपने लागत मूल्य पर ही बिकती है, सर्वहारा की श्रमशक्ति भी। उपभोक्ता, अपने उत्पाद का उपयोगी मूल्य, उत्पाद का उपभोग करके ही वसूल कर पाता है। पूँजी, हर श्रमिक की श्रमशक्ति को, उसका लागत मूल्य चुका कर, निश्चित समय के लिए ख़रीद लेती है। उत्पाद के लागत मूल्य में, अन्य दो अवयवों की तरह ख़रीदी गई श्रमशक्ति की कीमत भी सीधे जुड़ जाती है। पर उत्पाद के विक्रय मूल्य में जुड़ता है वह मूल्य, जो पूँजी द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर ख़रीदी गयी श्रमशक्ति के सामूहिक उपभोग या खर्च करने से पैदा होता है। पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था में, कुशलता आधारित श्रम विभाजन समाप्त हो जाता है, इसलिए लागत मूल्य पर ख़रीदी गई श्रमशक्ति, पूरी तरह चुक जाने पर व्यक्तिगत स्तर पर केवल अपना लागत मूल्य ही पैदा करती है, कोई अतिरिक्त मूल्य पैदा नहीं करती है। सामूहिक श्रमशक्ति की उत्पादक शक्ति, व्यक्तिगत श्रमशक्तियों की उत्पादक शक्ति से गुणात्मक रूप से भिन्न उनके कुल योग से कई गुना अधिक होती है। इसीलिए सामूहिक श्रमशक्ति अपने लागत मूल्य से कहीं अधिक मूल्य पैदा करती है। सामूहिक मानवीय श्रम शक्ति का यही प्राकृतिक गुण है जो पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में अतिरिक्त मूल्य पैदा करता है।
अधिकांश लोग, अमूर्त चिंतन के आदी न होने के कारण, अस्तित्व तथा चेतना के द्वंद्वात्मक संबंध को, या व्यक्तिगत चेतना तथा सामूहिक चेतना के द्वंद्वात्मक संबंध को नहीं समझ पाते हैं। वे वैचारिक चीजों का संज्ञान, उनके मूर्त रूपांतरण के ऐंद्रिक ज्ञान बिना नहीं ले पाते हैं। वे मूल्य को उत्पाद के, या मुद्रा को करेंसी के, या पूँजी को पूँजीपति के संदर्भ से ही समझ पाते हैं। द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की समझ से अनभिज्ञ, वे समाज को व्यक्तियों के जमावड़े के रूप में ही देखते हैं, वे समाज को गुणात्मक रूप से भिन्न जैविक संरचना के रूप में नहीं देख पाते हैं। वे सामूहिक हित में अपने व्यक्तिगत हित को, सामूहिक संपत्ति या सेवाओं में अपने निजी स्वामित्व या निजी उपभोग के रूप में ही देख पाते हैं। हजारों साल पहले उपजा, संपत्ति के निजी स्वामित्व का विचार, सामाजिक चेतना में इतनी गहराई तक घर कर चुका है कि आम आदमी उसे मानव का नैसर्गिक गुण मानने लगा है। यहाँ तक कि अवचेतन स्तर पर हर व्यक्ति सामूहिक संपत्ति में भी औरों के भाग से अपने व्यक्तिगत भाग को अलग कर के देखता है और व्यक्तिगत हित साधने के लिए, सामूहिक हित को नुकसान पहुंचाने में भी कोई बुराई नहीं देखता है।  
वर्ग विभाजित समाज की अर्थ व्यवस्था में उत्पादन संबंध भी संपत्ति के निजी स्वामित्व से ही परिभाषित होते हैं। उत्पादन में लगने वाले तीनों अवयवों के निजी स्वामित्व से। सामंतवादी उत्पादन व्यवस्था में श्रम के औज़ार तथा श्रमशक्ति दोनों श्रमिक के स्वामित्व में होते हैं इस कारण पैदा किया गया उत्पाद और उसमें निहित लागत मूल्य तथा अतिरिक्त मूल्य का स्वामित्व भी श्रमिक के पास ही होता है, और इसीलिए अतिरिक्त मूल्य के बँटवारे की प्रक्रिया पूँजीवादी व्यवस्था से भिन्न होती है। विकसित पूँजीवादी उत्पादन व्यवस्था में, पूंजीपति के नियंत्रण में मुद्रा होती है जिसके बदले वह उत्पादन प्रक्रिया के दौरान तीनों अवयवों का स्वामित्व अपने हाथों में ले लेता है। श्रमशक्ति का स्वामित्व भी, उत्पादन प्रक्रिया के दौरान, पूँजीपति के पास ही होता है क्योंकि उसे वह सर्वहारा से मजूरी के बदले हासिल कर चुका होता है। इसलिए तीनों अवयवों का मूल्य उनके बाजार मूल्य पर चुकता कर देने के बाद पैदा किये गये उत्पाद का और उसमें निहित अतिरिक्त मूल्य का स्वामित्व पूँजीपति के पास ही होता है। समाज में सारा संघर्ष इसी अतिरिक्त मूल्य के बँटवारे को लेकर होता है। संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारणा, समाज की चेतना में पूरी तरह व्याप्त होने के कारण, इस बँटवारे के लिए नीतियां, व्यक्तिगत हितों के आधार पर तय की जाती हैं, जिन्हें निर्धारित करने का अधिकार राज्य के पास होता है। हर व्यक्ति इन नीतियों को अपने हितों के अनुरूप प्रभावित करने का प्रयास करता है। जो जितना शक्तिशाली होता है, वह उतना ही अधिक लाभ पाता है।
जनवादी जनतंत्र में राजसत्ता का नियंत्रण चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में होता है, इस कारण लोग अपने जैसे समान हित वाले लोगों के साथ संगठित हो कर, प्रतिनिधि सभा में ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधि भेजने का प्रयास करते हैं। राष्ट्र राज्य के अंतर्गत सकल घरेलू उत्पाद में भागीदारी के लिए समान हितों के आधार पर लोगों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक वे जिनकी श्रमशक्ति से अतिरिक्त मूल्य पैदा होता है, और दूसरे वे जो संपत्तियों के मालिक हैं। कामगार और बुर्जुआ। राजसत्ता के सभी अंग राज्य की विचारधारा से नियंत्रित होते हैं इस कारण विचारधारा के आधार राज्य के चरित्र को भी दो भागों में बाँटा जा सकता है। संपत्ति के निजी स्वामित्व के विचार पर आधारित बुर्जुआ-जनवाद, संपत्ति के सामूहिक स्वामित्व पर आधारित सर्वहारा-जनवाद। सर्वहारा जनवाद इसलिए क्योंकि सर्वहारा ही संपत्ति विहीन वर्ग होता है, अन्य कामगारों के पास श्रम के औजारों का तथा श्रमशक्ति का स्वामित्व होता है और वे अनजाने ही संपत्ति के निजी स्वामित्व की चेतना के वाहक बने रहते हैं। कहने को जनवाद के अंतर्गत राज्य बिना किसी आर्थिक भेदभाव के शासन करता है, पर वर्गों के बीच न सुलझ सकने वाले अंतर्विरोधों के कारण राज्य कमजोर वर्ग के विरोध को दबा कर ही शासन कर सकता है। इसलिए राज्य का चरित्र या तो बुर्जुआ तानाशाही होता है या सर्वहारा तानाशाही।
संसदवाद अर्थात संसदीय प्रणाली में राजसत्ता या सरकार, प्रतिनिधि सभा के आधीन और उसके प्रति उत्तरदायी होती है। प्रतिनिधिसभा के सदस्यों का चुनाव आम जनता द्वारा मतदान के आधार पर किया जाता है। प्रतिनिधि सभा का कार्यकाल निश्चित अवधि के लिए होता है और संविधान तथा क़ानून के आधार पर हर किसी को बिना भेदभाव के अपनी राजनैतिक पार्टी बनाने, जनता के बीच अपने विचारों का प्रचार करने तथा अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार होता है।
बुर्जुआ प्रजातंत्र तथा संसदवाद का आंतरिक अंतर्विरोध यह है कि एक ओर तो वह सबको, बिना किसी आर्थिक भेदभाव के, समान अवसर तथा अधिकार देने की बात करता है ताकि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच कोई कलह न हो, और ऐसी नीतियों को तय करने तथा लागू करने का दावा करता है जो सामूहिक श्रम द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का उपयोग सामूहिक हित तथा समावेशी विकास के लिए सुनिश्चित कर सकें, पर साथ ही वह संपत्ति के निजी स्वामित्व को भी सुनिश्चित करता है जो उसके, समान अधिकार की बात तथा सामूहिक हित तथा समावेशी विकास के दावे को असंभव बनाता है। जिसके पास जितनी अधिक निजी संपत्ति होती है वह आर्थिक रूप से, और इसीलिए राजनीतिक तथा सामाजिक रूप से भी, उतना ही अधिक शक्तिशाली होता है। और जो जितना अधिक शक्तिशाली होता है, वह सामूहिक श्रम द्वारा पैदा किए गये अतिरिक्त मूल्य तथा संपत्ति का उतना ही बड़ा हिस्सा हड़पने में कामयाब होता है। और इसीलिए संपत्तिवान तथा संपत्तिविहीन के बीच का अंतर भी निरंतर बढ़ता जाता है।
समय के साथ लोग समझने लगते हैं कि संसदीय व्यवस्था में, सरकार की नीतियों को अपने फायदे के लिए प्रभावित करने के लिए संख्याबल बहुत आवश्यक है इसलिए दूसरों के साथ एकजुटता आवश्यक हो जाती। चूँकि निजी संपत्ति का विचार अवचेतना में गहरे बैठा होता है इस कारण, आर्थिक आधार पर लोगों के बीच एकजुटता बहुत मुश्किल होती है, पर सामाजिक जीवन में समान हितों के अनेकों आधार हो सकते हैं, जैसे कि धर्म, संप्रदाय, नस्ल, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता आदि। इस कारण निम्न मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी, कामगारों को धर्म, संप्रदाय, नस्ल, जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्रीयता आदि के आधार पर एकजुट करने का प्रयास करते हैं। पर सामूहिक रूप से पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का व्यक्तिगत रूप से बँटवारे का कई भी फ़ॉर्मूला लोगों को संतुष्ट नहीं कर सकता है और संपत्ति के निजी स्वामित्व की अवधारणा से उपजे इस अंतर्विरोध का समाधान, बुर्जुआ जनवाद के पास नहीं है। विभिन्न संगठनों के बीच हितों की टकराहट को नियंत्रित करने के लिए राजसत्ता को हिंसा का सहारा लेना पड़ता है। प्रतिक्रिया स्वरूप जन संगठन भी हिंसा का सहारा लेने लगते हैं। हिंसा-प्रतिहंसा के इस अनवरत चक्र के चलते 'मतभेदों के समाधान पहले के मुकाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते जात हैं। लेनिन ने आगाह किया था, 'पहले जनता का जितना हिस्सा राजनैतिक घटनाओं में भाग लेता था उसके मुकाबले में जनता के कहीं व्यापक हिस्से को जागरूक तथा संगठित करने में सहायता कर, लोकतंत्रवाद संकट को दूर करने तथा राजनैतिक क्रांति के लिए नहीं बल्कि ऐसी क्रांतियों की दशा में गृहयुद्ध को अत्याधिक प्रचंड करने के लिए भूमि तैयार करता है।' (मार्क्स दर्शन, वर्ष 1: अंक 4, जुलाई-सितम्बर 2011)
सामूहिक रूप से पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य तथा संपत्ति के, निजी स्वामित्व की, अवधारणा से उपजे अंतर्विरोध का समाधान वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित वैज्ञानिक समाजवाद के पास ही है क्योंकि उसकी मूल अवधारणा है 'सामूहिक श्रम द्वारा पैदा किये गये, अतिरिक्त मूल्य तथा संपत्ति का, सामूहिक स्वामित्व'। संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण, अनेकों गैर-आर्थिक हितों के आधार पर, विभिन्न गुटों में बँटे लोगों के बीच, होनेवाले संघर्षों का समाधान कर, प्रतिनिधि सभा के अंदर अपनी भागीदारी बढ़ाने के लिए, रणनीतिक फ़ैसले करते समय, मजदूरवर्ग, निम्न मध्यवर्ग के दृष्टिकोण पर आधारित काल्पनिक समाजवाद  को अपनाये या वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित वैज्ञानिक समाजवाद को अपनाये, यह निर्भर करेगा मजदूरवर्ग की जागरूकता पर।
लेनिन ने समझाया था कि वैज्ञानिक समाजवाद, सर्वहारा चेतना में आर्थिक संघर्षों के दौरान स्वत: नहीं आता है। उसे तो बाहर से ही लाना होता है। सर्वहारा चेतना में काल्पनिक समाजवाद, बुद्धिजीवियों द्वारा बाहर से लाया गया था, और वैज्ञानिक समाजवाद भी आर्थिक संघर्ष के बाहर से ही लाना होगा। वामपंथी संशोधनवादियों की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा है, 'पूँजीवादी समाज में विज्ञान तथा तकनीकी की हर प्रगति अनिवार्य रूप से बिना किसी मुरव्वत के लघु-उत्पादन के आधार को खोखला करती है, और यह समाजवादी राजनीतिक अर्थशास्त्री का दायित्व है कि इस प्रक्रिया, अक्सर क्लिष्ट तथा पेचीदी, की उसके सभी रूपों में पड़ताल करे और लघु उत्पादक को दर्शाए कि पूँजीवाद के तहत उसका अपने बल पर बचे रहना असंभव है, पूँजीवादी व्यवस्था के तहत कृषक आधारित कृषि-उत्पादन का कोई भविष्य नहीं है और किसान के लिए सर्वहारा के दृष्टिकोण को अपनाना आवश्यक है। इस प्रश्न पर संशोधनवादियों ने अपराध किया है, वैज्ञानिकता के अर्थ में, एकपक्षीय तथ्यों को चुनकर और संपूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था के संदर्भ से काटकर सतही तौर पर सर्वव्यापी दिखाकर। राजनैतिक दृष्टिकोण से उन्होंने अपराध किया है इस तथ्य के आधार पर कि चाहे या अनचाहे उन्होंने किसानों को, क्रांतिकारी सर्वहारा के नजरिये की जगह छोटे मालिकों के नजरिये को (अर्थात बुर्जुआ नजरिये को) अपनाने का आग्रह कर। (मार्क्स दर्शन, वर्ष 1: अंक 4, जुलाई-सितम्बर 2011)
उम्मीद है आपको अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया होगा।
सुरेश श्रीवास्तव
5 सितंबर, 2016