Monday, 12 October 2015

भारतीय राष्ट्र-राज्य का चरित्र - एक मार्क्सवादी नजर से

भारतीय राष्ट्र-राज्य का चरित्र - एक मार्क्सवादी नजर से
(आज भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के सामने यक्ष प्रश्न है भारतीय राष्ट्र-राज्य के चरित्र की सही पहचान और उसके संदर्भ में विभिन्न राजनैतिक पार्टियों की विचारधारा का सही-सही विश्लेषण करना। हाल ही में अनेकों युवा साथियों ने मुझसे भारतीय राष्ट्र-राज्य के बारे में मेरे विचार जानने का आग्रह किया है। मैं संबंधित विषयों पर लेख लिखता रहा हूँ जो marx-darshan.blogspot.com पर भी पोस्ट किये गये हैं। युवा साथियों के आग्रह पर एक बार फिर अपने विचार इस विषय पर समेटने का प्रयास कर रहा हूँ। सुरेश श्रीवास्तव )

मार्क्सवाद समाज की पहचान एक जीवंत वैचारिक संरचना के रूप में करता है जो मानवीय चेतना में बसती है, जिसका अपना कोई स्वतंत्र भौतिक जैविक अस्तित्व नहीं होता है पर जो चेतना के रूप में पूरी तरह स्वायत्त है। मानव जीवन का आधार है प्रकृति प्रदत्त पदार्थ को व्यक्तिगत तथा सामूहिक श्रम द्वारा उपयोगी पदार्थ में बदलना। समाज के अस्तित्व का आधार है, मानवों का अपने हितों की पूर्ति के लिए एकजुट होना। मानवीय चेतना दो स्तर पर कार्य करती है - अनभिज्ञ तथा सजग। अस्तित्व तथा जीवन से संबंधित प्राकृतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रेरणा स्वत: होती है और उनसे संबंधित विचार अनभिज्ञ स्तर पर कार्य करते हैं, पर सामाजिक परिवेश से उपजी आवश्यकताएं सजग स्तर पर होती हैं और उनसे संबंधित विचार सजग स्तर पर कार्य करते हैं, इस कारण मार्क्सवाद समाज को 'सामाजिक-आर्थिक संरचना' के रूप में परिभाषित करता है जिसमें 'भौतिक-सामाजिक चेतना' अंतर्वस्तु है और 'वैचारिक-सामाजिक चेतना' अधिरचना है। किसी भी समाज की अनभिज्ञ 'भौतिक-सामाजिक चेतना' का आधार उत्पादन व्यवस्था, अर्थात उत्पादक शक्तियाँ तथा उत्पादन संबंध, होते हैं और उसी आधार पर उसका निर्माण होता है। इसी तरह अनभिज्ञ 'भौतिक-सामाजिक चेतना' के आधार पर सजग 'वैचारिक-सामाजिक चेतना' का निर्माण होता है। ज्ञान-विज्ञान के विकास के लिए किये जाने वाले सजग प्रयास इसी 'वैचारिक-सामाजिक चेतना' द्वारा किये जाते हैं। 'भौतिक-सामाजिक चेतना' अनजाने ही 'वैचारिक-सामाजिक चेतना' को प्रभावित करती है, और 'वैचारिक-सामाजिक चेतना' सजग कर्म द्वारा 'भौतिक-सामाजिक चेतना' को प्रभावित करती है। यही सामाजिक-चेतना की अंतर्वस्तु और उसकी अधिरचना के बीच का द्वंद्वात्मक संबंध है।
वर्ग विभाजित समाज में विभिन्न वर्गों द्वारा, अपने वर्ग हितों को साधने के लिए किये जाने वाले प्रयासों का ही हिस्सा होती है राजनीति। इसलिए वर्ग विभाजित समाज का सही विश्लेषण करने और उसमें वांछित हस्तक्षेप कर सकने के लिए आवश्यक है कि समाज की आर्थिक तथा राजनैतिक परिस्थिति का समुच्चित एकीकृत विश्लेषण किया जाय। आज सूचना और संचार के साधन इतने विकसित हो गये हैं कि विचारों के प्रचार प्रसार में भौगोलिक सीमाएँ बेमानी हो गयी हैं। उत्पादन तथा वाणिज्य में, वैचारिक उत्पादों की भागीदारी बढ़ गयी है। इन सभी चीजों को नज़रअंदाज़ करके किया गया विश्लेषण या हस्तक्षेप वांछित नतीजे नहीं दे सकता है।
भारत राजनैतिक रूप से एक राष्ट्र, एक राज्य है पर, आर्थिक तथा सामाजिक रूप से अनेकों राष्ट्रों का गठजोड़ है इस कारण भारतीय राष्ट्र-राज्य के चरित्र का विश्लेषण करते समय आर्थिक तथा सामाजिक व्यवस्थाओं की विविधता का ध्यान रखना आवश्यक है।
देश में कृषि उत्पादन के क्षेत्र में उत्पादक शक्तियां लगभग पूरी तरह सामंती या पारंपरिक है। पूंजीवादी व्यवस्था कृषि क्षेत्र में लगभग नदारद है। औद्योगिक उत्पादन में कुछ क्षेत्रों में उत्पादक शक्तियाँ विश्व स्तर की पूँजीवादी हैं पर एक बड़े क्षेत्र में अभी भी सामंती तथा मध्य स्तरीय हैं। आदिवासी आबादी भी अच्छी खासी है जहाँ अत्पादक शक्तियाँ आदिकालीन है। भारत में पूँजी का केंद्रीकरण भी विश्वस्तरीय है और व्यापार भी विश्व व्यापार का हिस्सा है। भारत में औद्योगिक कामगारों का एक बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में है और संगठित क्षेत्र का कामगार भी राजनैतिक रूप से जागरूक नहीं है। इस कारण संघर्ष शोषकों तथा शोषितों के बीच न होकर, शोषकों के बीच आपस में, मुख्य रूप से सामंतवाद और पूँजीवाद के बीच ही है। प्राकृतिक नियम के अनुसार उत्पादक शक्तियों का विकास सामंतवाद से पूंजीवाद की ओर होना आवश्यक है और भारतीय केंद्रित पूंजी, वैश्विक पूंजी की भागीदार बन चुकी है, इस कारण राजसत्ता का झुकाव वैश्वीकरण तथा पूँजीवाद की ओर ही होगा। अर्थव्यवस्था, पूँजीवाद के आधार पर, उत्पादक शक्तियों के विकास की ओर खिसकेगी, धीमे-धीमे जब विरोधी शक्तियाँ ताक़तवर होंगीं और तेज़ रफ़्तार से जब विरोधी शक्तियाँ कमज़ोर होंगीं।
राजनीति के क्षेत्र में समाज मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित है, सामंत, पूँजीपति, कामगार तथा मध्यवर्ग। कामगार भी किसान, सर्वहारा तथा असंगठित मज़दूर के बीच बँटे हैं। मध्यवर्ग अपने वर्ग चरित्र के अनुसार वर्ग संघर्ष में हमेशा कमज़ोर पक्ष के साथ खड़ा होता है और जब कमज़ोर पक्ष मज़बूत होने लगता है तब पाला बदल कर दूसरे पक्ष के साथ खड़ा हो जाता है। कभी-कभी, संतुलन की स्थिति में, मध्यवर्ग स्वतंत्र रूप से संघर्ष का निर्णायक वर्ग नजर आयेगा, पर असंतुलन की स्थिति आते ही कमज़ोर वर्ग के साथ खड़ा हो जायेगा। मज़दूर वर्ग का नेतृत्व हमेशा मध्यवर्ग से आये लोगों के हाथों में होता है और जब तक मजदूरवर्ग राजनैतिक रूप से जागरूक होकर अपने आपको संगठित करने की स्थिति में नहीं हो जाता है वह मध्यवर्ग का ही पिछलग्गू बना रहता है।
भारत के राजनैतिक पटल पर मुख्य लड़ाई सामंतवाद तथा पूँजीवाद के बीच है और मध्यवर्ग दोनों मुख्य पक्षों के बीच पाला बदलता रहता है। कामगार जब तक जागरूक नहीं हो जाता है, भ्रम की स्थिति में ही रहेगा। बिना किसी स्पष्ट विभाजन और संगठन के, किसान सामंतवर्ग के पीछे चलेगा, मज़दूरवर्ग पूँजीपति वर्ग के पीछे चलेगा और सर्वहारावर्ग मध्यवर्ग के पीछे चलेगा।
इस प्रकार भारतीय राष्ट्र-राज्य आर्थिक रूप से मिश्रित सामंतवादी निम्न पूँजीवादी है, सामाजिक रूप से सामंतवादी है और राजनैतिक रूप से बुर्जुआ जनवादी है।
150 साल पहले एंगेल्स ने समझाया था कि राज्य की उच्चतम अवस्था, जनवादी गणतंत्र राज्य का वह स्वरूप है अकेले जिसमें ही सर्वहारा तथा बुर्जुआजी के बीच अंतिम निर्णायक युद्ध लड़ा जा सकता है, जनवादी गणतंत्र आधिकारिक तौर पर संपत्ति के भेद को स्वीकार नहीं करता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के लगभग सभी राष्ट्र-राज्यों में जनवादी सत्तायें स्थापित हो चुकी हैं, विकसित या अविकसित सभी तरह की अर्थव्यवस्थाओं के बावजूद। गुरिल्ला युद्ध या जनयुद्ध आज के दौर में प्रासंगिक नहीं रह गये हैं। एंगेल्स ने समझाया था, " और अंत में संपन्न तबक़ा सीधे आम मताधिकार के ज़रिए शासन करता है। जब तक पीड़ित वर्ग - हमारे मामले में सर्वहारा वर्ग - जब तक अपनी स्वतंत्रता के लिए परिपक्व नहीं हो जाता है, उस समय तक बहुमत में मौजूदा निज़ाम को ही एकमात्र सामाजिक व्यवस्था मानता रहेगा और राजनैतिक तौर पर पूँजीवाद का दुमछल्ला बना रहेगा, उसका अतिवाम पक्ष बना रहेगा। पर जिस हद तक वह अपनी आज़ादी के लिए परिपक्व होता जाता है, उसी के अनुसार वह वह स्वयं को अपनी पार्टी के रूप में संगठित करता जाता है, और अपने प्रतिनिधियों को चुनता है, न कि पूँजीपतियों के प्रतिनिधियों को। इस प्रकार सार्विक मताधिकार मज़दूर वर्ग की परिपक्वता का पैमाना है। मौजूदा राज्य में वह इससे अधिक कुछ और नहीं हो सकता है और न कभी होगा; लेकिन यही काफ़ी है। उस दिन, जब सार्विक मताधिकार का थर्मामीटर मज़दूरों के बीच उबाल का स्तर दिखाएगा, वे और पूँजीपति भी जान जाएँगे कि वे कहाँ खड़े हैं।"
सन 1902 में अपने प्रसिद्ध पर्चे 'क्या किया जाय' में लेनिन ने रेखांकित किया था, 'जो हमारे आंदोलन की वास्तविक स्थिति से थोड़ा भी परिचित है, वह मार्क्सवाद के व्यापक विस्तार के साथ सैद्धांतिक स्तर में आई गिरावट देखे बिना नहीं रह सकता है। आंदोलन के व्यावहारिक महत्व तथा व्यावहारिक सफलता के कारण काफ़ी तादाद में लोग बहुत थोड़ी, यहाँ तक कि नदारद सैद्धांतिक ट्रेनिंग के साथ आंदोलन में शामिल हो गये हैं।' दुर्भाग्यवश, 95 साल पहले 1920 में ताशकंद में बैठकर, चंद मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों ने मार्क्सवाद की अपरिपक्व समझ के साथ, कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कर, भारतीय मज़दूर आंदोलन को जिस दलदल में धकेल दिया था उससे वह आज तक नहीं निकल पाया है।
इतिहास गवाह है, कि जब-जब जन आंदोलन निर्णायक दौर में पहुँचने को हुए हैं, भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने पैर पीछे खींचकर प्रतिक्रांतिकारी ताक़तों को शक्ति पहुँचायी है। अब तक कम्युनिस्ट पार्टियों का नेतृत्व अपनी गैर-मार्क्सवादी समझ के कारण मज़दूर वर्ग को इतना जागरूक नहीं कर पाया है कि वह राजनैतिक पटल पर अपने आप को विकल्प के रूप में पेश कर सके। नई पीढ़ी को चाहिए कि वह लेनिन की नसीहत, ‘जो कोई भी संसदवाद तथा बुर्जुआ प्रजातंत्र के अनिवार्य आंतरिक अंतर्विरोधों, जिनके चलते मतभेदों के समाधान पहले के मुकाबले कहीं अधिक व्यापक हिंसा के कारण और अधिक उग्र होते हैं, को नहीं समझता है, वह व्यापक मजदूर-वर्ग को ऐसे फैसलों में विजयी अभियान के लिए तैयार करने के मकसद से संसदवाद के आधार पर कभी भी उसूल सम्मत प्रचार तथा आंदोलन नहीं चला सकता है।’ को याद रखे और जहाँ भी जिस किसी भी पार्टी या मंच पर सक्रिय हो, मार्क्सवाद की सही समझ स्वयं हासिल करे तथा औरों को हासिल करने में मदद करे। परिपक्व होने पर मज़दूर वर्ग को स्वयं समझ आ जायेगा कि उसे क्या करना है।
नोएडा,
12 अक्टूबर 2015

Saturday, 10 October 2015

मानव और मानव-समाज का द्वंद्व

मानव और मानव-समाज का द्वंद्व
(पिछले कुछ सालों से नई पीढ़ी में नये विकल्प के तलाश की छटपटाहट साफ़ देखी जा सकती है। विकल्प की तलाश में पूँजीवाद, समाजवाद, शोषण, समावेशी विकास, अतिरिक्त मूल्य जैसे शब्द बहस के बीच में आते रहते हैं पर उन्हें न कोई समझना चाहता है और न समझाना चाहता है। इन मूलभूत कोटियों को समझे बिना, न तो समस्या के कारणों को समझा जा सकता है और न समस्या का निदान किया जा सकता है। कुछ युवा साथियों के आग्रह पर यह लेख इस उद्देश्य से लिखा जा रहा है कि शायद धुँध साफ़ करने में कुछ मदद मिले। पाठकों की आलोचनात्मक प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।)
'अंतर्वस्तु' (Content), किसी वस्तु का संपूर्ण अस्तित्व के रूप में गुण निर्धारित करती है, और 'अधिरचना' (Form) उस वस्तु को उसके परिवेश से अलग पहचान देती है। वस्तु का अपने परिवेश के साथ सूचना का आदान प्रदान अधिरचना के माध्यम से होता है, पर सूचना का उपयोग किस रूप में किया जायेगा इसका निर्धारण अंतर्वस्तु और अधिरचना अर्थात संपूर्ण वस्तु के हित के अनुसार अंतर्वस्तु के द्वारा किया जाता है। इसको इस प्रकार समझ सकते हैं कि अंतर्वस्तु और अधिरचना एक दूसरे को प्रभावित करते हैं अर्थात उनके बीच द्वंद्वात्मक संबंध होता है, और वस्तु और परिवेश एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, यह वस्तु का अपने परिवेश के साथ द्वंद्वात्मक संबंध होता है। यह प्रकृति की शाश्वत संबंध श्रंखला है अर्थात सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तर पर और विशालतम से विशालतम स्तर पर हम यही संबंध पाते हैं।
मानव की अंतर्वस्तु है उसकी 'चेतना' (consciousness) अर्थात जैविक प्रक्रिया तथा अधिरचना है उसका 'अस्तित्व' (Being) अर्थात शरीर। शरीर का अस्तित्व भौतिक है इसलिए उसे समझ पाना आसान है पर चेतना, मानव मस्तिष्क तथा शरीर के अंदर होने वाली सभी प्रक्रियाओं का समुच्चय है, उसे केवल प्रज्ञा या तर्कशक्ति द्वारा ही समझा जा सकता है और इसीलिए उसको समझना इतना आसान नहीं है, पर प्रयास करने पर इतना कठिन भी नहीं है। चेतना तथा अस्तित्व का द्वंद्वात्मक संबंध इस रूप में है कि चेतना शरीर के अंगों को प्रभावित तथा नियंत्रित करती है और अस्तित्व बाहरी प्रकृति के साथ व्यवहार के जरिए आवश्यक जीवनदायक पदार्थ हासिल कर मानव के जीवन को सुनिश्चित करता है। बाहरी प्रकृति के साथ किये जाने वाले काम के दौरान बाहरी प्रकृति शरीर के अंगों तथा इंद्रियों के द्वारा, चेतना तथा अस्तित्व दोनों को प्रभावित करती है। जीवन से मरण तक इसी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के साथ मनुष्य की विकास प्रक्रिया चलती रहती है।
मानव मस्तिष्क अन्य जानवरों से एक और आयाम में पूरी तरह भिन्न है जिसके कारण मानवीय मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रियाएँ अन्य जीवों में होने वाली अनैच्छिक मस्तिष्क प्रक्रिया से गुणात्मक रूप से भिन्न होती हैं। अन्य जानवर अपने वातावरण से जो पदार्थ और सूचना ग्रहण करते हैं उसको उसी रूप में इस्तेमाल कर पाते हैं जिस रूप में परिवेश उन्हें हासिल कराता है। पर मानव मस्तिष्क तर्कबुद्धि के आधार पर न केवल यह तय कर पाता है कि कौन सा पदार्थ या सूचना और किस रूप में,उन्हें हासिल करना है, बल्कि हासिल पदार्थ तथा सूचना को किस प्रकार इस्तेमाल करना है, यह भी तय कर पाता है। तर्कबुद्धि, हासिल सूचना के आधार पर न केवल एक बिल्कुल नई परिस्थिति की अमूर्त कल्पना कर सकती है, बल्कि शरीर की उत्पादन शक्ति के द्वारा उसके मूर्त रूप का निर्माण भी कर सकती है। भाषा, विज्ञान और उद्यम के द्वारा मानव ने सभ्यता के पिछले दस हज़ार सालों में इस पृथ्वी पर जो कुछ बदलाव किया है, उसकी न तो किसी और जीव द्वारा कल्पना की जा सकती थी और न ही किसी और जीव द्वारा उसे मूर्त रूप दिया जा सकता था। मानव और प्रकृति के बीच यही द्वंद्वात्मक संबंध है।
पर जिस क्षमता के आधार पर, मानव, सभ्यता के पिछले दस हज़ार साल में यह सब हासिल कर सका है, उस क्षमता को विकसित होने में पैंतीस लाख साल का लंबा समय लग गया था। मानव प्रजाति से संबंधित अल्पकालिक दस हज़ार साल में होने वाला विकास, चारों ओर आश्चर्य चकित कर देने वाली अनगिनत मानव निर्मित संरचनाओं के रूप में नजर आता है, पर पैंतीस लाख साल के लंबे अंतराल में ऐसा क्या कुछ हो रहा था जो नजर नहीं आता है। पैंतीस लाख के लंबे अंतराल में, भौतिक रूप से मानव की जैविक संरचना में वे बदलाव हो रहे थे जिन्होंने आगे जाकर, पृथ्वी पटल पर, मानव से एक पायदान ऊपर, एक नई जैविक संरचना के जन्म के लिए आधार प्रदान किया और जिस संरचना के बिना पिछले दस हज़ार साल में मानव प्रजाति द्वारा वह सब कुछ हासिल नहीं किया जा सकता था।
मानवीय संरचना में होने वाले इन बदलावों को हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं, अंगों तथा इंद्रियों से संबंधित और मस्तिष्क से संबंधित। अंगों तथा इंद्रियों की रचनाओं में होने वाले इन बदलावों के कारण मानव की अनेकों क्षमताएँ, अन्य जानवरों की क्षमताओं से गुणात्मक रूप से भिन्न हो गयी हैं। इन क्षमताओं में सीधा खड़ा होना, हाथ-पैर तथा उँगलियों की चपलता, सभी इंद्रियों की क्षमता का विस्तार, चेहरे की त्वचा तथा माँसपेशियों की तरह-तरह की भाव-भंगिमा दर्शाने की क्षमता, स्वर तंत्र की अनेकों प्रकार की स्प्ष्ट ध्वनियाँ उत्पन्न करने की क्षमता और हर तरह के शाकाहारी तथा मांसाहारी भोजनों को पचा सकने की क्षमता प्रमुख हैं।
स्नायविक कोशिकाओं की भिन्न रचना तथा मस्तिष्क के अंदर उनका विशिष्ट विन्यास, मनुष्य के मस्तिष्क के अंदर होने वाली प्रक्रियाओं को अन्य जीवों के मस्तिष्क के अंदर होने वाली प्रक्रियाओं से गुणात्मक रूप से भिन्न बनाता है। मानसिक प्रक्रिया, मूलत:, स्नायविक कोशिकाओं के बीच विद्युत संकेतों तथा रासायनिक अणुओं के आदान-प्रदान के रूप में होने वाला, सूचना का आदान-प्रदान है। अनेकों संकेतों के क्लिष्ट संयोजन से सूचना का निर्माण, तथा अनेकों सूचनाओं के संयोजन से विचारों का निर्माण होता है। अपनी विशिष्ट संरचना के कारण मानव मस्तिष्क, गुणात्मक रूप से भिन्न तीन अवयवों के संयोजन के साथ काम करता है और इस संयोजित प्रक्रिया, जिसे बुद्धि कहा जाता है, की क्षमता में निरंतर वृद्धि होती रहती है। अन्य जानवरों में तो तीनों अवयव या तो अलग-अलग मौजूद नहीं होते हैं या उनकी क्षमता अत्याधिक निम्न स्तर पर होती है।
बुद्धि के तीन अवयव सजग बुद्धि, अनभिज्ञ बुद्धि तथा तर्कबुद्धि स्वतंत्र रूप से भी काम करते हैं और साथ-साथ सामूहिक रूप से भी। चेतना के एक आयाम के रूप में बुद्धि अधिरचना है तो उसके तीनों अवयव अंतर्वस्तु हैं। मनुष्य की संपूर्ण वैचारिक प्रक्रिया में तर्कबुद्धि नियंत्रक का काम करती है, अनभिज्ञ बुद्धि भंडारण या पूर्वाग्रह या संस्कार का काम करती है और सजग बुद्धि नवनिर्माण या कल्पना का काम करती है। पर इनके बीच इतनी स्पष्ट विभाजन रेखा भी नहीं होती है और भूमिका में बदलाव होता रहता है। मनुष्य की बुद्धि और चेतना का यही द्वंद्वात्मक संबंध है।
पूरी तरह विकसित शारीरिक तथा मानसिक संरचना के कारण मनुष्य को जो सबसे महत्वपूर्ण क्षमता हासिल हुई है वह है एक मस्तिष्क में मौजूद विचारों को अंगों तथा इंद्रियों द्वारा सटीक सूचना में परिवर्तित कर लेना और सूचना को इंद्रियों के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुँचा कर विचारों में परिवर्तित कर लेना। इस क्षमता के कारण एक व्यक्ति न केवल अपने शरीर के अंगों पर नियंत्रण कर सकता है बल्कि दूसरे शरीर के अंगों पर भी नियंत्रण कर सकता है। इस क्षमता का उच्चतम स्तर है भाषा। हज़ारों साल के अंतराल में जब यह क्षमता विकसित हो रही थी, विचारों के आदान-प्रदान के आधार पर एक और नई संरचना जन्म ले रही थी - समाज।
समाज एक जैविक संरचना है जिसका स्वरूप पूरी तरह वैचारिक है, जिसका अपना कोई भौतिक आधार नहीं होता है और जो हज़ारों लाखों मस्तिष्कों की वैचारिक प्रक्रिया का ही इस्तेमाल करती है, उन हज़ारों लाखों लोगों के अनजाने। समाज की अपनी स्वायत्त चेतना होती है जिस पर उन व्यक्तियों का व्यक्तिगत रूप से कोई नियंत्रण नहीं होता है जिनकी व्यक्तिगत चेतना का इस्तेमाल समाज करता है। इस कारण सामाजिक चेतना को व्यक्तिगत दृष्टि से देखना अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। व्यक्ति और समाज के द्वंद्वात्मक संबंध को समझे बिना, समाजवाद, पूँजीवाद, मूल्य, मुद्रा, जैसी कोटियों, जो पूरी तरह वैचारिक सामाजिक उत्पाद हैं, को समझना असंभव है।
 
सुरेश श्रीवास्तव
10 अक्टूबर, 2015

Thursday, 24 September 2015

बाबा साहब किसके?

कल 20 सितंबर 2015, भाकपा द्वारा लखनऊ में सोशल मीडिया पर कार्यशाला तथा मथुरा में अंबेडकर समारोह और माकपा द्वारा दिल्ली में दलित संसद। शोषण के विरुद्ध संघर्ष के संदर्भ में, भारतीय वामपंथी एक लंबे अरसे से अंबेडकर और मार्क्स को एक ही खाँचे में फ़िट करने की कोशिश करते आ रहे हैं। वामपंथी इस कोशिश से होने वाले नुकसान का आंकलन क्यों नहीं कर पा रहे हैं, मेरी लिए समझ से परे है। मैं मार्क्स को वैज्ञानिक-समाजवाद का जनक मानता हूँ और अंबेडकर को काल्पनिक-समाजवाद का एक अध्येता, उस काल्पनिक-समाजवाद का जिसे मार्क्स और एंगेल्स ने निम्न-मध्य-वर्गीय बुद्धिजीवी की, कल्पना की उड़ान कहा था। उनकी कोशिश मुझे गोल छेद में चौकोर खूँटी ठोकने की कोशिश की तरह ही लगती है।
 बचपन में मेरे पिता जी ने एक कहानी सुनाई थी जो यहाँ प्रासंगिक है। एक किसान सारा साल मेहनत करता था और अपनी जरूरतों के लिए साहूकार से पैसे उधार लेता रहता था। फ़सल आने पर उसे बेचकर हासिल पैसे से साहूकार का क़र्ज़ चुकाता था और बचे पैसों से कुछ दिन तक अपनी ज़रूरतें पूरी कर पाता था, पर फिर महाजन से उधार लेने के लिए मजबूर हो जाता था। एक दिन उसने महाजन से पूछा, " मैं सारा साल मेहनत करता हूँ फिर भी मुझे पैसों की कमी रहती है और तुम कुछ भी नहीं करते हो फिर भी तुम्हें पैसे की कमी नहीं होती है, ऐसा क्यों?" साहूकार ने जवाब दिया, " मेरे पास पैसा है और पैसा पैसे को खींचता है।" कुछ दिन बाद किसान सुबह सुबह शहर पहुँचा और एक दुकान के सामने खड़ा हो गया। दुकान खुलने पर दुकानदार ने भगवान की पूजा की और अपना कैशबाक्स खोल कर उसकी भी पूजा करने लगा। किसान ने दूर से ही एक रुपये का सिक्का कैशबाक्स में उछाल दिया। दुकानदार ने किसान की तरफ़ देखा और चुपचाप अपना काम करने लगा। किसान सारा दिन वहीं खड़ा रहा। शाम को जब दुकान बंद करने का समय आया तो दुकानदार ने किसान से पूछा कि वह किस चीज का इंतज़ार कर रहा था। किसान ने कहा, " मैंने सुना था पैसा पैसे को खींचता है। मैं इंतज़ार कर रहा हूँ कि मेरा पैसा कब तुम्हारे पैसे को खींच कर लाता है।" दुकानदार ने जवाब दिया, " तुम्हें अभी भी समझ नहीं आया। मेरे पैसे ने तुम्हारे पैसे को पहले ही खींच लिया है अब तुम घर जाओ।"
 कहानी सुनाने के बाद पिता जी ने समझाया था कि अपनी फ़सल बोने के लिए अपनी ख़ुद की ज़मीन तैयार करना चाहिए। अगर दूसरे की ज़मीन में फ़सल बोने की कोशिश करोगे, तो फ़सल तैयार होने पर फ़सल काटने का अधिकार भी उसी का होगा जिसकी ज़मीन है। मार्क्स ने समझाया था कि शोषण का आधार है सामूहिक श्रम द्वारा पैदा किये गये अतिरिक्त मूल्य का व्यक्तिगत अधिकार में हस्तांतरण, और शोषण के विरुद्ध संघर्ष के लिए आवश्यक है कि मज़दूर वर्ग को समझाया जाय कि शोषण का आधार आर्थिक संबंधों में निहित है और उत्पादन प्रक्रियाओं के बदलने के साथ-साथ अतिरिक्त मूल्य के हस्तांतरण की प्रक्रिया भी किस प्रकार बदलती है। अगर वामपंथी, शोषण का आधार जाति प्रथा में ढूंड़ेंगे तो राजनैतिक फ़ायदा तो मायावती, रामविलास और माँझी ही उठायेंगे, और अगर सांप्रदायिकता में ढूँढेंगे तो फ़ायदा, कांग्रेस, मुलायम और लालू उठायेंगे।
 पर 20 सितंबर का वामपंथियों के लिए क्या महत्व है, यह मुझे समझ नहीं आया है। बुर्जुआ पार्टियों के लिए तो इसलिए महत्वपूर्ण है कि 1932, के इसी दिन गांधी जी ने आमरण अनशन की घोषणा कर, अंबेडकर को मना लिया था कि वे दलितों को सामूहिक सशक्तीकरण की ओर ले जाने वाली, अलग चुनाव क्षेत्र की मांग को छोड़कर, सम्मिलित चुनाव क्षेत्र के अंतर्गत सीटों के आरक्षण (पूना पैकेट) को मान लें। इसके जरिए शोषक वर्ग ने सुनिश्चित कर लिया था कि दलितों में से सक्षम व्यक्तियों को निजी हितों की पूर्ति के जरिए शोषण व्यवस्था का ही मोहरा बना दिया जाय। अंबेडकर को संविधान सभा में महत्वपूर्ण पद देना और आजाद भारत में स्वयं चुनाव न जीत सकने पर राज्यसभा में भेजना इसी रणनीति का हिस्सा था। शायद व्यक्तिगत रूप से अंबेडकर इसको न समझ पाये हों, पर क्या सामूहिक रूप से वामपंथी भी इसको नहीं समझ पा रहे हैं या यहाँ भी व्यक्तिवादी सोच ही हावी है।

सुरेश श्रीवास्तव
21 सितंबर, 2015

माँस खाने पर पाबंदी क्यों?

माँस खाने पर पाबंदी क्यों?
खाद्य-चक्र पृथ्वी पर जीवन का आधार है। कार्बन-डाई-आक्साइड, पानी तथा सूर्य की रोशनी से सरलतम एंज़ाइम तथा प्रोटीन का निर्माण करने की क्षमता केवल वनस्पतियों में ही है, विकास के निम्नतम स्तर पर जीवों को शारीरिक रचना तथा जीवन के लिए आवश्यक एंज़ाइम तथा प्रोटीन के लिए वनस्पति जगत पर निर्भर रहना पड़ता है, पर विकास के साथ नई प्रजातियों की, अपनी क्लिष्ट शारीरिक संरचना तथा मानसिक क्षमता के लिए आवश्यक एंज़ाइम तथा प्रोटीन की ज़रूरत पूरी करने के लिए परस्पर निर्भरता बढ़ती गयी।
अपनी विकास यात्रा में मानव ने समाज के गठन के साथ कृषि तथा पशुपालन के जरिए, वनस्पतियों तथा पालतू पशुओं की अनेकों नई प्रजातियों को विकसित किया है जो उसकी अनेकों विशिष्ट एंज़ाइम तथा प्रोटीन की आवश्यकताएँ पूरी करते हैं तथा जिनका विकास मानवीय हस्तक्षेप के बिना असंभव था।
हाल के 10 हज़ार साल का समय,  जिसमें मानव ने पशुपालन तथा कृषि का विकास किया, बंदर से मानव बनने की 35 लाख साल की विकास यात्रा की तुलना में एक क्षण मात्र है। मानव मस्तिष्क की विशिष्ट संरचना था चिंतन की प्रक्रिया, जिसने भाषा तथा समाज के गठन को संभव बनाया है, के लिए आवश्यक क्लिष्टतम एंज़ाइम तथा प्रोटीन की पूर्ति, पशुपालन तथा कृषि विकास से पहले, केवल तरह-तरह के माँस भक्षण से ही संभव थी।
जो प्रकृति के विकास के नियम को नहीं मानते, उनके लिए अपने पूर्वाग्रह, कि मानव हमेशा से ही शाकाहारी रहा है तथा मांसाहार मानव की प्रकृति नहीं है, से छुटकारा पा पाना असंभव है। माँसाहार पर किसी भी प्रकार की पाबंदी लगाने का कोई औचित्य नहीं है सिवाय पूर्वाग्रह के।
25 सितंबर, 2015

Thursday, 3 September 2015

आरक्षण : व्यक्तिगत न्याय की ओट में सामूहिक अन्याय

आरक्षण : व्यक्तिगत न्याय की ओट में सामूहिक अन्याय
(सुरेश श्रीवास्तव का यह लेख 'मार्क्स दर्शन' के अप्रैल-जून 2011 के अंक में छपा था और आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना तब था)

            व्यक्तियों से समाज बनता है या व्यक्ति समाज का अंग है। ये दोनों कथन समानार्थी प्रतीत होते हैं पर अर्थ का सूक्ष्म विश्लेषण करने पर अंतर समझना कठिन नहीं है। अंतर्निहित अति सूक्ष्म अंतर के कारण इन दोनों कथनों पर आधारित विचार विस्तरण पर परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों का निर्माण करते हैं।
            पहली धारणा में ध्यान व्यक्ति पर केंद्रित होने के कारण अंतर्सम्बंधों का और उनके अंतर्विरोधों तथा परिवर्तनों का सही आंकलन संभव नहीं है। किसी समाज के सभी व्यक्तियों की प्रवृत्ति और मानसिकता को एकसा मान लिया जाता है। व्यक्ति के विकास और परिवर्तन को समाज के विकास और परिवर्तन का पर्याय मान लिया जाता है। एक व्यक्ति की उपलब्धि को सारे समाज की उपलब्धि मान लिया जाता है। एक व्यक्ति की प्रगति को समाज की प्रगति मान लिया जाता है।
            दूसरी धारणा में ध्यान समाज पर केंद्रित होने के कारण अंतर्सम्बंधों और उनके अंतर्विरोधों तथा परिवर्तनों का सही आंकलन संभव हो सकता है। समाज का विकास समय काल पर निर्भर करता है न कि व्यक्ति विशेष पर। समकालीनों के संदर्भ में व्यक्ति विशिष्ट नजर आ सकते हैं पर समाज के संदर्भ में व्यक्ति विशेष की उपस्थिति या अनुपस्थिति गौण हो जाती है। सामाजिक विकास की दिशा और गति प्राकृतिक नियमों से निर्धारित होती है न कि विशिष्ट व्यक्तियों की इच्छा से।
            वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अभाव में, सामाजिक न्याय की व्याख्या, पहली धारणा के आधार पर करने के कारण व्यक्तिगत न्याय को सामाजिक न्याय का पर्याय मान लिया जाता है। निहित स्वार्थ के चलते कुछ व्यक्तियों के न्याय की चादर से सारे समाज के साथ किये जा रहे अन्याय को ढक दिया जाता है। भारतीय समाज में पिछड़ों को आरक्षण सामाजिक न्याय की अवधारणा के अनुकूल है या विपरीत है यह दृष्टिकोण भी इस पर निर्भर करेगा कि आरक्षण का विचार ऊपर दिए गए पहले कथन पर आधारित है या दूसरे पर।
            सदियों से भारतीय समाज कई छोटे-छोटे समाजों, जिनके अपने सदस्यों में, कुछ मानदंडों पर, समानता है पर दूसरे समाजों के साथ भिन्नता और टकराहट है, में बंटा नजर आता है परंतु यथार्थ में सारा भारतीय समाज और उसके छोटे-छोटे समाज मुख्यतः दो परस्पर विरोधी वर्गों में बंटे हैं। एक वर्ग वह है जिसका प्राकृतिक संसाधनों, सामाजिक परिसंपत्ति और उत्पादन के साधनों पर आधिपत्य, उस वर्ग के सदस्यों के व्यक्तिगत या सामूहिक स्वामित्व के रूप में, है और इस वर्ग के सदस्य अपने आर्थिक तथा सामाजिक हितों की पूर्ति के लिए इन्हीं साधनों का प्रयोग करते हैं। दूसरा वर्ग वह है जो अपने सदस्यों के व्यक्तिगत या सामूहिक श्रम द्वारा साधनों का उपयोग कर प्राकृतिक संसाधनों को उपयोगी उत्पाद में परिवर्तित करता। जाहिर है उत्पाद पर स्वामित्व पहले वर्ग का ही होता है। दूसरे वर्ग को उत्पाद के अंदर निहित उसके श्रम के तुल्य मुआवजा मिला है या नहीं यह आंकलन इस बात पर निर्भर करेगा कि आंकलन का दृष्टिकोण ऊपर लिखे दोनों कथनों में किस पर आधारित है।
            सामाजिक परिसंपत्ति में सदियों में हुई वृद्धि दर्शाती है कि सामूहिक रूप से समाज ने खर्च से अधिक उत्पादन किया है। तकनीक के विकास के साथ उत्पादकता बढ़ती है जिसके फलस्वरुप वेतन और लाभ में वृद्धि अवश्यंभावी है। ऊपरी तौर पर श्रमिक को उसके श्रम का उचित मुआवजा दिया जाता है पर वास्तव में मुआवजा उसके मूल्य से कम होता है। उत्पाद में श्रम के मूल्य और श्रम के मुआवजे का अंतर (अतिरिक्त श्रम), बचत के रूप में सदियों से संचित होता रहा है। चूंकि संसाधनों पर स्वामित्व वाले वर्ग का ही उत्पाद पर अधिकार होता है इस कारण संचित बचत पर भी उसी का स्वामित्व होता है। यही कारण है कि तकनीक के विकास के साथ उत्पादकता और सामूहिक संपत्ति बढ़ने के बावजूद संपन्न और विपन्न वर्गों के बीच की खाई बढ़ती जाती है। अगर भिन्न वर्गों के वेतनभोगियों के वेतन और उद्यमियों के लाभ का विश्लेषण किया जाए तो यह बात साफ-साफ देखी जा सकती है कि जहां उत्पाद के मूल्य में उत्पादक श्रम के योगदान के मुकाबले उत्पादक श्रम का मुआवजा या वेतन कम होता है वहीं गैर-उत्पादक श्रम का मुआवजा अधिक होता है जबकि सामाजिक न्याय का तकाजा है कि श्रम का मुआवजा उत्पादन में मूल्य के अनुपात में होना चाहिए।
            समाज और अर्थव्यवस्था में आर्थिकोपार्जन करने वाले विभिन्न व्यक्तियों को उत्पादन में योगदान के आधार पर मुख्य रूप से तीन वर्गों में बांटा जा सकता है। एक वे जिनका श्रम सीधे-सीधे उत्पादन में काम आता है या उससे सीधे-सीधे जुड़ा होता है। दूसरे वे जिनके पास संसाधनों का प्रत्यक्ष या परोक्ष स्वामित्व होता है। तीसरे वे जो विभिन्न प्रकार की सेवाएं प्रदान करते हैं। सेवाएं भी उनकी प्रकृति के आधार पर दो भागों में बांटी जा सकती हैं, पहली वे जो उत्पादन, उसके संसाधनों के विकास और उसके वितरण को सुगम बनाती हैं तथा दूसरी वे जो संसाधनों के स्वामित्व की देख-रेख करती हैं और उसे मान्यता प्रदान करती हैं।
            तकनीक के विकास के साथ अनुपातिक वृद्धि के क्रम में सबसे नीचे उत्पादन से जुड़े श्रम का वेतन, फिर उससे जुड़ी सेवाओं का वेतन, उससे ऊपर स्वामित्व से जुड़ी सेवाएं और सबसे ऊपर स्वामित्व से अर्जित लाभ। जहां सबसे नीचे के क्रम पर वार्षिक वृद्धि दर बमुश्किल दस प्रतिशत होती है वहीं सबसे ऊंचे क्रम पर वृद्धि दर दसियों प्रतिशत से लेकर कई सौ प्रतिशत तक है। सामूहिक साधनों और सुविधाओं का उपभोग भी इसी क्रम में है।
            शुरू में हर व्यक्ति उत्पादक श्रम करता था और उत्पादन उत्पादकों के उपभोग के लिए किया जाता था। परंतु तकनीक के विकास के साथ श्रम की उत्पादकता बढ़ी और उसके साथ उपभोग से अधिक उत्पादन भी। यहीं से समाज का दो वर्गों में विभाजन शुरू हुआ। एक वर्ग जो उत्पादन में जुटा था दूसरा जो अतिरिक्त उत्पादन पर आधिपत्य हासिल करने में व्यस्त था। अतिरिक्त उत्पादन पर आधिपत्य के साथ दूसरे वर्ग की ताकत बढ़ती गई और जहां शुरू में आधिपत्य हासिल करने और उसकी रखवाली करने में उसे श्रम करना पड़ता था वहीं ताकत बढ़ने के साथ उसने पहले वर्ग के कुछ लोगों का श्रम अपना आधिपत्य हासिल करने और उसकी रखवाली करने के लिए खरीदना शुरू कर दिया। शुरू में जहां दूसरा वर्ग पहले वर्ग पर अपनी पकड़ बनाने के लिए शारीरिक बल का प्रयोग करता था वहीं अब तकनीक के विकास और संसाधनों पर अपने आधिपत्य के कारण वैचारिक और मानसिक स्तर पर पकड़ बनाना संभव हो गया। धर्म और जाति आधारित विचारधाराओं के प्रादुर्भाव से यह पकड़ व्यक्तिगत स्तर से उठकर सामाजिक और सामूहिक स्तर पर पहुंच गई। वर्चस्व शारीरिक स्तर पर कम और मानसिक स्तर पर अधिक होने के कारण दूसरे वर्ग का संसाधनों पर आधिपत्य और पहले वर्ग पर पकड़ अधिक कारगर और मान्य हो गई।
            संसाधन सदियों से संचित अतिरिक्त श्रम है और नैतिक तौर पर सारे समाज का उस पर अधिकार है। संसाधनों पर जब तक एक वर्ग विशेष का आधिपत्य है तब तक सामाजिक न्याय की बात बेमानी है। सामाजिक न्याय तभी संभव है जब संसाधनों का स्वामित्व सामूहिक रूप से समाज के पास होगा न कि एक वर्ग विशेष के पास और उत्पादन सामाजिक उपयोग और उपभोग के लिए होगा न कि चंद विशिष्ट व्यक्तियों की हवस और तृष्णा पूर्ति के लिए। जाहिर है विशिष्ट वर्ग को यह स्थिति किसी भी हाल में स्वीकार नहीं है जबकि सामाजिक न्याय और आम जन के लिए यही अनिवार्य है। इस कारण दोनों वर्गों के बीच टकराव और सामाजिक न्याय की दिशा में समाज को ले जाने के लिए आम जन का संघर्ष अपरिहार्य है। कोई भी कदम जो इस संघर्ष को आगे ले जाता है या तीव्र करता है, स्वागत योग्य है।
            सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है कि दलित और पिछड़े वर्ग के सदस्यों की क्षमता इस प्रकार विकसित की जाए कि वे एक बड़ी संख्या में, न कि सीमित संख्या में, उच्च जातियों के सदस्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हुए समाज के विकास में योगदान दे सकें। जाहिर है कम उम्र से क्षमताएं विकसित करने की आवश्यकता है न कि स्पर्धा का मानदंड नीचा करने की। चूंकि बच्चों की क्षमताएं विकसित होने में दस से बीस वर्ष लगते हैं, अंतरिम दौर में जब कि एक पूरी पीढ़ी विकसित हो रही है, आरक्षण का प्रावधान, यह सुनिश्चित करते हुए कि सामाजिक न्याय की प्रक्रिया किसी भी प्रकार से क्षीण न हो, किया जा सकता है।
            आरक्षण की अवधारणा है कि जो सदियों के सामाजिक शोषण और वर्जना के कारण दलित और पिछड़े हुए हैं उनके पिछड़ेपन की उचित क्षतिपूर्ति की जाए इस कारण आरक्षण का उद्देश्य उचित स्पर्धा के लिए, वंचना के कारण उपजी, अक्षमता को निरस्त करने की कोशिश करना है। इस संदर्भ में एक व्यक्ति, जिसके कम-से-कम एक अभिभावक को आरक्षण का लाभ लेते हुए एक दशक से अधिक हो गया है, उस व्यक्ति, जिसके किसी भी अभिभावक को आरक्षण का लाभ नहीं मिला है, की तुलना में दलित या पिछड़ा नहीं माना जा सकता है। अगर मलाईदार तबके को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जाता है तो सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
            किसी भी वर्ग में व्यक्तियों की व्यक्तिगत, शारीरिक और मानसिक क्षमता बराबर नहीं होती है। संघर्षरत वर्ग में कुछ व्यक्ति संघर्ष को दिशा देने और उसकी धार तेज करने में और सदस्यों की तुलना में अधिक सक्षम होते हैं। ऐसे व्यक्ति जहां शोषित वर्ग के लिए मूल्यवान होते हैं वहीं शोषक वर्ग के लिए राह के रोड़े होते हैं। शुरू में विद्रोह की आवाज दबाने के लिए शारीरिक बल का खुला प्रयोग किया जाता था पर कालांतर में विद्रोहियों को बीन कर संघर्ष की धार कुंद करने में प्रलोभन ज्यादा आसान और कारगर होने लगे।
            वर्तमान में सरकारी नौकरियों में और उच्च शिक्षा तथा तकनीकी शिक्षा संस्थानों में दलित और पिछड़ों के लिए आरक्षण की मांग इस धारणा पर आधारित है कि सदियों से दबी कुचली जाति के लोगों से सीमित अवसरों को हासिल करने के लिए ऊंची जाति के लोगों के साथ बराबरी से प्रतियोगिता की मांग करना न्यायोचित नहीं है और उनको मुख्य धारा में लाने के लिए और उनकी क्षमता बढ़ाने के लिए, उनकी ऐतिहासिक और सामाजिक कमजोरी को देखते हुए, यह आवश्यक है कि उनके लिए कुछ स्थान आरक्षित कर दिए जाएं ताकि उनको गैर-बराबर प्रतियोगिता का सामना न करना पड़े। अवसर मिल जाने पर समय के साथ वे क्षमताएं हासिल कर लेंगे और इस प्रकार यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक कारगर कदम होगा।
            इस धारणा में मूलभूत गलती यह है कि दलित और पिछड़ी जाति के कुछ लोगों को पूरे वर्ग का पर्याय मान लिया गया है, उन्हें प्राप्त अवसरों का सारे वर्ग को प्राप्त अवसरों से घालमेल कर दिया गया है। उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार को सारे दलित और पिछड़े वर्ग की क्षमता और सामाजिक स्थिति में सुधार का पर्याय मान लिया गया है।
            दूसरी गलती -मात्रात्मक परिवर्तन ही गुणात्मक परिवर्तन में बदल जाते हैं- के सिद्धांत को लागू करने में है। छोटे-छोटे परिवर्तन मिलकर क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हैं, थोड़े-थोड़े लोगों की स्थिति में सुधार लाकर अंततः सारे समाज में सुधार लाया जा सकता है, कदम-ब-कदम चल कर मंजिल पर पहुंचा जा सकता है। मात्रात्मक परिवर्तन से गुणात्मक परिवर्तन का सिद्धांत तब लागू होता है जब मात्रात्मक परिवर्तन जुड़ते जाते हैं और कदम-ब-कदम चल कर मंजिल पर तब पहुंचा जा सकता है जब अगला कदम पिछले कदम से आगे ले जाए। अगर पिछला मात्रात्मक परिवर्तन अगले मात्रात्मक परिवर्तन का विरोधी हो जाए तो मात्रात्मक परिवर्तन कभी भी गुणात्मक परिवर्तन में परिवर्तित नहीं हो सकता है। एक कदम आगे और दो कदम पीछे चलकर कभी भी मंजिल पर नहीं पहुंचा जा सकता है।
            जिन लोगों को आरक्षण का लाभ मिल जाता है वे यह भूलकर, कि उनके दलित और पिछड़े होने का एकमात्र कारण संसाधनों और परिसंपत्तियों का सामूहिक स्वामित्व न होकर व्यक्तिगत स्वामित्व होना है, स्वयं व्यक्तिगत स्वामित्व के न केवल पैरोकार हो जाते हैं बल्कि स्वयं भी उस होड़ में शामिल हो जाते हैं। अपनी सुधरी स्थिति का लाभ उठाकर गैरबराबरी की प्रतियोगिता में अपने ही वर्ग के अन्य पिछड़ों को उनके अवसरों से वंचित कर देते हैं। इस कारण वर्तमान आरक्षण प्रक्रिया सामाजिक न्याय के संघर्ष में मारीचिका के सिवाय कुछ भी नहीं है।
            दलित और पिछड़े वर्ग के दस क्षमतावान व्यक्तियों, जो सामाजिक न्याय को समझ और उसके लिए संघर्ष कर सकते हैं, में से एक को आरक्षण का लाभ दे कर सामाजिक न्याय की दुहाई दी जाती है और उस दिशा में इसे एक कदम बताया जाता है। पर यह एक आरक्षण बाकी नौ के लिए प्रलोभन का काम करता है। वे एक झूठी आशा के साथ, कि शायद कभी उन्हें भी आरक्षण का लाभ मिल जाए, आरक्षण की मारीचिका के पीछे दौड़ते रह जाते हैं। अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण वे समझ नहीं पाते कि जहां एक को आरक्षण का लाभ मिलना तय है वहीं नौ को न मिलना भी तय है। समय के साथ उनके दिलों में जल रही विद्रोह की ज्वाला शांत हो जाती है। यह एक आरक्षण न केवल सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष की धार कुंद कर देता है बल्कि संघर्ष को दस कदम पीछे धकेल देता है।
'जाहिर है मलाईदार तबके के पार्थक्य बिना आरक्षण सामाजिक न्याय के लिए घातक है।'

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Wednesday, 2 September 2015

(प्रसिद्ध टीवी एंकर रवीश कुमार के नाम खुला पत्र)

(प्रसिद्ध टीवी एंकर रवीश कुमार के नाम खुला पत्र)
प्रिय रवीश जी,
19 अगस्त 2015 को मैंने निम्नलिखित टिप्पणी की थी,
"रवीश जी, आप एंकर हैं। आप और आपके साथियों अभिज्ञान, निधी, नग़मा आदि की एंकर की भूमिका से मैं एक हद तक संतुष्ट हूँ। आप लोग आगंतुक वक्ताओं को घेरने और उन्हें बहस को विषय से भटकाने के प्रयास में सफल न होने देने में काफ़ी हद तक कामयाब रहते हैं। पर बहस के निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ही आप अपनी पकड़ छोड़ देते हैं। आप लोगों की मजबूरी समझ सकता हूँ। आप आगंतुक वक्ताओं को पूरी तरह ध्वस्त हो जाने देंगे तो फिर वे आपके मंच पर आएँगे क्यों और फिर आपकी टीआरपी का क्या होगा। पर आप थोड़ा और सजग प्रयास करें तो आप वक़्ता को असहज किये बिना सैद्धांतिक धुंध को साफ़ करने में और अधिक योगदान दे सकते हैं।"
मैं जानता हूँ कि आपको मेरी टिप्पणी देखने का अवसर भी नहीं मिला होगा क्योंकि आपके दोस्तों की संख्या हज़ारों में पहुँच चुकी है और चाहनेवालों की संख्या लाखों में। आपको टिप्पणियां पढ़ने की ज़रूरत भी नहीं है। आपके लिए लाइक तथा कमेंट्स की संख्या में विस्तार होते रहना ही काफी हैं क्योंकि लोकप्रियता का वही पैमाना है। आपको पता है अधिकांश में आपके व्यक्तित्व और टीवी प्रोग्राम की आकर्षकता के बारे में ही टिप्पणी की गयी होगी और किसी भी निम्न-मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी के लिए इस प्रकार की लोकप्रियता पा लेना अत्याधिक संतोषजनक होना चाहिए। पर जैसा मैंने अपनी पिछली टिप्पणी में रेखांकित किया था, मैं आपको सूचना प्रसारक से उपर चिंतक के रूप में भी देखता हूँ जो स्वयं की उपलब्धि, अपनी लोकप्रियता में न देखकर, नई पीढ़ी को सामाजिक परिवर्तन के लिए रास्ता तलाशने के प्रयासों में मार्ग दर्शन कर सकने की अपनी परिस्थिति और क्षमता के उपयोग में देखता है। पर पिछले दिनों फ़ेसबुक पर आपकी पोस्ट देखकर निराशा हुई है। सामूहिक समस्याओं के मूल को समझने में मदद देने वाले बौद्धिक चिंतन की जगह, व्यक्तिगत आलोचनाओं पर आप ज़्यादा तवज्जों देते नजर आ रहे हैं। शायद अपने प्रशंसकों के क्रश के दबाव से आप मुक्त नहीं हो पा रहे हैं।
कोई अपनी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को अधिक महत्व दे या समाजिक सरोकारों को, इसका चुनाव तो उस व्यक्ति को ही करना होता है पर मार्क्सवादी होने के नाते मेरा मानना है कि व्यक्तिगत हित और सामाजिक हित एक दूसरे के पूरक हैं और उनके द्वंद्वात्मक संबंध को ठीक से तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक द्वंद्वात्मक भौतिकवाद को पूरी तरह आत्मसात न कर लिया जाय। मुझे नहीं पता कि आप मार्क्सवाद से किस हद तक सहमत हैं, पर आपकी टिप्पणियों से एक बात साफ़ है कि मार्क्सवाद के बारे में आपका ज्ञान भी अधिकांश मार्क्सवादियों की तरह सतही है। मार्क्स ने समझाया था कि 'सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने पर भौतिक शक्ति में परिवर्तित हो जाता है। सिद्धांत जनता के मन में घर कर लेने में सक्षम तब होता है जब वह पूर्वाग्रहों को बेनक़ाब करता है और पूर्वाग्रहों को बेनक़ाब वह तब करता जब वह मूलाग्रही होता है। मूलाग्रही होने का मतलब है चीजों को उनके मूल से समझना।' पिछले 90 साल से भारत में वामपंथी आंदोलन का जो हाल है उसका एक ही कारण है कि अधिकांश को मूल्य तथा मुद्रा का, या पूंजीवादी उत्पादन-प्रक्रिया तथा पूँजीवादी उत्पादन-व्यवस्था का, या काल्पनिक-समाजवाद तथा वैज्ञानिक-समाजवाद का अंतर ही नहीं पता है। एंगेल्स ने समझाया था, ' अमूर्त चिंतन एक प्रकृति प्रदत्त गुण, केवल प्राकृतिक क्षमता के रूप में ही है। इस प्राकृतिक क्षमता को विकसित और परिष्कृत करना आवश्यक है, और इसके परिष्कार का और कोई रास्ता नहीं सिवाय इसके कि पुराने दर्शनों का अध्ययन किया जाय।' और इन मूल श्रेणियों से संबंधित विषयों पर सार्वजनिक विमर्श करने पर कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने सदस्यों के ऊपर कर्फ़्यू लगा रखा है। शायद, सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए, उन्हें लोक लुभावन नारे तथा तात्कालिक आंदोलन ज़्यादा कारगर नजर आते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि कारगर आंदोलन चलाने के लिए उनके सदस्यों की, वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधारित विश्लेषण की क्षमता विकसित होना आवश्यक है, ये ख़तरा अवश्य है कि ये बात अंधानुकरण की प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ जाती है। पर आपके लिए तो ऐसा कोई ख़तरा नहीं है। सैद्धांतिक विषयों को सार्वजनिक विमर्श के दायरे में लाना आपके व्यावसायिक हितों के ख़िलाफ़ भी नहीं जाता है।
मार्क्स ने पी. अन्नानिकोव को लिखे अपने पत्र में लिखा था, “……निम्न मध्यवर्गीय आनेवाली सभी सामाजिक क्रांतियों का अभिन्न अंग होगा।” तथा “एक विकसित समाज में और अपनी परिस्थिति के कारण, निम्न-मध्यवर्गीय एक ओर तो समाजवादी बन जाता है और दूसरी ओर एक अर्थवादी, अर्थात वह उच्च वर्ग के ऐश्वर्य से चुंधियाया होता है और विपन्नों की विपन्नता से द्रवित भी।” आप युवा वर्ग में लोकप्रिय भी हैं और अपने सामाजिक दायित्व के प्रति सजग भी हैं। आप ज़िंदगी के उस मुक़ाम पर पहुँच चुके हैं जहाँ आप अपनी व्यक्तिगत उपलब्धियों से संतुष्ट महसूस कर अपने प्रयासों को या तो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की अगली सीढ़ी ओर मोड़ सकते हैं या सामाजिक दायित्व निर्वहन की ओर। यह, ऐतिहासिक भूमिका निभाने के लिए वक़्त के द्वारा आपको दिया गया मौक़ा है, चुनाव आपको करना है।
शुभकामनाओं सहित
सुरेश श्रीवास्तव
3 सितंबर, 2015

Friday, 7 August 2015

अयोध्या विवाद - एक समाधान यह भी

अयोध्या विवाद - एक समाधान यह भी
(यह लेख उद्भावना के नवंबर 2010 के अंक में छपा था)

            पूंजीवादी जनतंत्रों (शोषक वर्ग की तानाशाही) में अदालतें राज्य व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण अंग होती हैं क्योंकि वर्ग संघर्ष की तीव्रता कुंठित करने हेतु वर्ग निरपेक्षता के आडंबर के लिए न्यायिक प्रणाली सबसे कारगर मुखौटा साबित हुआ है। किसी भी राजनैतिक, आर्थिक या सामाजिक समस्या (एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष के अधिकारों का अतिक्रमण) के निराकरण के लिए उच्च तथा उच्चतम न्यायालय अंतिम व्यवस्था के रूप में सर्वमान्य हैं क्योंकि वे आमतौर पर निरपेक्ष न्याय प्रदान करते हैं। साधारणतया विवाद पूंजीवादी जनतंत्र के मूल आधार के लिए संकट पैदा नहीं कर रहे होते हैं इस कारण न्यायालयों के लिए निरपेक्ष होकर न्याय प्रदान करने में कोई समस्या नहीं होती है। पर अगर किसी विवाद का न्यायपूर्ण हल पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था के मूल आधार के लिए खतरा पैदा कर सकता है तो न्यायालयों के लिए निरपेक्ष रहना असंभव हो जाता है क्योंकि ऐसा न्याय आत्मघाती होगा।
            दुर्भाग्य से अयोध्या एक ऐसा मसला है जिसमें निरपेक्ष न्याय भारतीय पूंजीवादी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए घातक होगा। इसे पूरी तरह समझने के लिए यह समझना जरूरी है कि अयोध्या विवाद क्या है, कब शुरु हुआ तथा कौन से तथ्य सर्वमान्य हैं, कौन से विवादग्रस्त हैं और इस विवाद में सही-सही पक्ष कौन से हैं, न केवल अदालत के समक्ष बल्कि अदालत के बाहर भी और निरपेक्ष न्याय किस रूप में व्यवस्था के मूल आधार के लिए घातक है।
            समस्या का एक आयाम ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है इस कारण समस्या का विश्लेषण करते समय दो बातों को ध्यान में रखना होगा। एक तो यह कि समाज का जीवन तथा विकास निरंतर तार्किक प्रक्रिया है और दूसरा सामाजिक परिवर्तन प्रक्रिया में अनेकों संभावनाएं निहित होती हैं और तथ्य तथा संभावना में भेद न कर पाना गलत होता है। इस कारण अगर किन्हीं तथ्यों पर आधारित किसी ऐतिहासिक अवधारणा में निरंतरता खंडित या तार्किकता असंबद्ध नजर आती है तो ऐसे तथ्यों तथा ऐसी अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन तथा पुनव्र्याख्या आवश्यक हो जाते हैं।
            समस्या का एक आयाम हिंदू तथा मुसलमानों की धार्मिक आस्था से भी संबंधित है इस कारण यह भी ध्यान रखना होगा कि व्यापक हिंदू और मुसलमान समाज अपने आप में, न केवल विभिन्न देवी-देवताओं, पैगम्बरों तथा धार्मिक नेताओं में आस्था के कारण अनेकों संप्रदायों में बंटे हैं बल्कि राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक निजी स्वार्थों के कारण भी अनेकों समुदायों तथा समूहों में बंटे हैं। इस कारण कुछ-एक व्यक्तियों या समूहों का दावा कि वे अपने-अपने व्यापक समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं सिद्धांततः गलत है तथा समस्या का विश्लेषण करते समय उनके सुझाव और मांगें दावे के रूप में अमान्य होने चाहिए।
            अयोध्या-समस्या का आधार है वह भूमि है जिस पर लगभग साढ़े चार सौ साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था और जिसके, कुछ हिंदू संगठन, भगवान राम के जन्म स्थान होने का दावा करते हैं, खड़ी थी और जिसे, उस समय की केंद्रीय तथा राज्य सरकारों के उच्चतम न्यायालय को दिये गये आश्वासनों के बावजूद, गैर-कानूनी तथा अलोकतांत्रिक तरीके से 6 दिसम्बर 1992 को जमींदोज कर दिया गया।
            आमतौर पर समस्या अधिकारों के अतिक्रमण को लेकर होती है और यहां भी समस्या भूमि के स्वामित्व को लेकर ही है। जहां कुछ हिंदू संगठनों का दावा है कि भगवान राम उसी जगह पैदा हुए थे, उस स्थान पर प्राचीन काल से मंदिर बना हुआ था तथा शाहंशाह बाबर के शासन में मंदिर गिरा कर उस जगह मस्जिद का निर्माण किया गया था वहीं मुसलमान संगठनों का दावा है कि बाबर के शासनकाल में मस्जिद का निर्माण खाली जगह पर किया गया था न कि किसी धार्मिक स्थल को गिराकर।
            ऐतिहासिक इमारत का निर्माण 1528 में बाबर के शासनकाल में हुआ था इस बारे में सभी पुरातत्त्ववेत्ता तथा इतिहासकार एकमत हैं। लगभग साढ़े तीन सौ साल 1528 से 1885 के बीच कोई भी साक्ष्य या दस्तावेज नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि इमारत तथा भूमि को लेकर हिंदू तथा मुसलमानों के बीच कोई मतभेद था या और किसी रूप में धार्मिक आसहिष्णुता थी। बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू मुसलमान एक साथ मिलकर लड़े थे तथा उत्तर मध्य भारत में बहादुरशाह जफर को भारत का सम्राट भी स्वीकार किया गया था।
            विवाद को कानूनी दायरे में 29 जनवरी 1885 में पहली बार लाया गया जब महंत रघुबर दास द्वारा अदालत के सामने रामजन्मस्थान के लिए दावा पेश किया गया। सब-जज पंडित हरिकिशन ने मूल दावे में तथा जिलाधीश चामियर ने अपील में हिंदू पक्षकार को राहत देने से इनकार कर दिया पर आश्चर्यजनक रूप से दोनों ने अपने अपने आदेशों में टिप्पणी शामिल कर दी कि हिंदुओं के पूजास्थल को गिराकर उस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था बावजूद इसके कि दावे में ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश नहीं किया गया था जो हिंदुओं के पूजास्थल को गिराकर उस स्थान पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किये जाने के दावे को तथ्य के रूप में दर्शाता। पर इस एक टिप्पणी से मजबूत हिंदू-मुसलमान एकता में ऐसा पच्चर ठोंक दिया गया जिसने आने वाले दिनों में हिंदू-मुसलमान एकता को ध्वस्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत की आजादी की लड़ाई के तीव्र होने के साथ-साथ हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता ने इतना कटु रूप धारण किया कि लाखों लोगों की कुर्बानियों के साथ-साथ देश के बंटवारे की कीमत भी भारत की जनता को चुकानी पड़ी, उस आजादी के लिए जिसमें 90 प्रतिशत जनता की आर्थिक आजादी आज भी संदेह के कटघरे में खड़ी है। आजादी मिलने के बाद 22-23 दिसम्बर 1949 की रात चोरी-छिपे रामलला की मूर्तियां ऐतिहासिक इमारत के अंदर रख दी गयी थीं। 1986 में ताले खुलवाने से पहले तक पूजा-अर्चना गैर-कानूनी तरीके से की जाती रही थी, 6 दिसम्बर 1992 में उच्चतम न्यायालय को दिये गये आश्वासनों के बावजूद केंद्रीय तथा राज्य सरकारें उन्मादी हिंदू कार-सेवकों की भीड़ द्वारा ऐतिहासिक इमारत को गिराये जाने से रोकने में असफल रहीं और गैर-कानूनी तरीके से किये गये विध्वंस के प्रतिकार स्वरूप ध्वस्त की गई ऐतिहासिक इमारत के पुनर्निर्माण की दिशा में सरकार ने कोई पहल नहीं की है ये ऐतिहासिक तथ्य हैं जिन्हें सभी इतिहासकार निर्विवाद रूप से मानते हैं और आम जनता भी जानती है। और अब धर्मनिरपेक्ष संविधान तथा कानून को नजरअंदाज कर हिंदू पक्षकारों के आस्था के दावे के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा दिये गये निर्णय ने हिंदुओं के धार्मिक उन्माद और हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता को नये शीर्ष पर पहुंचा दिया है।
            आज अयोध्या विवाद को समझने के लिए उस समय के कुछ और तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
            1857 में शुरु हुए विद्रोह को काबू में करने के बाद 1858 में बर्तानवी साम्राज्य ने भारतीय उपनिवेश की व्यवस्था अपने हाथ में ले ली। साम्राज्य ने सबसे पहला काम किया कंपनी की सेना जिसमें मुख्यतया मध्यभारत के अवध राज्य के ब्रााहृण तथा मुसलमान थे, को विघटित कर सेना का क्षेत्रीय तथा जातीय आधार पर पुनर्गठन करना। दूसरा महत्वपूर्ण काम था भारतीय दंड संहिता (IPC1860) को लागू करना। तीसरा महत्वपूर्ण काम था इंपीरियल पुलिस सर्विस तथा इंपीरियल सिवल सर्विस का गठन जो आज के स्वतंत्र भारत में आई. पी. एस. तथा आई. ए. एस. के नाम से जानी जाती हैं। इसके साथ ही एक और नीतिगत निर्णय भी लिया गया। जहां कंपनी ने धार्मिक रूढ़िवादिता को समाप्त करने के लिए सती-प्रथा पर पाबंदी लगाने जैसे प्रगतिशील काम किये थे वहीं साम्राज्य ने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का निर्णय कर धार्मिक रूढ़िवादिता तथा धर्मांधता को बढ़ावा देने के लिए उपयुक्त माहौल प्रदान किया। इस प्रकार साम्राज्य ने जहां आई.पी.सी., आई.पी.एस. तथा आई.ए.एस. के जरिए धर्मनिरपेक्षता का चेहरा दर्शाया वहीं सेना के पुनर्गठन तथा नीतिगत निर्णयों के जरिए हिंदू-मुसलमान एकता को ध्वस्त करने की परोक्ष रणनीति अपनाई।
            साम्राज्य को अपनी औपनिवेशिक नीतियां लागू करने के लिए एक ऐसे संगठन की आवश्यकता थी जो दिखावटी तौर पर भारतीय राष्ट्रीयता से प्रेरित नजर आये पर वास्तव में साम्राज्य के हितों के अनुरूप काम करे और इसके लिए 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना की गई। संस्थापक थे लॉर्ड ए. ओ. ह्रूम। वही ए. ओ. ह्रूम जो 1857 में इटावा के कलेक्टर थे और जिन्होंने विद्रोह को कुचलने के लिए हजारों निरीह आदमियों, औरतों और बच्चों को गांव-गांव में जाकर कत्ल किया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल किये गये भारतीय उस वर्ग से थे जो कंपनी राज में कंपनी की दलाली का काम किया करते थे और भद्रलोग कहलाते थे। इस प्रकार धर्म निरपेक्ष नजर आने वाली पर वास्तव में भारतीय अवाम को तकसीम करने वाली साम्राज्य की औपनिवेशिक नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को। यह महज संयोग नहीं है कि हिंदू महासभा तथा मुस्लिम लीग जैसे कट्टर धार्मिक संगठनों को आधार प्रदान करने वाले पं. मदन मोहन मालवीय तथा मुहम्मदअली जिन्ना जैसे लोग किसी समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर काबिज थे। अनेकों राष्ट्रभक्त नेताओं की मौजूदगी के बावजूद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज भी अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से छुटकारा नहीं पा पाई है। 1949 दिसम्बर में आधी रात ऐतिहासिक इमारत के अंदर रामलला की मूर्तियां रखवाकर पूजा शुरु करवाना, 1984 में सिख विरोधी दंगों का नेतृत्व, 1986 में शाहबानो मामले में संविधान संशोधन तथा रामलला की पूजा के लिए ऐतिहासिक इमारत का ताला खुलवाना जैसे उदाहरण, भारतीय अवाम को सांप्रदायिक वैमन्स्य के आधार पर बांटने की अंग्रेजों की रणनीति तथा मानसिकता की निरंतरता के ही द्योतक हैं।
            उपर्लिखित ऐतिहासिक तथ्यों के अलावा कुछ और संभावनाएं तथा सामाजिक यथार्थ हैं जिन्हें तार्किक आधार पर इस मामले में ऐतिहासिक तथ्यों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
            पूर्व-आधुनिक काल से पहले यानि सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत तक राजसत्ता पूरी तरह धर्म के आधीन होती थी और राज्यों के बीच के झगड़े सीधे-सीधे युद्ध के द्वारा निपटाए जाते थे इस कारण पराजित पक्ष को मानसिक रूप से पंगु तथा प्रतिरोध के अयोग्य बनाने के लिए विजयी पक्ष द्वारा परास्त पक्ष के प्रमुख धार्मिक प्रतीकों तथा पूजा स्थलों को नष्ट करने के अभियान सामान्य बात थी।
            आदिकाल में एक राज्य का जीवन कुछ शताब्दियों का ही होता था। इसी प्रकार इमारतों का जीवनकाल भी कुछ शताब्दियों का होता था। आबादी का विस्थापन भी अनहोनी बात नहीं थी। इस कारण कुछ सहस्त्राब्दियों में एक ही स्थान पर अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न धर्मों के अनुयायियों तथा भिन्न-भिन्न धर्मों के पूजास्थलों के होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
            तुलसीदास द्वारा रामचरितमानस अवधी में लिखे जाने से पहले तक रामकथा के भिन्न-भिन्न भाषाओं में भिन्न-भिन्न स्वरूप थे इस कारण राम व्यापक हिंदू समाज के आराध्यदेव नहीं थे। कृष्ण और शिव के भक्त भी लगभग उतने ही थे जितने राम के थे और तीनों के बीच व्यापक सामन्जस्य का भी अभाव था। तुलसीदास द्वारा अवधी, जो कि मध्यभारत में आमभाषा थी, में लिखे जाने के कई दशकों बाद ही राम आम हिंदू के आराध्यदेव और कृष्ण-भक्तों तथा शिव-भक्तों के लिए भी उतने ही पूज्यनीय बन सके थे।          
            राजा दशरथ के आदिकाल से लेकर कंपनी राज के आधुनिक काल के बीच मध्य भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन और इस्लाम धर्मानुयायी राजाओं ने राज किया है। सभी धर्मों के पूजा स्थल या उनके अवशेष अयोध्या में अनेकों जगह आज भी मौजूद हैं।
            अब हम ऊपर लिखे ऐतिहासिक तथ्यों तथा संभावनाओं और तर्कों के आधार पर अयोध्या विवाद का विश्लेषण कर सकते हैं।
            अयोध्या में विवादित भूमि के बारे में हिंदू पक्षकारों का दावा है कि उस स्थान पर भगवान राम का जन्म हुआ था और आदिकाल से वहां राममंदिर बना हुआ था जिसे मुगल शासक बाबर के सेनापति मीर बकी ने गिरवाकर उस स्थान पर मस्जिद का निर्माण करवाया था। चूंकि राम सारे हिंदू समाज के आराध्य तथा आस्था के प्रतीक हैं इस कारण गुलामी के दौर में किये गये उस अपकार का स्वाधीन भारत में प्रतिकार किया जाना अनिवार्य है। और इस प्रक्रिया में ऐतिहासिक इमारत का ढहाया जाना भी अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
            दूसरी ओर मुसलमान पक्षकारों का दावा है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनाई गई थी वह खाली स्थान था, उस स्थान पर हिंदुओं का या किसी और धर्म का कोई भी पूजा स्थल नहीं था क्योंकि किसी भी धार्मिक स्थल को तोड़कर उसी स्थान पर मस्जिद तामीर करना इस्लाम के अनुसार नाजायज है। उनके अनुसार अगर रामजन्म मंदिर या कोई और पूजास्थल रहा भी होगा तो वह बाबरी मस्जिद की भूमि से हटकर कहीं और रहा होगा इस कारण हिंदू पक्षकार रामजन्म मंदिर बनाना ही चाहते हैं तो बाबरी मस्जिद की भूमि छोड़कर कहीं भी बना सकते हैं।
            अयोध्या विवाद का बीजारोपण तो 1885 में महंत रघुबर दास के दावे के साथ ही कर दिया गया था पर अयोध्या विवाद अपने मौजूदा स्वरूप में 1949 में खड़ा किया गया था। यह महज इत्तेफाक नहीं था कि 26 नवम्बर 1949 को संविधान सभा द्वारा भारत के संविधान, जिसमें भारत के सभी नागरिकों को अपनी-अपनी आस्था तथा पूजा-पाठ के लिए पूरी आजादी की गारंटी की गयी थी, को पारित करने के एक महीने के भीतर ही 22-23 दिसम्बर 1949 की रात में चोरी-छिपे रामलला की मूर्ति स्थापित कर दी गयी जिसे तुरंत हटाये जाने के पंडित नेहरू के आदेश के बाद भी नहीं हटाया गया। 1986 में पूजा-अर्चना के लिए ताले खुलवाने तथा 6 दिसम्बर 1992 में ऐतिहासिक इमारत के ढहाये जाने और अब धर्मनिरपेक्ष संविधान तथा कानून को नजरअंदाज कर हिंदू पक्षकारों के आस्था के दावे के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ द्वारा दिये गये निर्णय ने हिंदुओं के धार्मिक उन्माद और हिंदू-मुसलमान वैमनस्यता को नये शीर्ष पर पहुंचा दिया है।
            विवाद के लिए तो अनगिनत मुद्दे खड़े किये गये हैं और किये जा सकते हैं पर मुख्य मुद्दा है कि क्या 1528 में वहां राम या सीता के नाम से कोई मंदिर मौजूद था क्योंकि अगर वहां पर कोई मंदिर था तो फिर उस को गिराकर बाबरी मस्जिद तामीर की गई थी यह तार्किक तौर पर संभावना से बढ़कर तथ्य हो जाता है। पर कई हजारों साल पहले पैदा हुए राम से संबंधित लगभग सभी बातें तथ्यों से अधिक आस्था पर आधारित हैं वहीं पिछली दो-तीन सहस्त्राब्दियों से पिछली कुछ शताब्दियों के बीच अनेकों हिंदू, बौद्ध, जैन धर्माबलंबी राजसत्ताओं का अस्तित्व में होना तथ्यों पर आधारित है। साथ ही कुछ शताब्दियों पहले अगर मंदिरों तथा अन्य पूजास्थलों को ध्वस्त करना इस्लामी कट्टरता का अंग था तो गिराये गये पूजास्थल पर मस्जिद का निर्माण न करना उसी इस्लाम कट्टरता में शामिल है। ऐसी स्थिति में इस बात की अधिक संभावना है कि किसी भी पूजास्थल को ध्वस्त कर उसके स्थान पर मस्जिद नहीं बनायी गयी थी बल्कि बाबरी मस्जिद पहले से खाली जगह पर ही बनाई गयी थी।
            अदालत के समक्ष जो पक्षकार हैं उनका दावा है कि वे व्यापक हिंदू तथा मुसलमान जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं जबकि यथार्थ में व्यापक हिंदू तथा मुसलमान समाज को अयोध्या विवाद में किसी पक्ष के साथ सहानुभूति से अधिक उससे दहशत है। आम हिंदू को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि राम ठीक उसी जगह पैदा हुए थे जहां ऐतिहासिक इमारत खड़ी थी या उससे कुछ सौ मीटर या कुछ किलोमीटर दूर पैदा हुए थे। उसके लिए तो सारी अयोध्या तथा वहां मौजूद सभी मंदिर समान रूप से पूज्यनीय हैं। इसी प्रकार सारे भारत के आम मुसलमानों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उस ऐतिहासिक इमारत में रामलला की मूर्तियां रखी हैं या उसमें अयोध्या के मुसलमान नमाज पड़ते हैं। उसे तो फर्क तब पड़ता है जब रामजन्मभूमि की आड़ में उसके जीवन तथा रोजी-रोटी के साधनों पर हमला किया जाता है।
            भारतीय संविधान जहां व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार की तथा धार्मिक आजादी की सुरक्षा सुनिश्चित करता है वहीं पर कुछ समूहों द्वारा धर्म के आधार पर सार्वजनिक संपत्ति पर अधिकार के तथा धार्मिक उन्माद फैलाने के कुटिल प्रयासों को रोकने के लिए सरकार के अधिकार तथा दायित्व को भी सुनिश्चित करता है। भारतीय राष्ट्र-राज्य का दायित्व है कि वह ईमानदारी से, भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की तथा सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करे और संविधान सभा द्वारा भारतीय संविधान पारित करने के बाद किये गये किसी भी गैर-कानूनी काम का प्रतिकार करे।
            निरपेक्ष न्याय की कसौटी होगी हिंदू तथा मुसलमानों की व्यापक आबादी के बीच धार्मिक सौहार्द के वातावरण की सुनिश्चिति ताकि उनके जीवन तथा जीवन-यापन के साधनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
            अयोध्या विवाद हल करने के लिए सरकार को चाहिए कि सारी विवादित तथा गैर विवादित 67 एकड़ जमीन जिसके लिए 1993 में कानून बनाया गया था अपने कब्जे में ले, हिंदू तथा मुसलमान दोनों समुदायों से संविधान के अनुपालन तथा आपसी सौहार्द की व्यापक अपील करे, 1992 में गिरायी गयी ऐतिहासिक इमारत का पुनर्निर्माण करवाये, इमारत के ऐतिहासिक महत्व को सुरक्षित रखते हुए रामलला की मूर्तियों की स्थापना तथा पूजा-अर्चना की व्यवस्था करे, ऐतिहासिक इमारत की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आस्था के अनुरूप हिंदुओं के लिए मंदिर तथा मुसलमानों के लिए मस्जिद निर्माण की व्यवस्था करे। इस प्रकार का हल व्यापक तौर पर हिंदू तथा मुसलमानों के बीच सौहार्द, परस्पर विश्वास तथा एकता सुनिश्चित करेगा इसलिए दोनों समुदायों का बहुमत इसका स्वागत करेगा। न केवल सारे देश के आम मुसलमान बल्कि अयोध्या के मुसलमान भी अपने जीवन तथा रोजी-रोटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ऐतिहासिक इमारत को हिंदुओं को सौंपने के लिए सहर्ष तैयार हो जाएंगे क्योंकि वे जानते हैं कि जिस प्रकार मक्का उनके लिए पवित्र और महत्वपूर्ण है उसी प्रकार हिंदुओं के लिए राम संबंधित सभी चीजें हैं।          
            पर ऊपर सुझाया गया समाधान जहां हिंदू-मुसलमान एकता का वातावरण तैयार करेगा वहीं वर्ग संघर्ष में शोषित वर्ग की एकजुटता का मार्ग भी प्रशस्त करेगा और यही बात सामंती तथा बुर्जुआ हितों की हिमायती व्यवस्था के लिए घातक है। जाहिर है व्यवस्था में बैठे सामंती तथा बुर्जुआ हितों के पैरोकारों के लिए सुझाया गया समाधान स्वीकार्य नहीं होगा। पर जो लोग शोषित वर्ग के हिमायती होने का दावा करते हैं उनका नैतिक दायित्व है कि इस प्रकार के समाधान को लागू करने की मांग करें।
सुरेश श्रीवास्तव
(9810128813)

अक्टूबर 2010